एक लड़का जिसके ज़िस्म में भोपाल बसा हुआ है। वो वीआईपी रोड पर दौड़ना चाहता है, लेक पे घंटों बैठना। उसे वन विहार में साइक्लिंग करनी है और महावीर टेकरी पर चढ़ लिखना होता है।
प्यार करना बहुत ही सहज है, जैसे कि ज़ुल्म को झेलते हुए ख़ुद को लड़ाई के लिए तैयार करना. -पाश
Thursday, August 4, 2022
भोपालनामा 2
Tuesday, August 2, 2022
भोपालनामा
'मैं अपने हिस्से की ज़िन्दगी तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूं' लड़का जाते जाते बोलता है. लड़की को कुछ समझ नहीं आता.
Thursday, May 5, 2022
India As I Know: Story of The #SaveBuxwahaForest Movement.
#SaveBuxwahaForest Movement को सोशल मीडिया पर मैं करीब से शुरू से ही देख रहा था. यह पर्यावरण से जुड़ा Movement था इसलिए इसमें मेरी उत्सुकता कुछ ज्यादा थी। लेकिन अब तक मुझे वही पता था जो मैंने सोशल मीडिया पर पढ़ा था इसलिए मैंने और कुछ जानने के लिए संकल्प से संपर्क किया। संकल्प उसी क्षेत्र से हैं और आंदोलन की शुरुआत संकल्प और उनके कुछ साथियों ने ही मिलकर की थी।
संकल्प से मैं मुख्यतः था 2-3 प्रश्न करता हूं कि आंदोलन शुरू कैसे हुआ? इस आंदोलन से अब तक क्या-क्या फायदे हुए हैं? और इस आंदोलन से आप और आपके मित्रों ने क्या सीखा? अंतिम प्रश्न इन युवाओं की सोच जानने के लिए किया गया था।
मात्र 24 वर्षीय संकल्प बताना शुरू करते हैं। ' भैया अप्रैल 2021 की बात है, मैं और मेरे साथी को कोविड में काम कर रहे थे उसी दौरान अखबार में एक खबर आई कि बक्सवाहा के आसपास के जंगल का क्षेत्र आदित्य बिरला ग्रुप की एक कंपनी के लिए लीज पर दिया जा रहा है जिससे वहां हीरे का उत्खनन किया जा सके। क्योंकि बक्सवाहा क्षेत्र और पूरा संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र ही गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा और रोजगार की कमी से प्रभावित रहा है इसलिए मेरे लिए खुश कर देने वाली खबर थी। लेकिन मैंने अखबार की हेडलाइंस को फॉलो करना शुरू कर दिया तो पता चला इसके लिए तकरीबन 2,15,875 (दो लाख पंद्रह हजार आठ सौ पचहत्तर) पेड़ काटे जाने हैं जिससे उस क्षेत्र के तकरीबन 10 हजार लोग प्रभावित होने वाले थे। अधिकतर लोग लघु वनोपज- महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी गुठली, जलाऊ लकड़ी और चारे के लिए जंगल पर निर्भर हैं। इसलिए उन पर प्रभाव ज्यादा पडने वाला था। साथ ही मैंने पड़ा कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मात्र 400 लोगों को वहां पर रोजगार मिलने वाला था जिसमें से अधिकतर कुशल (skilled) और अर्ध कुशल (Semi-Skilled) लेबर का उपयोग होना था मतलब की स्थानीय लोगों को बहुत ज्यादा फायदे वहां पर नहीं थे किंतु उनकी आय जरूर खतरे में थी।
मैंने और मेरी अन्य साथियों ने मिलकर रिसर्च की तो पता चला कि यह क्षेत्र केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड ( Central Ground Water Authority (CGWD)) द्वारा 2017 में सूखा प्रभावित क्षेत्रों (Semi Critical Condition) में घोषित है किंतु यहां पर 160 लाख लीटर पानी प्रतिदिन उपयोग किया जाना था मतलब साफ था पानी का अत्यधिक उपभोग उस जगह होना था जहां पर पानी की पहले से ही कमी है। इसके लिए वहां पर वन में उत्सर्जित होने वाली धाराओं पर बांध बनाए जाने थे मतलब साफ था कि छोटे-छोटे नाले सूख जाने थे। छोटे नालों से पानी नदी में बहकर जाता है। इसलिए बेतवा, शासन नदियां भी प्रभावित होने वाली थीं। साथ ही यह ओपन कास्ट माइनिंग का प्रोजेक्ट था अतः भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge System) भी खत्म होने वाला था और भौम जलस्तर (Water Table) भी तीव्रता से नीचे जाने वाली थी। मतलब साफ था कि स्थानीय लोगों को ना तो रोजगार था वहां पर ना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा फायदा होने वाला था, जबकि ढेर सारे घाटे सामने आने वाले थे। जिसमें सबसे बड़ी समस्या पानी की होने वाली थी।
हमने संपूर्ण रिसर्च की थी और उसका डाटा सोशल मीडिया पर पोस्ट और वीडियो के माध्यम से डालना शुरू किया। धीमे धीमे अन्य डॉक्यूमेंट पढ़े
तो पता चला 2014 में जो फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट दी गई थी उसमें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wild Life (Protection) Act, 1972) के Schedule-I की 7 प्रजातियां वहां पर दिखाई गई थी साथ में बहुत सारे जानवर (तेंदुआ, भालू, काला हिरण, चीतल, मोर, लकड़बग्घा, फॉक्स इत्यादि) वहां पर प्रदर्शित किए गए थे लेकिन नई फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट में ये सब प्रदर्शित ही नहीं किए गए थे। प्रदर्शित किया गया था कि एक भी जानवर 382 हेक्टेयर के जंगल में नहीं है! जबकि सच ये नहीं था।
इंटरेस्टिंग बात तो यह है भैया कि मात्र 19 किलोमीटर पर पन्ना टाइगर रिजर्व की बफर जोन है। साथ ही यही क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी के बीच में एक कॉरिडोर का भी काम करता है, इसलिए वाइल्डलाइफ के हिसाब से भी यह बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
हमने सारी डिटेल को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते न्यूज़ वालों ने हमारी खबरों को सोशल मीडिया से उठा उठा कर के अपने न्यूज़पेपर में और न्यूज़ चैनल में डालना शुरू कर दिया। मजेदार था कि उनकी खुद की रिसर्च कुछ भी नहीं थी, वह हमारी सोशल मीडिया अकाउंट से उठा उठा कर के ही फैक्ट डाल रहे थे।
धीमे धीमे यह हुआ कि देश की सबसे बड़ी पर्यावरण (Environment) से संबंधित मैगजीन डाउन टू अर्थ (Down To Earth) में भी इसके बारे में छपा, ज़ी न्यूज टीवी चैनल ने भी उसके बारे में डाला और झारखंड के, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र संघ, छोटे-बड़े एनजीओ भी हमारे साथ आना शुरू कर दिया।
हम सब ने मिलकर के छोटे बड़े एनजीओ के साथ विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2021 को #SaveBuxwahaForest मूवमेंट ट्विटर पर चलाया और उस दिन वह टॉप 3 ट्रेंडिंग हैशटैग में से एक था।
हम युवा अपना हर कदम फूंक-फूंक कर के रख रहे थे. क्योंकि हमें रिसर्च भी करनी थी, हमें यह भी ध्यान देना था कि यह आंदोलन गलत हाथों में ना चला जाए, हमें यह भी ध्यान रखना था कि हम कानून का किस तरीके से उपयोग कर पाएंगे और किस तरीके से समाज के हर तबके को शामिल कर (सोशल मोबिलाइजेशन) के लोगों को अपने साथ शामिल करवाएं.
इसके लिए हमने अलग अलग टीम बनाई। दृगपाल सिंह, अभिषेक जैन ने बहुत अच्छी तरीके से सोशल मोबिलाइजेशन किया। विवेक दांगी, अनुज पाटनी ने बहुत अच्छी तरीके से सर्च की। आशिक मंसूरी ने इमली घाट, कसेरा, बक्सवाहा में नुक्कड़ सभाएं की। हमारी मेहनत देख ग्राउंड पर और सोशल मीडिया पर लोगों ने जुड़ना शुरू कर दिया।
इसका फायदा यह हुआ कि मूवमेंट के सपोर्ट में देश भर से लोग आ गए सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट में कई लोगों ने याचियाएं लगाईं। डॉ धरनेंद्र द्वारा एनजीटी में केस दर्ज किया गया और उनकी याचिका पर एनजीटी ने बुक्सवाहा में माइनिंग के खिलाफ अगस्त में स्टे लगा दिया। उस पर मुहर लगाते हुए हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2021 में स्टे ऑर्डर दे दिया।
संकल्प इतनी सारी बातें इतनी आराम से मुझे बता रहे थे कि मैं उनके ज्ञान, उनकी कोशिशों को देखकर हतप्रभ था। इसलिए मैंने उनसे पूछ ही लिया कि "आपका क्या पॉलिटिक्स में आने का इरादा है?"
वे बोलते हैं "नहीं भैया, मेरा कोई इरादा राजनीति करने का नहीं था। इनफैक्ट हम में से किसी का भी इरादा राजनीति करने का नहीं था। हम लोग अपने क्षेत्र के लोगों का सोच कर के यह कार्य कर रहे थे। अभी भी मैं समाज के अंदर जाकर के कुछ बदलाव लाने के लिए सिविल सर्विसेस की तैयारी कर रहा हूं।"
मैंने उनसे पूछा "आप और आपके दोस्तों पर इस आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ा?"
वह बोलना शुरू करते हैं "भैया सबसे बड़ी बात तो हम सब का ज्ञानवर्धन हुआ। हमें पहली बार पता चला कि क्या-क्या क्लीयरेंस देश में माइनिंग के लिए ली जाती है। इसके अलावा हम लोगों को जोड़ पाए थे, हमारी सभा में लोगों ने हमें सुना था। पहली बार हम लगा था कि हम सब मिलकर काम करें तो वह बेहतरीन काम कर सकते हैं। पहली बार हम एक टीम के रूप में आए थे जिनमें से अधिकतर लोगों को तो मैं पहले से जानता भी नहीं था और कुछ से तो अभी तक नहीं मिला हूं।
हमने सीखा कि First Study, Learn then Act (पहले पढ़ो, सीखो, फिर काम करो) हमने सीखा कि किस तरीके से सरकार के द्वारा बनाए गए चैनल/कानून का जैसे एनजीटी, आरटीआई, हाईकोर्ट का सही तरीके से प्रयोग किया जाता है। लोगों का साथ कैसे मिलता है, मैनेजमेंट कैसे किया जाता है और नकारात्मक लोगों से कैसे दूर रहा जा सकता है।
मजेदार तो ये था कि हमें कुछ लोगों ने देशद्रोही तक घोषित करने की कोशिश की। फेसबुक पर कुछ ग्रुप के द्वारा हमारे खिलाफ वीडियो डाले गए, स्थानीय विधायक ने हम लोगों के लिए "भटके हुए युवा जो विकास के खिलाफ हैं" तक कहा।
तब भी हम सब उन सब के खिलाफ डटे हुए थे। हमारी अच्छी कोशिशें देख वाटरमैन ऑफ इंडिया श्री राजेंद्र सिंह, मेधा पाटेकर,आशीष गौतम, एक्टर अखलेंद्र मिश्र, आशुतोष राणा, जी पाटन ऑफ इंडिया मेघा पाटेकर राम आशीष गौतम, धरनेंद्र जी, अंकिता जैन, निखिल दवे साथ आए, डाउन टू अर्थ, द वायर, क्विंट हिंदी, भास्कर आदि ने इस आंदोलन के बारे में लिखा।'
अंत में संकल्प मेरे से एक बात कहते हैं, " भैया कैंपा एक्ट (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (CAMPA) Act) अंतर्गत हुए compensatory Afforestation (प्रतिपूरक वृक्षारोपण) से उसी गुणवत्ता का जंगल खड़ा नहीं सकता है। बिना वाइल्डलाइफ के यह चंद पेड़ों का समूह बस होगा।"
बक्सवाहा के जंगलों की स्थिति अभी ये है कि उत्खनन पर हाई कोर्ट के आदेशानुसार फिलहाल रोक लगी हुई है। सागर विश्वविद्यालय ने उसी क्षेत्र में 9000 साल पुराने भृत्तिचित्रों की ख़ोज की है, इसलिए इस क्षेत्र को सुरक्षित रखने का एक और कारण हमारे पास पास है।
#indiaasiknow #youthiconofindia
(तस्वीरें: संकल्प और बक्सवाहा के जंगल)
Wednesday, January 12, 2022
India As I Know: The Super Teacher #youthiconofindia
मैं सुबह से भ्रमण पर हूं। 'सर, यह निगहरी गांव है।' साथ में बैठा साथी बोलता है.
मैं गाड़ी की खिड़की से देखता हूं। बहुत छोटा सा गांव है 60 70 घरों का। इस जगह पर ऐसा भी नहीं है कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की इमारत या साक्ष्य हो। इसलिए उनसे पूछता हूं , 'ऐसा क्या खास है इसमें?'
'सर यहां के प्राइमरी शाला के मास्टर राजेश सोनी से मिलवाता हूं, 2019 में कलेक्टर साहिबा भी मिलने को आ चुकी हैं'
'सिर्फ सोनी जी से मिलने के लिए आई थीं?'
'जी सर'
हम निगहरी के प्राथमिक स्कूल के सामने खड़े हैं। सरकारी स्कूल ही है, मध्य प्रदेश के अन्य स्कूलों की तरह।
हम अंदर जाते हैं, 20-30 बच्चे बाहर ही चबूतरे पर सर्दी की धूप का आनंद लेते हुए बैठे हुए हैं। साथी मेरा परिचय देते हैं। सोनी जी एवं एक अन्य शिक्षक राजपूत जी आगे आते हैं।
'सर बड़े दिन से मैं आपसे मिलना चाहता था।' वह हाथ मिलाते हुए बोलते हैं।
फिर वह वह के स्कूल के कक्ष के अंदर लेकर जाते हैं। सामने दो चित्र हैं- पहला, सागर के तत्कालीन कलेक्टर Preeti Maithil Nayak IAS के आगमन का। दूसरा, नीति आयोग के लिए काम कर रहीं श्रीमती सचिता गुरुंग का।
' सर इन लोगों ने स्कूल आकर मेरे काम की सराहना की थी।' दोनों चित्रों के आगंतुक बड़े प्यार से जमीन पर बैठकर बच्चों के साथ किसी TLM (Teaching Learning Module/Material) को देख रहे हैं।
हम कक्ष के अंदर जाते हैं और मुझे समझ में आते हैं कि राजेश सोनी जी कोई साधारण प्राइमरी स्कूल टीचर नहीं हैं। अंदर दीवारों पर, फर्श पर टेबल बहुत सारे उनके स्वयं के बनाएं इंस्ट्रूमेंट रखे हुए हैं।
वे उत्साह से बताना शुरू करते हैं 'सर, इस कच्ची उम्र में बहुत आसानी से बच्चों को विषय समझ नहीं आते हैं इसलिए मैंने पढ़ाने के लिए नए-नए इंस्ट्रूमेंट बनाएं जिससे बच्चा आसानी से समझ लेते हैं। सारे इंस्ट्रूमेंट कबाड़ को रिसाइकल करके बनाए हैं। कुछ में थर्माकोल की सीट का उपयोग है।'
वे एक TLM इंस्ट्रूमेंट के पास लेकर जाते हैं। सर अगर में बच्चों से पूछता हूं कि 3+ 5 कितना होगा तो वह पहले इंस्ट्रूमेंट की 3 लिखी जगह की चाबी खींचेगा, फिर 5 की। दोनों बारे में उसे अंक अनुसार कंचे नीचे मिल जाएंगे। फिर बस वो उनको गिनकर उत्तर दे देगा।
दीवार पर चार पांच सर्किल के बने हुए हैं। पता चलता है कि एक भाग, एक तिहाई भाग, एक चौथाई भाग क्या होते हैं।
एक प्यारा सा खिलौना शब्द चक्र है जिसमें घुमाने पर दो या तीन अक्षर के शब्द बन जाते हैं। मैं घुमाकर 'बस' और 'पल' बनाता हूं। बहुत ही मजेदार और इंटरेस्टिंग था। शुरू करता हूं तो घुमाता ही रहता हूं।
कबाड़ से एक बहुत प्यारा गुलदस्ता बनाया है। उसके फूलों पर कार्डबोर्ड की तितलियां हैं जिन पर बहुत खूबसूरतीसे अंग्रेजी व हिंदी में दिन लिखे हुए- Sunday रविवार Wednesday बुधवार।
'सर 5 लीटर की खाली कुप्पी से पॉट बनाया है और रंगीन पॉलिथीन से फूल। इससे बच्चे रंग भी पहचानते हैं और दिन भी समझते हैं।'
छोटे-छोटे पॉकेट वाला एक बोर्ड है जिसकी हर पॉकेट में एक शब्द रखा हुआ है, जमीन पर सांप सीढ़ी बनी हुई है। वजन मापन समझाने खुद से बनाई तराजू है, खुद के बनाए वजन हैं। ऐसी अनेक छोटे छोटे इंटरेस्टिंग खिलौने हैं।
बच्चों को पढ़ाने का एक यूनिट तरीका है बहुत ही मजेदार इतना कि किसी खिलौने को आप हाथ में ले ले तो खुद ही बहुत देर खेलते रहें।
सागर जिले की देवरी तहसील के छोटे से गांव जनजाति बहुत निगाहरी गांव के प्राथमिक शाला के शिक्षक के पास इतनी क्रिएटिविटी होगी, इतने नए तरीके होंगे, मैंने सोचा नहीं था।
मैं उनसे एक दो सवाल करता हूं। वह बताना शुरू करते हैं-
'सर ये बहुत छोटा सा गांव है, पूरे जनजातीय लोग हैं। लगभग सभी गरीब हैं। मैं जब गांव आया तो लगा कि कुछ किया जाना चाहिए। मुझे पढ़ाने में इंटरेस्ट था, मेरी पेंटिंग भी अच्छी है, इसलिए मैंने कुछ अलग तरीके से समझाते हुए पढ़ाने का सोचा।'
'बच्चे जब बहुत अच्छे से पढ़ते हैं, सवाल हल करते हैं या शब्द पहचानना शुरू करते हैं तो बड़ी खुशी होती है। इस उम्र में बच्चे खेल खेल में ही सीखते हैं।'
मैं उनसे विदा लेकर गाड़ी में बैठता हूं। मेरे साथी बताना शुरू करते हैं। 'सर सच तो ये है कि सोनी जी ने बच्चों को लगभग गोद लिया हुआ है। बच्चों के हांथ मुंह धुलने से लेकर नाक पोंछने तक, जरूरत की दवाई देने तक का काम सोनी जी करते हैं। जरूरत पड़ने पर बच्चों के परिवार की आर्थिक मदद भी करते हैं। बहुत मेहनत करते हैं।'
अपने काम से इतना प्यार करने वाले इतनी शिद्दत से अपना काम करने वाले बहुत ही कम लोग होते हैं।
बहुत छोटी उम्र छोटी जगह पर बहुत सारे Unsung Heroes बहुत बड़ा difference create कर रहे हैं। राजेश सोनी जी और Abhishek जैसे लोग से उनमें से एक है।
अक्सर बच्चे और PSC की तैयारी कर रहे युवा मेरे से मुझसे पूछते हैं कि 'मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूं, मुझे आगे क्या करना चाहिए?'
अपने छोटे छोटे काम को सही ढंग से किया जाए तो वह भी बड़ा काम हो होगा। कोई भी काम बड़ा नहीं होता है बल्कि अपने काम को ईमानदारी और मेहनत से करना ही एक बड़ा काम है।
#indiaasiknow
[फोटो: श्री राजेश सोनी जी ]
Thursday, January 6, 2022
India As I Know: COVID19 Response team TKG
बात अप्रैल-मई 2021 की है कोविड-19 की दूसरी लहर से ग्रसित देश के अधिकतर लोग अपनी, परिवार, रिश्तेदारों की मदद के लिए इधर-उधर भटक रहे थे.
कुछ लोग कोविड-19 के कारण दवाई, प्लाज्मा ऑक्सीजन या हॉस्पिटल बेड के लिए संघर्षरत थे. कुछ लोगों को कोविड से इतर बीमारियों की बेसिक ट्रीटमेंट के लिए भी मदद की जरूरत थी. कुछ लोग विदेश में थे और अपने मां-बाप के लिए चिंतित थे. कुछ लोग लॉकडाउन में भूख से बेहाल थे.
ऐसे में कुछ युवा लगातार जरूरतमंदों की मदद के लिए काम कर रहे थे. देश के हर हिस्से में ऐसे युवा थे जो निस्वार्थभाव से मदद करने में जुटे हुए थे.
टीकमगढ़ जिला (मध्य प्रदेश) एवं आसपास के जिलों में ऐसे ही @अभिषेक और उनके मित्र काम कर रहे हैं।
मैं मई में खुद कॉविड से ग्रषित था और होम कोरेंटिन था. मेरे दोस्त को मदद चाहिए थी, मैंने अभिषेक को कॉल किया और मदद उपलब्ध हो गई. मैं हतप्रभ था. सोच रहा था कि उन्होंने किया कैसे...? उनके पास उस वक्त यह बताने का भी समय नहीं था.
2021 के ढलते दिसंबर में जब मैंने उनसे पूछा कि कैसे कर पा रहे थे तो उन्होंने बताना शुरू किया-
"भैया मैं फ्रीक्वेंट ब्लड डोनर हूं. उस वक्त फेसबुक पर प्लाज्मा डोनर्स के साथ काम कर रहा था, साथ ही भोपाल इंदौर के मित्रों के साथ जरूरतमंदों की मदद कर रहा था. मैं तब टीकमगढ़ में था, मैंने देखा कि लोकल के लोग मिलकर जल्दी मदद कर पा रहे इसलिए टीकमगढ़ के लिए मैंने संसाधन जुटाना शुरू किए. इसके लिए मुझे डॉक्टर, मेडिकल स्टोर, एंबुलेंस संचालक, प्लाज्मा डोनर्स को एक ही प्लेटफार्म पर लाना था. इसलिए अपने मित्रों अभय प्रताप सिंह, प्रिया के साथ मिलकर एक व्हाट्सएप ग्रुप कोविड-19 रिस्पांस टीम टीकमगढ़ ( COVID19 Response team TKG) बनाया। टीकमगढ़ के डॉक्टर डॉ अनुज रावत, डॉ भदौरिया, डॉ सौरभ जैन एवं पहचान के अन्य जगह काम करें डॉक्टर डॉ महेंद्र यादव, डॉ अनिरुद्ध नायक को भी जोड़ा.
मेरे मित्र ममतेश एवं उसके भाई की प्राइवेट टैक्सी एजेंसी थी, इस वजह से एंबुलेंस संचालक और टैक्सी वाले भी उनकी सहायता से जुड़ गए. दवाई विक्रेता मित्रों के सहयोग से ग्रुप का हो गए.
मीडिया को खबर लगी, वे ग्रुप में जुड़े. उन्होंने भी सहायता की. हमारे बारे में अखबार में निकाला. हमारी प्रशंसा की और 4 दिन में 100 से अधिक लोग ग्रुप का हिस्सा थे. अब सारे लोग जो इस आपदा में सहायक हो सकते थे, एक ही प्लेटफार्म पर आ गए थे. जरूरत पड़ने पर न सिर्फ जिले के अंदर बल्कि जिले के बाहर भी सहायता कर पा रहे थे.
मुझे 2020 में खुद कॉविड हो चुका था. चिरायु अस्पताल भोपाल में एडमिट भी रहा था. इसलिए मैंने खुद के अनुभव ग्रुप पर शेयर करना शुरू किए. क्या करना चाहिए, क्या नहीं. कौन से प्रिकॉशन लिए जाने चाहिए इत्यादि।
धीमे धीमे हमारे पास ग्रुप पर लोग कैसे डालने लगे. हम उन्हें जिले के बाहर जाने के लिए एंबुलेंस, दवाई या कॉविड से इतर बीमारी से बीमार पेशेंट को बेसिक ट्रीटमेंट उपलब्ध कराने लगे. लोगों को प्लाज्मा की जरूरत थी उसके लिए भी हमारे पास प्लाज्मा डोनर्स की टीम खड़ी हो गई थी, जो प्लाज्मा देने के लिए तत्पर रहती थी. धीमे धीमे लोगों को, मीडिया को ,प्रशासन को हम पर भरोसा होने लगा और जिले के ज्यादातर केस इस ग्रुप पर शेयर होने लगे. जिनकी मदद के लिए हम तैयार थे. हमने हमें पता चलने वाले हर केस में हर व्यक्ति की हर संभव मदद की.
सरकार ने जब कॉविड से मृत व्यक्ति के परिवार के लिए आर्थिक मदद के लिए योजना चलाई तो हम भी एक माध्यम बने. हम प्रशासन तक उनकी जानकारी पहुंचाई. एनजीओ से मिलकर के आर्थिक मदद पहुंचाएं।
Project Basant
भैया, जब जिले के गांव गांव से लोग जुड़ गए तो हमारा ध्यान गांव की ओर भी अधिक गया. हमें काम करता देख हमारे मित्र प्रेरित हुए,उन्हें भी ऐसा कुछ करना था जो बढ़ते अंधेरे में दीपक का काम करे. मेरे मित्र मयंक जैन ग्राम लार (जिला टीकमगढ़) ने अपने घर वालों से पूछकर गांव का भ्रमण किया और जो स्थिति देखी वो डरावनी थी. कुछ लोग जो बूढ़े थे, और अक्षम थे घर में और कोई नहीं था, उनके पास न खाने को था, न बनाने को. कुछ लोग जिनके पास पहले भी सुबह के बाद शाम की रोटी का इंतजाम नहीं होता था, वह बेरोजगार हो गए थे. हमने उन तक खाना पहुंचाना शुरू किया. दोस्तों के साथ मिलकर एक जूम मीटिंग की. हमने मिलकर कुछ पैसा इकट्ठा किया. लोगों ने 500 से लेकर के 5000 रुपए तक दान दिए. गांव-गांव में हमने ऐसे घरों को खाने के पैकेट बांटना शुरू किया. इसे हमने 'प्रोजेक्ट बसंत' का नाम दिया
गांव गांव से अन्य युवाओं ने भी हमारे साथ आना शुरू कर दिया. उन्होंने खुद बोला कि "भाई, आप लोग जब ऐसा कर सकते हैं तो हम उसमें मदद क्यों नहीं कर सकते हैं. इसलिए कई युवा तैयार हो गए और उन्होंने खाने के पैकेट बांटने से लेकर राशन उपलब्ध कराने में हमारी मदद की.
प्रोजेक्ट बसंत का एक और फायदा हुआ कि ग्राम सचिव को ऐसे लोगों की लिस्ट बना कर हमने दी. ग्राम सचिव और प्रशासन हमारी मदद कर रहा था और ऐसे लोगों के बारे में हमसे पूछा भी.
हमें सुनिश्चित किया कि आखिरी व्यक्ति तक सरकारी योजना का लाभ पहुंचे.
मुझे पहली बार लगा कि
1. सोशल मीडिया का हम इस तरह भी उपयोग कर सकते हैं.
2. हम युवा मिलकर इतना कुछ कर सकते हैं.
3. पहली बार मैं और मेरे मित्र जॉय ऑफ गिविंग क्या होता है, महसूस कर पा रहे थे.
जो काम हम लोग गांव में कर रहे थे हमारे कुछ मित्र शहरों में भी ऐसे ही काम कर रहे थे. इंदौर में कुछ लोग कोचिंग चला रहे थे, कुछ लोग कोचिंग में पढ़ रहे थे. उनके पास कांटेक्ट थे वहां
मित्रों ने वन रुपी फाउंडेशन (One Rupee Foundation) शुरू किया मतलब ₹1 प्रतिदिन देना था और उस पैसे से खाने के पैकेट जरूरतमंदों को हमने बांटना शुरू किया. दिहाड़ी काम करने वालों को, फुटपाथ पर मांगने वालों को, अस्पताल में भर्ती लोगों के परिजनों को खाने के पैकेट बांटना शुरू किया. रोमेश मूलचंदानी, समन्वय रिछारिया ने सजगता से काम किया.
हमें पहली बार लगाकर सीमित संसाधनों में सीमित लोग भी बड़ा काम भी कर सकते हैं.
Before the Third Wave
चूंकि यह कॉविड की तीसरी लहर की शुरुआत का दौर था इसलिए मैं उनसे "तीसरी लहर के पहले क्या काम करना चाहिए" पूछता हूं
"भैया मैं बिंदुबार बताता हूं" वह बोलते हैं.
1. इंफ्रास्ट्रक्चर न चार छः महीने में खड़ा हो सकता था, न ही पूर्णतः बना है. इसलिए इस बात को ध्यान में रखते हुए सारी सावधानियां बरतनी चाहिए. डॉक्टर और सरकारी गाइडलाइन को पूर्णतः फॉलो करना चाहिए.
2. मेरा अनुभव कहता है कि अगर युवा ऑर्गेनाइज हों तो पैरलल सपोर्ट सिस्टम खड़ा कर सकते हैं. ऐसा पैरलल सपोर्ट सिस्टम हर गांव शहर में खड़ा करना होगा, जो आपदा में विपदा में फंसे लोगों की हर संभव मदद कर पाए. प्रशासन व प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों के साथ मिलकर काम करना होगा, उनकी हर संभव मदद करनी होगी. कुछ लोग हो सकता है पूरा काम न संभाल पाए लेकिन युवा मिलकर, प्रशासन के साथ आकर के सिस्टम का हिस्सा बन कर अच्छे से काम संभाल सकता हैं.
3. पौराणिक कथाओं में हमें कम्युनिटी सपोर्ट सिस्टम के बारे में बहुत सारी कहानियां मिलती हैं. मतलब समाज के लोग आपस में मिलकर के सपोर्ट सिस्टम खड़ा करते हैं, दूसरों की मदद करते हैं. गांव में थोड़ा बहुत अभी भी है, लेकिन शहरों में ऐसा कम है. पूर्वजों से सीखते हुए इस सिस्टम विकसित कर के हम एक दूसरे की मदद बेहतर तरीके से कर पाएंगे.
भैया हम लोगों के अंदर हमारे काम ने मानवता को जगाया ही नहीं था, बल्कि जरूरत पड़ने पर मानवता एक दूसरे का हाथ थाने साथ खड़ी हुई थी. हमारे काम ने हमें अधिक संवेदनशील, अधिक मानवीय और सामाजिक रुप से अधिक समृद्ध बनाया है.
उनकी बातें सुनकर युवाशक्ति के बारे में पहली बार इतना सकारात्मक और उत्तरदायित्व युक्त अनुभव मेरे सामने आता है। युवा और समाज का हर व्यक्ति व्यक्तिगत हित छोड़ कर, मिलकर काम करे तो समाज की स्थिति दूसरी होगी.
मैं उनसे कुछ एक्सपीरियंस सुनाने को कहता हूं. वो बताते हैं की उन्होंने #रोजकाकिस्सा नाम से फेसबुक पर कुछ अनुभव शेयर किए हैं.
आप भी एक अनुभव पढ़िए-
रात का एक बज रहा होगा भोपाल वाले ग्रुप में किसी नें मैसेज किया कुछ डिटेल्स के साथ (एक लड़का है उसकी मम्मी को वेंटीलेटर चाहिए अर्जेंट है) वेंटिलेटर सोने की सिल्ली से कम कीमती नहीं इस समय।
हम कुछ लोग जो जाग रहे थे ढूंढनें में लग गये, लगभग तीन बजे मैंने छत्रपाल भाई से कहा मेरी आँखें बंद होनें लगीं है उसका जबाब आया शिवि खुद पॉजिटिव है और सो नहीं रही,लगी है तुझे नींद आने लगी और अस्पताल अस्पताल फ़ोन करने में व्यस्त हो गया।
तारिक भाई नें तो ढाई बजे अपनी बाइक उठाई और आस पास के अस्पताल छान मारे।
उसकी मम्मी को वेंटिलेटर मिल जाये इसके लिए लोगों की मेहनत देख मेरी आँखों के कोने से आंसू निकल कान में जा बैठे।कुछ देर और लगे रहनें के बाद मेरी नींद कब लगी पता नहीं,सुबह लेट उठा और छटपटाते हुए जल्दी से फ़ोन उठाया व्हाटसएप्प खोला देखा तो उन्हें वेंटिलेटर मिल गया था।
बेड से उठा सीधे रसोई में गया और मम्मी को गले से लगा लिया।
#रोजकाकिस्सा #रोजकाकिस्सा3
अगली पोस्ट में उनके और अनुभव आपसे शेयर करूंगा.
[फोटो: मीडिया में कॉविड 19 रिस्पांस टीम और अभिषेक]
Saturday, December 18, 2021
India As I Know: Socio-Economic Changes A Cooperative Society May Bring
इंटरनेशनल कोआपरेटिव अलायन्स (ICA) कॉपरेटिव (सहकारी) को "संयुक्त रूप से स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम के माध्यम से अपनी आम आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से एकजुट व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ." के रूप में परिभाषित करता है. पिछली बार हमने देखा था कि किस तरह से जैतपुर कछया समिति और आईएफएफडीसी ने पर्यावरण और वनीकरण पर काम किया है. अब देखते हैं कि एक समिति क्या क्या सामाजिक आर्थिक बदलाव ला सकती है.
जब भी मैं सामाजिक बदलाव की बात करता हूँ मुख्यत: कुछ पैमानों पर तौलता हूँ- महिल सशक्तिकरण, शिक्षा का प्रसार व विकास, वैचारिक परिवर्तन, सरकारी योजनाओं तक लोगों की पहुँच और स्वास्थ्य.
जैतपुर कछया में 1997 के बाद से क्या क्या बदलाव आये इसके लिए मेरे पास कुछ लोग थे जिनसे बातें करके पता किया जा सकता था.
मैं समिति सचिव अनिल मिश्रा जी से बदलाव के बारे में पूछता हूँ. वो कहते हैं, " सर, ज्यादा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन हमारे गाँव की महिलाएं अब पति से पीटे जाने पर विरोध करने लगी हैं. समिति की मीटिंग में हिस्सा लेने के लिए आती भी हैं और बोलती भी हैं. पहले चुप रह जाती थीं, बड़ों का लिहाज करती थीं. सच को भी सच नहीं कहती थीं. अब सर ऐसा नहीं है."
मेरे लिए ये छोटा बदलाव भी बहुत बड़ा बदलाव था. जो लोग ग्रामीण परिवेश के हैं वो इस बदलाव का बड़ा महत्त्व समझ सकते हैं.
समिति में कुल 140 सदस्य हैं, जिनमें से 60 महिलाएं हैं. जिन्होंने हरी साड़ी पहन कर 5-5 के ग्रुप बनाकर वन सुरक्षा की है. आईएफएफडीसी ने इस क्षेत्र में सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाये जिन्होंने अपने लघु उद्योग शुरू किये, जैसे आटा चक्की लगाई, दुकानें खोलीं, और उनमें से आधे से अधिक सफल भी रहे हैं.
मैं आगे और बदलावों की बात करता हूँ तो सोलंकी जी तपाक से बोल पड़ते हैं 'सर, समिति का एक असर तो इस तरीके से भी देख सकते हैं कि मेरा खुद का बेटा ही मेडिकल की पढाई कर रहा है. सर, लोगों ने बाहर से आने वाले साइंटिस्ट को देखा, अधिकारियों को देखा और अपने बच्चों को भी वैसा ही कुछ अच्छा बनाने का सोचा. आज हमारे गांव में पड़ोस के अन्य गांवों की अपेक्षा ज्यादा लोग ग्रेजुएट हैं और सरकारी नौकरी में हैं.'
मैं धीमे-धीमे कुरेदना शुरू करता हूँ तो वे बताते हैं कि सामूहिक निर्णयन ने बहुत कुछ छोटे छोटे परिवर्तन लाये हैं- महज जैसे बेटी कि शादी के लिए कुछ धनराशि सामूहिक रूप से इकठ्ठा कर के जरूरतमंद को दी जाती है. एक साथ उठने बैठने से सामाजिक- जातिगत अंतर भी कम हुआ है.
'सर, इसके अलावा इस क्षेत्र में जहाँ आधे लोग लकड़ी कि चोरी से जुड़े धंधों से जुड़े हुए हैं. हमारे यहाँ के लोगों को समझ आया है कि वनों को बचाना सिर्फ वन विभाग का काम नहीं है, सामूहिक जिम्मेदारी है. आपको शायद ही हमारे यहाँ से कोई लकड़ी चोर व्यक्ति मिलेगा.'
मैं सब सुन रहा हूँ. 'और आर्थिक पक्ष?' मैं पूछता हूँ.
'सर हमारी समिति सच कहें तो हर सदस्य के परिवार के लिए साल भर का राशन तो नहीं जुटा पा रही है लेकिन साल में एक बार हम उन्हें गिफ्ट में कुछ जरूर देते हैं.' 3 चौकीदार हैं, जो अपने खेतों के साथ वन सुरक्षा भी करते हैं. शुरुआत में जब हम वृक्षारोपण कर रहे थे तो रोजगार उपलब्ध हुआ था. नर्सरी से कुछ लोगों को रोजगार मिल जाता है साथ ही गरीब लोगों को प्रूनिंग (टहनियों की आवश्यक काट छांट) के बाद की जलाओ लकड़ी फ्री में मिल जाती है.'
समिति के आय के स्त्रोतों में जलाऊ लकड़ी का बिकना, आईएफएफडीसी द्वारा नर्सरी के पौधों को खरीदना, जंगल में उगे फलों- आंवला और सीताफल का बिकना शामिल है. जिससे तरकरीबन वार्षिक 3-3.5 लाख कि कमाई समिति की हो रही है. एक 265 हेक्टेयर भूमि स्वामित्व वाली किसी भी समिति के लिए ज्यादा नहीं है किन्तु पर्यावरण पर काम करने वाली और वन-निधि संरक्षित करने वाली संस्था के लिए काफी है.
मैं आय के साधन बढ़ाने के उपाय जानने के लिए हरीश गेना जी से बात करता हूँ. वो अपने फ्यूचर प्लान के बारे में बताते हैं-
1. सर, हमने टीएफआरआई (TFRI:Tropical Forest Research Institute) से लाख कल्टीवेशन के लिए एमओयू साइन किया है.
2. एफआरआई देहरादून से एमओयू साइन है. हमें उच्च गुणवत्ता के पौधों का निर्माण नर्सरी से करना है.
3. समिति और आस पास कि समिति के पास सीताफल बहुत उगता है. इसलिए हम सीताफल से पल्प की प्रोसेसिंग मशीन लगाने वाले हैं.
4. स्थानीय देशज उत्पाद बिक्री के लिए ट्राइफेड से एमओयू साइन किया है जिसका विस्तार हम इस समिति तक भी कर रहे हैं.
5. वर्मीकम्पोस्ट पर भी हम काम करेंगे
6. पहले भी हमने सफ़ेद मूसली, अश्वगंधा जैसी औषधियां लगाई थीं, एक वर्ष यकायक से मार्केट बैठ गया तो यह फायदे का सौदा नहीं रहा किन्तु औषधि उत्पादन भी हम इस समिति में पुनः शुरू करेंगे.
वो आगे बताते हैं कि उत्तराखंड में आईएफएफडीसी ने तेजपत्ता से कई समितियों कि आय अच्छी की है, आसाम में समिति को टूरिज्म एक्टिविटी से जोड़ा है और सर्टिफाइड सीड्स के लिए भी प्राइवेट कंपनियों से एमओयू साइन किये हैं. समितियों की आय कैसे बढ़ाई जाए, इसके लिए आईएफएफडीसी के पास कोई एक्सपर्ट ग्रुप नहीं है. एक डेडिकेटेड ग्रुप बनाने का आगे प्लान जरूर है.
97वे में संविधान संसोधन द्वारा क्यों कोआपरेटिव शब्द अनुच्छेद 19(1)(स) में जोड़ा गया था. (जुलाई 2021 में उच्चतम न्यायलय के आदेशानुसार निरश्त किया गया) तब मुझे इसका महत्त्व समझ नहीं आया था. सहकारी समिति के सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों को देख कर और एक समिति को बड़े पास से देखकर समझ आया.
किसी भी सहकारी समिति के सफल होने में
1. लचीले एवं आवश्यकता, सुविधा अनुरूप सहकारी नियम
2. जिम्मेदारी व् जवाबदेही
3. पूँजी निर्माण में समर्थता
का बड़ा योगदान होता है.
किन्तु सहकारी समितियों को नीति निर्माताओं और जनता दोनों के बीच आर्थिक संस्थानों के रूप में मान्यता कम ही दी जाती है और उनका आर्थिक- आत्मनिर्भरता में महत्त्व भी कम ही समझा जाता है. इसलिए अक्सर वे आर्थिक बदलाव में अधिक सफल नहीं हुई हैं.
जुलाई 2021 में सरकार ने सहकारिता मंत्रालय नाम से अलग मंत्रालय का निर्माण किया है. यह अलग मंत्रालय एक सराहनीय प्रयास है. देखते हैं हम सहकारिता के बाकि उद्देश्यों में आगे चलकर कितना सफल हो पाते हैं.
जैतपुर कछया में सामाजिक बदलाव के दूसरे पैमानों के अलावा दो बड़े मानक: सरकारी योजनाओं तक लोगों कि पहुँच और स्वास्थ्य पर भी अच्छा काम हुआ है लेकिन समिति के अलावा इसमें अन्य सरकारी संस्थाओं ग्राम पंचायत और आंगनवाड़ी की भी महती भूमिका रही है.
जैतपुर कछया अपने उद्देश्यों में काफी हद तक सफल रही है और आगे बढ़ रही है.
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क्या आपको देश की सबसे सफल कॉपरेटिव का नाम पता है?
नहीं पता?
उत्तर है-- गुजरात मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (GCMMF)
क्या? नाम नहीं सुना? अमूल सुना है??
देश का सबसे बड़ा डेयरी प्रोडक्ट ब्रांड अमूल इसी का एक ब्रांड है. 1946 में जन्मे, आजाद देश से एक साल पुराने, 13 ज़िलों, 13000 गांवों में फैले इस कॉपरेटिव सोसाइटी के तकरीबन 36 लाख लोग सदस्य हैं.
अमूल को जिसने अमूल बनाया वो थे 30 साल इसके चेयरमैन रहे, मिल्कमैन ऑफ इंडिया श्री वर्गीज कुरियन जी. उनके बारे में और देश की सबसे सफलतम कॉपरेटिव ने लोगों में क्या सामाजिक आर्थिक बदलाव लाए इसके बारे में फिर कभी.
[आर्टिकल के तथ्य एक सैंपल डाटा और लोगों के साथ किये गए विमर्श पर आधारित हैं.
फोटो: समिति द्वारा संचालित नर्सरी ]
2017 में पहली बार #indiaasiknow टाइटल से लिखा था. बाकी सब यहां पढ़ा जा सकता है-
http://sadaknama.blogspot.com/search/label/India%20As%20I%20Know?m=0
Tuesday, December 14, 2021
India As I Know: Couple with a Forest Dream. The SAI Sanctuary Story
साई सैंक्चुअरी (SAI (Save Animals Initiative) Sanctuary) ब्रह्मगिरि पहाड़ियों की तलहटी (foothills) में स्थित एक वन्यजीव अभ्यारण्य है. ब्रह्मगिरि हिल्स कोडागु जिले, कर्नाटक में स्थित हैं. ये वही पहाड़ियां हैं जहाँ से कावेरी नदी निकलती है. वही नदी जिसका पानी प्राप्त करने के लिए तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारें और किसान युद्धरत रहते हैं, ये वही ब्रह्मगिरि हिल्स हैं जहाँ पर प्रसिद्ध ब्रह्मगिरी वन्यजीव अभ्यारण्य स्थित है. लेकिन फिर भी मैं यहाँ मात्र 300 एकड़ में फैले साई सैंक्चुअरी की बात क्यों कर रहा हूँ? इसमें ऐसा क्या है?
साई सैंक्चुअरी देश का पहला और एक मात्र प्राइवेट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी है. एक युगल पामेला और अनिल मल्होत्रा 1991 में हिमालय से लौट कर यहां आते हैं और शुरू में 12 एकड जमीन खरीद कर इसकी अवधारणा रखते हैं. अनिल पिता की बीमारी के कारण अमेरिका से लौट कर वापिस आये थे. जब पिता की मृत्यु उपरांत अस्थिविसर्जन हेतु पामेला और अनिल हरिद्वार गए तो हिमालय देख कर यहीं का होने का निश्चय लिया लेकिन वक्त के साथ उन्हें समझ आया कि अगर जंगलों को नहीं बचाया तो न तो बारिश होगी, न पानी बचेगा और न ही हम ये जैवविविधता ,(Bio Diversity) देख पाएंगे. इसलिए उन्होंने एक वर्षावन (Rain Forest) बनाने का निर्णय लिया.
1991 में वे दक्षिण आ गए और ब्रह्मगिरि हिल्स के पास 12 एकड जमीन खरीदी. इनके लिए ज़मीन खरीदना इतना आसान नहीं था. भारत में कानूनन पेंच और इनका बाहरी होने के कारण इन्हें ज़मीन आसानी से नहीं मिल रही थी, साथ ही जानने वालों ने इन्हें बेवकूफ कहा. कारण? कौन व्यक्ति अपनी सारी जमा पूँजी लगाकर जमीन ख़रीददता है और वो भी एक जंगल बनाने! इससे किसका फायदा है? आर्थिक लाभ (Economic Benefits) क्या होंगे?
लेकिन पामेला का ये जूनून था और अनिल को पामेला से प्यार, इसलिए एक ऐसा जंगल बना जिसे हम आज साई सैंक्चुअरी के नाम से जानते हैं.
ब्रह्मगिरि वन्यजीव अभयारण्य के साथ स्थित यह प्राइवेट अभ्यारण्य 1.2Km की एक एक्स्ट्रा बफर ज़ोन का निर्माण करता है. यहां से एक नाला भी बहता है.
बहुत सारी तितलियों, सभी तरह के पक्षियों, तेंदुओं, चीतल, हाथियों, बार्किंग डियर का ये घर है.
'यहां आकर जंगली जानवर बच्चों को जन्म देते हैं क्यूंकि वो यहाँ ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं.जेड पामेला एक इंटरव्यू में बताती हैं.
रेनफॉरेस्ट दुनिया में पानी, बादल निर्माण, जल स्त्रोतों और ऑक्सीजन देने के लिए जाने जाते हैं. जहाँ कावेरी नदी के लिए हम लड़ रहे हैं, वहीँ हमने कभी कावेरी नदी सिस्टम, उसके आसपास के जंगल को बचाकर नदी जल स्तर सुधारने का कभी सोचा ही नहीं है उल्टा पश्चिमी घाट को ख़त्म ही करते जा रहे हैं. इसलिए साई सैंक्चुअरी हाई होप्स (बड़ी उम्मीद) बनकर सामने आता है.
'हमने शुरू में ही निर्णय लिया था कि हमारे बच्चे नहीं होंगे, मतलब मानव संतान (Human Offsprings). लेकिन हमारे इतने सारे बच्चे होंगे कि एक भरे पूरे जंगल का निर्माण करेंगे ये नहीं सोचा था.' अनिल ने एक इंटरव्यू में बताया था. 'जो ख़ुशी हमें यहाँ मिली दुनिया में शायद कहीं और किसी काम में नहीं मिलती.' पामेला ने उसी इंटरव्यू में कहा.
भगवत गीता के निस्स्वार्थ सेवा कर्म का पामेला और अनिल मल्होत्रा एक अपूर्व उदहारण हैं. जिन्होंने अपनी जीवनभर कि पूँजी सिर्फ आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य बचाने के लिए कुर्बान कर दी. वे उदहारण हैं कि यदि बड़े कॉर्पोरेट हाउस ऐसे ही जंगल आवश्यकता अनुरूप खड़ा करें तो महाराष्ट्र एवं देश के अन्य हिस्सों की पानी की समस्या को काम किया जा सकता है.
ये कहानी इसलिए भी सुना रहा हूँ क्यूंकि पिछले महीने, 22 नवंबर 2021 को अनिल मल्होत्रा का 80 की उम्र में निधन हो गया है. लेकिन जो वे पीछे छोड़ के गए हैं वो वर्षों याद रखा जायेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए उदहारण बना रहेगा.
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ऐसी कहानियां हमें जिंदा रखती हैं. जहां लोग जंगलों को उजाड़ रहे हैं, सरकारी पैसे और वन विभाग की अथाह मेहनत से बने प्लांटेशन पर कब्ज़ा कर रहे हैं वहीं अनिल और पामेला गेल मल्होत्रा जैसे उदाहरण हमारे बीच हैं.
[फोटो: खुद के विकसित किए जंगल में अनिल और पामेला]
Wednesday, December 8, 2021
India as I Know: Solanki, IFFDC and 19331 Unsung Environmental Heroes
वन विकास और विस्तार (Forest Development and expansion) के लिए काम करने वालों में सबसे पहले हमारे दिमाग में ये नाम आते हैं- शायद फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया जादव पेयेंग का या स्वयं 122 हेक्टेयर बैरन लैंड (अनुर्वर भूमि) खरीद कर जंगल खड़ा करने वाले दंपत्ति पामेला और अनिल मल्होत्रा. (अगर इनके नाम आपने नहीं सुने हैं तो कमेंट में लिखिए, मैं अगली पोस्ट में इनके बारे में लिखूंगा.) लेकिन मैं इनके अलावा एक नई कहानी कहने जा रहा हूं.
मैं जहां पोस्टेड हूं पहले दिन ही एक व्यक्ति मिलने आते हैं मिलनसार, हंसमुख, स्पष्टवादी. उनकी समस्या सुनता हूं और स्टाफ से उनके बारे में पूछता हूं.
'सर ये दीनानाथ सिंह सोलंकी जी हैं. एक समिति के अध्यक्ष हैं. समिति ने 265 हेक्टेयर का जंगल खड़ा कर दिया है. तमाम उदहारण मेरे पास में इस क्षेत्र में जंगल उजाड़ने वालों के हैं, लकड़ी चोरों के हैं. इसलिए में क्यूरियस हो जाता हूँ. मैं सोलंकीजी के बारे में पता करता हूं, उनसे मुलाकात करता हूं तो एक नई दुनिया ही सामने आती है.
बात 1998 की है. सागर के देवरी-गौरझामर क्षेत्र में वेस्टलैंड मैनेजमेंट (बंजर/ऊसर भूमि प्रबंधन) के लिए कुछ ज़मीनों को आईएफएफडीसी की पहल पर समितियों को आवंटित किया गया. उद्देश्य था- वन विकास और विस्तार. इस प्रोजेक्ट को फाइनेंस भी आईएफएफडीसी के माध्यम से ही किया गया.
जैतपुर कछिया उन्हीं में से एक समिति थी जिसके अध्यक्ष है दीनानाथ सोलंकी जी. इस समिति ने 23 साल के प्रयास से 265 हेक्टेयर का एक बड़ा जंगल खड़ा कर दिया है जिसमें न सिर्फ विभिन्न प्रकार के पेड़ बल्कि नीलगाय, चिंकारा जैसे विभिन्न जंगली जानवर और ढेर सारे पक्षियों के आसियाने भी हैं. मतलब एक भरा पूरा जंगल.
हर समिति/ संस्था के सफल नहीं हो सकती जबतक एक कुशल नेतृत्व, अच्छा निर्देशन और समूह के ईमानदारी से किये गए अथक प्रयास न हों.
मैं उनसे समिति की सफलता के राज पूछता हूँ.
वह और समिति के सचिव अनिल मिश्रा जी बताते हैं-
1. साफ नियत.
2. सबके साथ लेकर के किया गया प्रयास.
3. समिति सदस्य एवं गांव के हर व्यक्ति की सहभागिता.
4. 95% सामूहिक सहभागिता से लिए गए निर्णय और
5. अध्यक्ष का मैनेजमेंट उनकी सफलता का सहभागी है
साथ में हमारा रोपण बहुत अच्छा रहा, स्पेशलिस्ट ने जो भी हमें जानकारी दी उसका हमने सदुपयोग किया. कौन सी जमीन में कौन सा पौधा रोपण करना है स्पेशलिस्ट के बताने के अलावा हमें अनुभव के साथ आया. साथ में हमारे गांव के लोगों में समर्पण की भावना भी है.
मैं उनसे फिर पूछता हूं कि देवरी तहसील (जिला सागर म.प्र.) में ही सरखेड़ा समिति है या जिला टीकमगढ़ (म.प्र.) की मोहनगढ़ समिति है वे इतनी सफल नहीं हैं. उसके पीछे का कारण क्या है?
वह बोलते हैं कि इसमें मुख्य बात यह है कि-
1. इन समितियों में 3 से 5 गांव के लोग सदस्य तो गांव के हिसाब से लोगों कि सोच बाँट जाती है, उद्देश्य बाँट जाते हैं. अब सोच के बंटवारा होता है तो असफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. समिति में एक ही सोच के व्यक्ति हों तो सफलता की संभावनाएं ज्यादा होती हैं.
2. कुछ जगह पर गलत एवं लालची लोगों को जुड़ाव भी समिति में हुआ है.
3. कुछ जगह पर ऐसा हुआ है कि शुरुआत में पौधों की देख रेख अच्छे से नहीं पाई. पौधों का विकास अच्छा नहीं हुआ तो लोगों का लगाव कम हो गया.
4. कुछ जगह पर मैनेजमेंट बहुत अच्छा नहीं रहा और
5. कहीं खाते के आय-व्यय में पारदर्शिता नहीं रही.
इसी बीच में सोलंकी जी से हंसते-हंसते पूछ लेता हूं कि 'कहां तक पढ़े हैं?' सोलंकीजी पहले थोड़ा सा असहज होते हैं फिर मुस्कुरा कर कहते हैं 'सर, पांचवी पास हूँ.' भले ही वे पांचवी तक पढ़े हैं लेकिन उनके द्वारा किया गया काम, उनके द्वारा लिए गए निर्णय, उनकी लीडरशिप क्वालिटी किसी बड़े मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट से पढ़े हुए व्यक्ति से भी बेहतर है. इसलिए वह राष्ट् स्तर पर आईएफएफडीसी के निर्देशक मंडल के ग्यारह सदस्यों में से एक हैं.
मैं सोलंकी जी से नंबर लेकर हरीश गेना जी, चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर से बात करता हूं और वही प्रश्न दोहराता हूं. वो बोलते हैं हमने 1993 के बाद समितियों को जब चुनाव किया तो कम्युनिटी मैनेजमेंट, अध्यक्ष की रूचि और सेल्फलेसनेस को ध्यान में रखा.
फिर मैं उन पर नया सवाल दाग देता हूं कि "आपने जो जमीन और सोसाइटी के लिए लोगों को चयन किया, क्षेत्र का चयन किया तो क्या-क्या मापदंड रखे थे?"
वह कहते हैं "हमारा पहला उद्देश्य था कि जिस हम जमीन का सिलेक्शन करें वह जमीन डेढ़ सौ हेक्टेयर के करीब वेस्टलैंड (अनुपयोगी या बंजर ज़मीन) होना चाहिए .साथ में जो लोग जुड़े हैं उनकी प्रोफाइल लो (आर्थिक रूप से पिछड़ा तबका) होना चाहिए. अधिकतर लोग मार्जिनल सेक्शन से, खेतिहर मजदूर या भूमिहीन किसान होने चाहिए. हमने ग्राम पंचायत से मीटिंग की पीआरए (Participatory rural appraisal)* एक्सरसाइज की और फिर कम्युनिटी के साथ मिलकर के सब कुछ प्लान किया. हमने वीमेन पार्टिसिपेशन (महिलाओं की सहभागिता) का विशेष ध्यान रखा. इसीलिए जब फारेस्ट प्रोटेक्शन ग्रुप (वन संरक्षण समूह) बनाये तो उसमें से 50-60% तक महिलाएं थीं.
मैं डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर आरके द्विवेदीजी से भी बात करता हूं. उनसे मेरा सबसे पहला प्रश्न यह होता है कि 'यह पहले से ही दिमाग में था कि हमें ग्रासरूट लेवल पर लीडरशिप डेवलपमेंट करनी है और सोलंकीजी जैसे ग्रासरूट लेवल से उठकर आये लीडर्स को नेशनल लेवल पर लाकर के डायरेक्टर बनाना है?'
वह कहते हैं 'हां, हमारा शुरुआत से ही उद्देश्य था. लोगों में सेंस ऑफ ओनरशिप (स्वामित्व की भावना) विकसित करना, माइक्रोमैनेजमेंट, माइक्रोफाइनेंस गांव-गांव में सिखाना और वीमेन पार्टीशन बढ़ाना और जो लीडरशिप डेवलप हो उसको एक बड़ा प्लेटफार्म देना.'
पंचायत अधिनियम के उद्देश्य मेरे सामने घूमने लगते हैं. उनके भी कुछ कुछ ऐसे उद्देश्य थे. वे कितने सफल हुए हैं?
आईएफएफडीसी शब्द हम बार बार प्रयोग कर रहे हैं तो अब हम इसे भी जान लेते हैं. इफको (IFFCO: Indian Farmers Fertiliser Cooperative ) ने 1993 में 'इंडियन फार्म फॉरेस्ट्री डेवलपमेंट कोऑपरेटिव लिमिटेड' (आईएफएफडीसी) नामक एक अलग बहु-राज्य सहकारी समिति को बढ़ावा दिया, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबों, आदिवासी समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के लिए स्थायी प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के माध्यम से पर्यावरण के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को कम करना था और विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना था.
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड में अब तक 29,421 हेक्टेयर बंजर भूमि को बहुउद्देशीय जैव विविधता वन के रूप में विकसित किया गया है. ये वन समुदाय की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं और सालाना लगभग 1.41 लाख टन वायुमंडलीय कार्बन का संग्रह कर रहे हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद मिल रही है. इन वनों का प्रबंधन 152 ग्राम स्तरीय प्राथमिक कृषि वानिकी सहकारी समितियों (पीएफएफसीएस) द्वारा किया जाता है, जिसमें 19,331 सदस्य हैं, जिनमें से लगभग 38 प्रतिशत भूमिहीन हैं, 51 प्रतिशत छोटे/सीमांत किसान हैं. महिलाओं की कुल सदस्यता का 32 प्रतिशत हिस्सा है.
वर्तमान में, आईएफएफडीसी कृषि वानिकी, एकीकृत वाटरशेड विकास, जलवायु प्रूफिंग, ग्रामीण आजीविका विकास, महिला सशक्तिकरण, सीएसआर (Corporate Social Responsibility) आदि पर 22 परियोजनाओं को लागू कर रहा है. इससे 8 राज्यों के लगभग 9,554 गांवों में किसानों और ग्रामीण गरीबों की आय बढ़ाने में मदद मिली है. नाबार्ड और राज्य सरकारों की साझेदारी में विभिन्न राज्यों में वाटरशेड के तहत 17,330 हेक्टेयर विकसित करके लगभग 15,171 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को सिंचाई के तहत लाया गया. महिला सशक्तिकरण के लिए, IFFDC कौशल और सूक्ष्म उद्यम विकास आदि के माध्यम से 18,465 सदस्यों (95 प्रतिशत महिला सदस्यों) वाले 1,825 स्वयं सहायता समूहों (SHG) का पोषण कर रहा है.
इफको ने बीज उत्पादन कार्यक्रम (एसपीपी) आईएफएफडीसी को सौंपा है. तदनुसार, आईएफएफडीसी ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान राज्यों में स्थित अपनी 5 अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी बीज प्रसंस्करण इकाइयों (एसपीयू) के साथ किसानों के खेतों पर विभिन्न फसलों की उच्च उपज और आशाजनक किस्मों का एसपीपी शुरू किया है. वर्ष 2019-20 के दौरान कुल 3.73 लाख क्विंटल प्रमाणित धान, हाइब्रिड धान, मूंग, सोयाबीन, उड़द, तिल, हाइब्रिड बाजरा, हाइब्रिड मक्का, सूडान ज्वार घास खरीफ और गेहूं, जौ, चना, सरसों, जीरा, बरसीम के दौरान प्रमाणित इफको किसान सेवा केंद्र (एफएससी), इफको-ई बाजार, आईएफएफडीसी किसान सेवा केंद्र (केएसके), आईएफएफडीसी कृषि वानिकी सेवा केंद्र (एएफएससी) और प्राथमिक कृषि वानिकी सहकारी समितियों (पीएफएफसीएस) के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराई गई.
आईएफएफडीसी राष्ट्रीय तिलहन और पाम आयल मिशन (एनएमओओपी) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम), भारत सरकार की मिनीकिट योजना के तहत कृषि विभाग को बीज की आपूर्ति करता है. वर्ष 2019-20 के दौरान 16 विभिन्न फसलों के कुल 385 किलोग्राम सब्जी बीज भी किसानों को उपलब्ध कराए गए हैं.
साथ ही अभी यह संस्था ToF (Trees Outside Forest ) प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है. एग्रोफोरेस्ट्री विकास में जोर शोर से काम कर रही है.
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नवंबर की सर्द रात है. रात (या सुबह) के 3 बजने को हैं. मैं रात्रि गश्ती पर हूँ. एक टीम दूसरी तरफ गश्तिरत है. मेरा फ़ोन बजता है. 'सर, एक अपराधी पकड़ा है. पेड़ काट रहा था.'
'कहाँ पर?' मैं पूछता हूँ.
'सर, कछया के पास से.'
'उफ्फ्फ्फ़....'
यह देश की एक दूसरी तस्वीर है. जहँ पर आईएफएफडीसी और सोलंकीजी जैसे लोग जंगल ऊगा रहे हैं वहीँ कुछ असामाजिक तत्व जंगल को काटने पर तुले हुए हैं.
वन विकास और वन सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है. जैव विविधता बनाये रखने, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में आईएफएफडीसी की समितियों के मात्र 19331 सदस्य नहीं बल्कि हम सबके सामूहिक सहयोग की आवश्यकता होगी.
[ *Participatory rural appraisal (PRA) is an approach used by non-governmental organizations (NGOs) and other agencies involved in international development. The approach aims to incorporate the knowledge and opinions of rural people in the planning and management of development projects and programmes.
आईएफएफडीसी के बारे में जानकारी साभार इफको कि वेबसाइट से.]
Sunday, December 5, 2021
India As I Know: The untold story of Udaypur MP
विदिशा जिले की गंजबासोदा तहसील के उदयपुर-घटेरा क्षेत्र का उत्खनन क्षेत्र तरकरीबन 200 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है जिसमें वैध-अवैध खदानें राजस्व एवं वन दोनों क्षेत्रों में हैं.
Sunday, June 27, 2021
मेघनाथ (मेघनाद) यथार्थ
रामायण में मेघनाथ का किरदार विजय अरोरा जी ने निभाया है. जो अपने समय में एक प्रसिद्द फिल्म अभिनेता रहे हैं. यादों की बारात और इंसाफ जैसी प्रसिद्द फिल्म्स उनके खाते में हैं. अपने समय में वो अपनी प्रियतम मुस्कान के लिए जाने जाते थे. कहते हैं, उन्होंने राम के किरदार के लिए भी ऑडिशन दिया था. ये पोस्ट लेकिन विजय अरोरा नहीं मेघनाथ के बारे में है.
मेघनाथ का किरदार रामायण का बड़ा अद्भुत किरदार है. मेघनाथ-लक्ष्मण युद्ध जितना प्रसिद्द है उतनी ही रौचक मेघनाथ के जन्म की कहानी भी है.
रावण बड़ा प्रतापी था किन्तु बाली और सहस्त्रबाहु अर्जुन से युद्ध में हारा भी था. इसलिए उसे पुत्र के रूप में अपने से भी ज्यादा बड़े योद्धा की कामना थी. ज्योतिष के महाज्ञानी रावण ने इसके लिए एक उपाय किया. उसने सारे ग्रहों को मेघनाथ के जन्म के समय ज्योतिष के ग्यारहवें घर में (11th house of horoscope ) जाने का आदेश दिया. कहते हैं अगर सारे ग्रह ग्यारहवें घर में हो तो इस वक्त में उत्पन्न व्यक्ति पत्थर को भी छूने से सोना कर सकता है. बहुत ही वैभवशाली-कीर्तिवान व्यक्ति उत्पन्न होता है.
रावण के डर से सारे ग्रह देवों ने उसकी बात मानी, सिर्फ शनिदेव को छोड़कर. वे उस वक्त बारहवें घर में बैठ गए और बाद में यही मेघनाथ की मृत्यु का कारण भी बना. रावण शनिदेव की इस हरकत से इतना क्रोधित हुआ कि उसने उन्हें बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया. मेघनाथ का जन्म हुआ तो 8 ग्रह ज्योतिष के ग्यारहवें घर (11th House of Horoscope) में थे. इसलिए वह बड़ा प्रतापी था. उसने पैदा होते ही मेघ सी गर्जना में प्रथम क्रंदन किया. इसलिए उसका नाम मेघनाथ रखा गया.
पुराणों अनुसार योद्धाओं की महामहरथी, अतिमहारथी, महारथी, अतिरथी और रथी नाम से पांच श्रेणियां हैं. महामहारथी में ब्रह्मा, विह्णु, महेश, गणेश, शक्ति और कार्तिकेय बस आते हैं. अतिमहारथियों में ब्रह्मा, विष्णु. महेश के अवतारों (राम, कृष्णा, परसुराम, हनुमान, वीरभद्र इत्यादि) के अलावा बस मेघनाथ और अर्जुन ही आते हैं. रावण और लक्ष्मण महारथी माने जाते हैं.
मतलब मेघनाथ लक्ष्मण और रावण से भी बड़ा योद्धा था!
एक बार रावण को देवताओं से युद्ध हुआ और युद्ध में रावण को इंद्र ने बंदी बना लिया. जब मेघनाथ को पता चला तो उसने अकेले ही देवलोक पर चढ़ाई कर दी और इंद्र को बंदी बनाकर लंका ले आया. वह इंद्र का वध करने ही वाला था कि ब्रह्मा जी प्रकट हुए उन्होंने उसे इंद्र को छोड़ने को कहा. बदले में मेघनाथ ने ब्रह्मा से ब्रह्मास्त्र के अलावा अमरता का भी वर मांगा. ब्रह्मा ने अमरता का वर देने से मना कर दिया किंतु उसे वरदान दिया कि अगर वह अपनी कुलदेवी प्रत्यंगिरा माता के लिए निकुम्भिला यज्ञ करेगा तो उससे उसे एक रथ प्राप्त होगा. जिसपे बैठ वह सारे युद्ध जीत सकता है. अगर वह उस रथ पे बैठा है तो कोई भी योद्धा उसे मारने में सक्षम नहीं होगा. किन्तु यज्ञ भांग करने वाला ही उसे मारने में सक्षम भी होगा! कहते हैं ब्रह्मा ने ही मेघनाथ को इंद्रजीत नाम भी दिया था.
वैसे मेघनाथ संसार का एकमात्र योद्धा था जिसके पास ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र और नारायणास्त्र थे. द्वापर युग में अर्जुन के पास पशुपतास्त्र और ब्रह्मास्त्र तो थे किन्तु नारायणास्त्र नहीं था. हालाँकि स्वयं नारायण श्रीकृष्ण रूप में उनके साथ थे.
राम-रावण युद्ध में मेघनाथ ने तीन दिन युद्ध किया. पहले ही दिन उसने ब्रह्मास्त्र से 67 करोड़ वानरों का वध कर सुग्रीव की लगभग आधी सेना ख़त्म कर दी. साथ राम लक्ष्मण को भी मूर्छित कर दिया था.
युद्ध के दूसरे दिन अपनी मायावी शक्तियों से उसने बड़ा तीव्र युद्ध किया और एक अदृश्य तीर से 'वासवी शक्ति' का लक्ष्मण पर प्रयोग किया, जिससे वो मूर्छित हो गए. वासवी शक्ति क्षण भर में व्यक्ति को परलोक पहुँचाने में सक्षम थी किन्तु लक्ष्मण बलशाली वीर थे इसलिए वो सिर्फ मूर्छित हुए. सूर्योदय के पहले अगर उपचार न किया जाता तो कालकवलित हो सकते थे. इसलिए ही हनुमान संजीवनी बूटी लेने गए और पूरा का पूरा द्रोणगिरि पर्वत उठा लाये.
जब मेघनाथ को पता चला की लक्ष्मण बच गए हैं तो वह अपनी कुलदेवी प्रत्यंगिरा माता के लिए निकुम्भिला यज्ञ करने लगा. लेकिन विभीषण ने लक्ष्मण को ब्रह्मा जी के वरदान से अवगत कराया और लक्ष्मण रात्रि में ही यज्ञ विध्वंश करने के लिए निकल पड़े.
कथाओं अनुसार यज्ञ भंग होने के बाद मेघनाथ ने यज्ञ में प्रयुक्त बर्तनों से ही युद्ध करना शुरू कर दिया. बाद में जब वो अस्त्र के ले वापस आया तो ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी लक्ष्मण पर किया किन्तु ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण की परिक्रमा कर के वापस मेघनाथ के पास आ गया.
मेघनाथ समझ गया कि लक्ष्मणजी वो वीर हैं जिनसे वह मृत्यु को प्राप्त होगा इसलिए वह कुछ देर के लिए युद्धक्षेत्र छोड़ रावण को समझाने के लिए भी गया. किन्तु दम्भ में चूर रावण ने उसकी एक न सुनी. साथ ही पितृाज्ञा न मानने के कारण मेघनाथ का अपमान भी किया.
मेघनाथ ने रावण से आज्ञापालन न करने के कारण क्षमा मांगी और पुनः रणभूमि में आ युद्ध करना प्रारम्भ किया. लक्ष्मण ने अंजलीकास्त्र से मेघनाथ का सर धड़ से अलग कर दिया. (इसी अस्त्र से द्वापर युग में अर्जुन ने कर्ण का वध किया था.) इस तरह मेघनाथ मृत्यु को प्राप्त हुआ.
कथाओं अनुसार ब्रह्मा से मेघनाथ को एक और वर प्राप्त था कि वह उसी योद्धा से मृत्यु को प्राप्त होगा जो 12 वर्षो तक सोया न हो. लक्ष्मण राम-सीता की सेवा करते-करते वन में बारह वर्षों से सोये नहीं थे. इसलिए भी मेघनाथ को मारने में सफल रहे.
एक कथा अनुसार मेघनाथ ने शेषनाग कि पुत्री सुलोचना से बिना अनुमति के विवाह किया था. इसलिए शेषनाग ने दंड देने के लिए लक्ष्मण के रूप में मेघनाथ का वध किया था.
हालाँकि मेघनाथ कि पत्नी सुलोचना पति वियोग सह नहीं पाई और समाचार सुनने के पश्चात् ही मृत्यु को प्राप्त हुई!
हिंदी में एक कहावत है कि जैसी संगत वैसी रंगत. मतलब आप बुराई के साथ हैं तो आप भी बुरे होंगे. भले ही आप कितने भी बलशाली रहे हों. मेघनाथ भी उसका एक उदहारण है. किन्तु साथ ही पितृआज्ञा का अक्षरश: पालन करने वाले पुत्र के रूप में भी उसे याद किया जाता रहेगा.
- Vivek Vk Jain
(Photo: Internet) #Meghnath #Ramayana

