Saturday, April 4, 2015

हिन्दी-नाटक | नाट्य-भाषा

नाटक या नाट्य में प्रयुक्त भाषा को नाट्यभाषा कहते हैं। भरत के अनुसार नाट्य या नाटक वह है जो लोकस्वभाव को अंगादि के अभिनय की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है। अभिनवगुप्त के अनुसार नाट्य नटनीय नर्तन है। इससे स्पष्ट है कि भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नाट्य और नृत्य में अभिनय की आवश्यकता है। दोनों की अपनी मुखोच्चरित भाषा होती है। नृत्य में गीतों की प्रमुखता रहती है तो नाटक में गद्य और पद्य की सहायता से (आधुनिक संदर्भ में) भावाभिव्यक्ति की जाती है। मूल रूप से दोनों सुंदर कला रूप हैं। नर्तक या नर्तकी नृत्य में नृत्यभाषा का इस्तेमाल करते तो नाटक में नट या नटी नाट्यभाषा से अपनी विचाराभिव्यक्ति करते हैं। इन दोनों की शारीरिक भाषा लगभग एक ही है यद्यपि नृत्य की शरीरभाषा में संकीर्णता है। यह सुव्यक्त है कि नृत्य और नाट्य का अर्थ शास्त्र द्वारा पूर्वनिर्धारित होने से अत्यधिक संकेतित है। इस प्रकार, छोटे-मोटे भेदों के होने पर भी नृत्य और नाट्य परस्पर बहुत अधिक संबंध रखते हैं।
आचार्य भरत और अभिनवगुप्त के मंतव्यों को और स्पष्ट करते हुए वेदबन्धु‘ताण्डवलक्षण‘में नृत्य को नाट्य से अलग नहीं मानते। उन्होंने कहा कि ”भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नृत्य, नाट्य का एक अंग है। भरत के व्याख्याताओं ने नाट्य और नृत्य को एक ही कलारूप बताया है। भरत के व्याख्याता हर्ष ने बताया कि रसों और भावों को व्यंजित आँखों, कपोलों, ओष्ठों और अन्य अंगों का पूर्ण या अपूर्ण अनुकरण ही नाट्य तथा नृत्य में होता है। इसलिए नाट्य एवं नृत्य को परस्पर कैसे अलग कर सकते हैं ‘ भट्टतौत और भट्टलोलट ने भी कहा है कि नाट्य ही नृत्य है। तात्पर्य यह है कि नृत्य एक प्रकार का नाट्य ही है।” यदि आचार्यों के द्वारा नाट्य और नृत्य अलग-अलग कलारूप नहीं माने जाते तो उनकी भाषा भी अलग-अलग नहीं हो सकती। अतः नाट्यभाषा के संबंध में कहते वक्त भाषा की संरचनात्मक विशेषताओं के साथ-साथ आंगिक, सात्विक आदि अभिनय को सूचित करने के लिए रचनाकारों की ओर से स्वीकृत एवं प्रयुक्त भाषेतर पद्धतियों पर भी ध्यान देना चाहिए। नाट्य रूपों में कृतिकार के मानसिक व्यापारों, उद्देश्यों एवं विचारों को दर्शकों तथा पाठकों तक पहुँचाने का श्लाघनीय कार्य प्रमुख रूप से नाट्यभाषा के माध्यम से किया जाता है।
अन्य काव्य रूपों जैसे कविता, उपन्यास, कहानी आदि साहित्यिक विधाओं की भाषा की संरचना की तुलना में नाटक की भाषा याने नाट्यभाषा नाटकीय परिवेश के कारण अलग रहती है। नाट्यभाषा का स्वरूप, संरचना, आकार तथा उसका महत्त्व अन्य विधाओं की भाषिक संरचना पद्धति से बहुत अधिक भिन्न है। नाटक को छोडकर अन्य सभी साहित्यिक विधायें केवल पढने के लिए रची जाती हैं। अतः उनकी वाचन शैली सीधी और सरल है। लेकिन नाटक नट और नटी द्वारा मंच पर जीवन्त कार्यव्यापार के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से संरचित वाचन शैली अभिनयोन्मुख है और उसका महत्त्व उत्तरोत्तर बढता रहा है। साधारणतया नाट्यभाषा के प्रमुख दो रूप माने जाते हैं। ये दो रूप हैं- हमारे जीवन-व्यवहार की ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा और अंगाश्रित शरीर भाषा। इनके अलावा रंग-प्रकाश, ध्वनि, चित्र, रंगमंचीय वस्तुयें आदि नाट्यभाषा रूपी विशिष्ट भाषा की इकाइयाँ हैं। इन इकाइयों को मंचीय भाषा कह सकते हैं। ये तीनों- ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा, अंगाश्रित शरीर भाषा तथा उपकरणाश्रित मंचीय भाषा-मिलकर नाट्यभाषा बनती है।

ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा

नाटक की भाषा का सहज, संप्रेषणीय होना अनिवार्य है। यह संवाद के रूप में अभिनेताओं के लिए लिखी जाती है। यह एकाधिक अभिनेताओं के बीच बातचीत या एक ही अभिनेता के आत्मालाप के रूप में हो सकती है। कभी-कभी अनेक अभिनेताओं के द्वारा ‘कोरस‘ के रूप में प्रस्तुत होती है। इसके द्वारा अभिनेता दर्शकों के सामने जीवन की भिन्न-भिन्न झाँकियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुति निश्चित समय के अंदर दर्शकों के सामने मंच पर होती है। यद्यपि रंगालय में उपस्थित लोगों की भूमिका‘दर्शक‘ के रूप में एक है, फिर भी भावों की अभिव्यक्ति के लिए स्वीकृत ध्वन्याश्रित भाषा को आत्मसात करने की क्षमता में अंतर है। दर्शकों को शैक्षणिक स्तर, भाषा ग्रहण की शक्ति, स्वीकृत बिम्बों और प्रतीकों को समझने की क्षमता समान नहीं रहती। अतः रचनाकार को अपने नाटक में ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो सरलता,सहजता तथा स्वाभाविकता के कारण सभी स्तर के लोगों के लिए स्वीकार्य हो। नाटक की ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा के लिए यह भी अभीष्ट और अनिवार्य है कि नाटक में और जीवन में प्रयुक्त होने वाली भाषा में अधिक अंतर न हो। गोविंद चातक जी ने बताया कि ”नाटक की भाषा यथार्थ के आग्रह के कारण एक ओर वह सामान्य बोलचाल के निकट होती है, दूसरी ओर संरचित, संस्कारित होने के कारण अपने सर्जनात्मक प्रयोग में सामान्य से विशिष्ट हो जाती है।” उसमें रोचकता एवं प्रसंगानुकूलता की आवश्यकता भी है। साथ-ही-साथ भाषा को प्रवाहमयी भी होनी चाहिए। इसमें व्यंग्य, विनोदात्मकता, चुस्ती, चुटीलापन, कहावतों और मुहावरों आदि का प्रयोग अति आवश्यक एवं अनिवार्य हैं। नाटक की भावस्थिति की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के संबंध में नेमीचंद जैन जी ने कहा है कि ”ऐसे प्रभावपूर्ण संप्रेषण के लिए यह भी जरूरी है कि नाटक की भाषा यथासंभव पात्रानुकूल होने के साथ-साथ सुबोध और एकाग्र तो हो ही, सूक्ष्म और व्यंजनापूर्ण भी हो, जो बोली जाने पर लयों और स्वरों का अपना विशिष्ट, आकर्षक संगीत रच सके। ऐसी भाषा के बिना कोई श्रेष्ठ तथा महत्त्वपूर्ण नाटक लिखा जाना संभव नहीं और संसार की सभी भाषाओं के श्रेष्ठ और उल्लेखनीय नाटककार अपने-अपने ढंग से अपने लिए अपनी भाषा का ऐसा विशेष आविष्कार करते आये हैं।” यह विशेष आविष्कार संवादों की संरचना में दर्शनीय है जो नाट्यभाषा के स्वरूप को व्यक्त करता है।

संवाद योजना

संवाद योजना को कथोपकथन या बातचीत भी कहते हैं। संवादों की सहायता से नाटक का कलेवर निर्मित होता है। इसके माध्यम से ही नाटक की कथा का विकास होता है। एक दृष्टि से कथा का कथन ही संवाद के द्वारा संपन्न है। यह नाटक के आधारभूत प्राण तत्त्व हैं और नाटक की नाटकीयता उसके संवादों से ही विकसित होती है।
संवाद, नाटककार द्वारा निर्मित काल्पनिक संसार के पात्रों की बातचीत है और कम-से-कम दो पात्रों की आवश्यकता है। पात्रों के आत्मकथन भी इसके अंतर्गत आता है। नाटक के संवादों की भाषिक इकाइयों पर विचार करें तो उसमें तीनों पुरुषों की प्रधानता रहती है। इनमें से उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष बातचीत के सिलसिले में अपनी भूमिका बदलते रहते हैं। अन्य साहित्यिक विधाओं की तुलना में, जिनमें अन्य पुरुष की प्रधानता रहती है, नाटक की भाषिक इकाइयाँ भिन्न हैं। यह नाट्यभाषा की संरचनात्मक विशेषता को प्रकट करती है। नाट्य संवाद नाटक में अनेक संदर्भ पैदा करता है। यह पात्रों का बोलना मात्र नहीं है लेकिन वह कुछ ऐसे विचारणीय भाषिक तथा नाटकीय तत्त्वों की संरचना है जो नाटक की अभिव्यक्तिपरक प्रकार्य और शब्दों के व्याकरणिक संबंधों से उत्पन्न नाट्यार्थ सूचक तत्त्व है। नाटक की प्रत्येक स्थिति कार्य को उत्पन्न करती है। कार्य संवाद निर्माण के लिए उचित भूमिका तैयार करता है। इस प्रकार निर्मित संवाद पुनः नई स्थिति विशेष को जन्म देता है। अतः ये तीनों अन्योन्याश्रित एवं एक-दूसरे को उत्पन्न करने वाले भी हैं। यह निम्न आरेख से व्यक्त हो जायेगा। 
इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति और कार्य के आधार पर नाट्यभाषा की संरचना की जाती है। उसका ध्वनि संयोजन, शब्दनिर्माण, रूपगठन तथा वाक्य संरचना,नाट्यस्थिति एवं कार्य पर निर्भर है। ये दोनों नाट्य कथा पर आधारित एवं विकसित हैं। संवाद की भाषा प्रत्येक पात्र की आत्मा की भाषा भी है। इसलिए पात्र का आत्मतत्त्व उसमें आना स्वाभाविक है। यह आत्मप्रकाशन का सशक्त माध्यम होने के कारण पात्रों के चरित्र को भी द्योतित करता है।
इस प्रकार निर्मित लिखित-भाषा के रूप गठन का अध्ययन-विश्लेषण तथा सोच-विचार करने के लिए पाठकों के पास अवसर है। सामान्यतः लिखित भाषा संरचना संबंधी व्याकरणिक इकाइयों से तथा वाक्य संबंधी परिकल्पनाओं से युक्त रहती है, रंगमंच पर खेले जाने के कारण, पात्रों के द्वारा उच्चरित संवाद दर्शक सुना करते हैं। लिखित संवाद के उच्चरित रूप को ‘वाक‘ कहना समीचीन है। ‘वाक‘ को भाषण भी कह सकते हैं। द्विवेदी जी ने ठीक कहा है- ”वागिन्दि्रय द्वारा उच्चरित और श्रवणेन्दि्रय द्वारा गृहीत भाषा का रूप वाक की कोटि में आता है।” वाक या भाषण-नाटक में संवाद, मात्रा,बलाघात्, सुर, संगम आदि ध्वनि गुणों से युक्त रहता है। यह केवल सुनने से ही अनुभूत होता है न कि पढने से। अतः ध्वन्यात्मक शब्दिक भाषा में मौखिक एवं लिखित भाषा रूपों की सभी विशेषतायें निहित हैं।

अंगाश्रित शरीर भाषा

इस संदर्भ में यह स्मरणीय है कि नाटक सबसे पहले नाटककार की काल्पनिक दुनिया में काल्पनिक रंगमंच पर, काल्पनिक पात्रों द्वारा असंख्य बार खेला जा चुका है। इसी कल्पना को वह ध्वन्यात्मक भाषा एवं भाषेतर माध्यमों से अभिव्यक्ति करता है। नाटक की पांडुलिपि की हर एक इकाई नाटक के क्रियांश से जुडी रहती है। एक सूक्ष्मदर्शी अपने दीक्षण से इन भाषिक इकाइयों में छिपे क्रियांशों को कुशल अभिनेताओं के इंगितों की सहायता से, जो नाट्यभाषा रूपांश शरीरभाषा है, दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है।
नाट्याभिनय के संबंध में कहते वक्त नाट्याचार्य ने वाचिक, आंगिक और सात्विक आदि अभिनय को सामान्याभिनय कहा है। यदि किसी नाट्य में सात्विकाभिनय की प्रधानता होती है तो वह उत्कृष्ट नाट्य बताया गया। ये सात्विक एवं आंगिक अभिनय मनोभावों पर आश्रित हैं और अध्वन्यात्मक भाषा से संबंधित हैं। ये अध्वन्यात्मक भावव्यंजित अभिनय, अभिनेताओं के नयनों, कपोलों, दाँतों, ओष्ठों से तथा अन्य अवयवों के संचालन से प्रकट किया जाता है। इस अध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति में भी, भाषिक संरचना के समान एक प्रकार की स्थिरता अथवा व्यवस्था है। यह व्यवस्थित अंगसंचालन ही आंगिक भाषा यानी शरीरभाषा है। पात्रों के अंग-संचालन (आंगिक-अभिनय) व्यवस्थित एवं पूर्व निर्धारित होने से ही दूसरे अभिनेताओं के इंगितों को तथा तद्जनित भावों को समझ लेते हैं। आहार्याभिनय से भी यही कार्य संपन्न होता है। एक अभिनेता जब फटी-पुरानी धोती पहनकर रंगमंच पर प्रवेश करता है तब उसका आहार्य ‘निशब्द भाषा‘ की सहायता से यह स्पष्ट बताता है कि प्रस्तुत पात्र की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति क्या होती है। यह अर्थबोध ध्वन्यात्मकभाषा (वाचिकाभिनय) के जैसे-सभी दर्शकों को समान रूप से होता है। इसका कारण यह है कि आहार्य के माध्यम से भी ‘निशब्द-भाषा‘ की सहायता से भावाभिव्यक्ति की जाती है। इस प्रकार की अभिव्यक्ति शरीरभाषा से संपन्न होने से यह भी नाट्यभाषा का अंग है।
इसके साथ-साथ नाट्यार्थ की अभिव्यक्ति करने के लिए अभिनेताओं का ‘मौन‘, जो शरीरभाषा से जुडा हुआ है, बडी सहायता करता है। इसका भी, भावाभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता है। जिस प्रकार नाटककार ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचाराभिव्यक्ति करता है उसी प्रकार वह मौन संकेत से पात्रों के विचारों और भावों को प्रस्तुत करता है। पात्रों की बातचीत के सिलसिले में किसी एक पात्र का अचानक मौन, संवाद के बीच सोच-समझकर आयोजित खामोशी, दर्शकों के मन को आकर्षित करने वाली नाटकीयता मात्र नहीं, उसकी खामोशी में अन्तर्निहित कारणों को ढूँढने की जिज्ञासा भी दर्शकों के मन में उत्पन्न करती है। दर्शक पात्र की खामोशी में निहित, गुंफित अर्थ को समझ भी लेता है जिसको नाटककार अभिव्यक्त करना चाहता है। नाटक में आयोजित आर्थगर्भित मौन के बारे में डॉ. शमीम अलियार जी ने यों कहा है कि- ”नाट्य भाषा की खामोशी में एक खास तरह की खूबसूरती है, मौन में एक मनोहारिता है। और एक नकारात्मक स्थिति नहीं। उससे पहले और बाद में प्रयुक्त शब्दों के बीच वह एक सेतु का काम ही नहीं करता वरन् उनके आधार पर एक अर्थ की सृष्टि भी करता है। शब्दों के बीच की निस्तब्धता अपने में नाटकीय तनाव को वहन करने के कारण बहुत सार्थक हो सकती है। यों नाट्यभाषा मौन, हरकत, संवाद,गतिशीलता एवं स्थिरता का समन्वय करके अपना एक स्वतंत्र ढाँचा रचती है।” इस प्रकार देखें तो आहार्य और मौन आदि अंगाश्रित शरीरभाषा से जुडे रहते हैं और नाट्यभाषा के अंश हैं।

उपकरणाश्रित मंचीय भाषा

वर्तमान युग की नाट्यभाषा का प्रमुख अंग है, उपकरणाश्रित मंचीय भाषा। नाटककार अपने मन में उद्बुद्ध विचारों और भावों की अभिव्यक्ति देने में ध्वन्यात्मक एवं अंगाश्रित भाषा के साथ-साथ इस विधा का भी इस्तेमाल करता है। यद्यपि यह नाटक के मंचन से संबंधित कार्य होने से निर्देशक पर निर्भर है, फिर भी वर्तमान नाटककार नाट्यभाषा के इस अंग पर ध्यान दे रहा है। क्योंकि नाटककार को कभी-कभी अपनी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अनुभूति की अभिव्यक्ति करने में ध्वन्यात्मक भाषा असफल प्रतीत होती है तब वह रंगमंचीय भाषा तत्त्वों की सहायता लेने में विवश हो जाता है। दृष्टा की अनुभूतियाँ तथा उनको प्रस्तुत करने वाले निर्देशकों के दृष्टिकोण अलग-अलग हो तो दृष्टा की अनुभूतियों का साक्षात्कार पूर्ण नहीं होगा। नाटककार, निर्देशक की अपेक्षा दृश्यकाव्य नाटक के दृश्यतत्त्वों की संप्रेषणीयता, भावव्यंजना और आकर्षणीयता से भलीभाँति परिचित एवं अनुभूत है और इसलिए ही इन तत्त्वों का प्रयोग करता है। अतः इस अध्वन्यात्मक भाषिक रूप के बिना नाटक और नाट्यार्थ अधूरा रहेंगे।
वर्तमान नाटक में रंगसज्जा का महत्त्व है। यह रंगसज्जा नाटक में चित्रित दृश्य एवं वातावरण के अनुसार होती है। नाटक के प्रस्तुतीकरण के समय निर्देशक अपनी ओर से या नाटककार के निर्देशानुसार कई वस्तुओं का मंच पर उपयोग करता है। इन वस्तुओं का उपयोग दो कार्यों के लिए होता है। कई वस्तुएँ नाटक के वातावरण की सृष्टि के निमित्त इस्तेमाल की जाती हैं तो अन्य ऐसी होती हैं जिनका उपयोग नट या नटी अभिनय के बीच करते हैं। इन वस्तुओं का उपयोग करने के पहले नाटक के‘संकलनत्रय‘ संबंधी तत्त्वों को मन में रखना चाहिए। रंगमंचीय वस्तुओं से तैयार किये गये वातावरण के साथ कथावस्तु को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है। रंगसज्जा,नाटकों में यथार्थ का भ्रम उत्पन्न करती है और साथ-ही-साथ पात्रों के स्तर, जीवनादर्श आदि को व्यक्त करती है। मंच पर उपयुक्त एक-एक चीज अपनी ‘मौन भाषा‘ से दर्शकों से संवदन करती है।
रंगसज्जा के समान रंगदीपन दर्शकों से ‘संवदन‘ करता है। यह केवल एक यांत्रिक वृत्ति नहीं कह सकते। यह विशिष्ट प्रकार की भावाभिव्यक्ति है क्योंकि इसके माध्यम से नाटककार एवं नाटक-व्याख्याता निर्देशक बहुत कुछ बातें दर्शकों को बताते हैं। रंगमंच पर तथा अभिनेताओं पर, नाट्यार्थानुसार भिन्न-भिन्न रंग के प्रकाश पडते समय अभिनेताओं, मंचीय-वस्तुओं से युक्त रंगमंच एक सुंदर चित्र जैसा बन जाता है। इसके साथ अभिनेताओं के आंतरिक द्वंद्व के अनुसार उत्पन्न हाव, भावादि प्रत्येक-प्रत्येक रंगीले-प्रकाशों के माध्यम से प्रदीप्त किये जाते हैं। अतः ”रंगदीपन कला ऐसी माँग थी जो कलाकार के अंतर्भावों को उभारने में सहायक सिद्ध हो और कुछ नवीन रूप प्रस्तुत कर सके।”
उनके अलावा नाटक में ‘ध्वनि‘ का प्रयोग दर्शकों के मन में विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से किया जाता है। यह भी एक विशिष्ट मंचीय साधन है। नाटक के प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में उत्पादित ‘ध्वनि‘ घटना के वातावरण की सृष्टि करती है। इसके साथ प्रत्येक घटना या नाट्यगति की ओर दर्शकों का ध्यान सामूहिक रूप से आकर्षित करके उनके मन में रसोद्रेक की सहायता भी करती है। अतः नाट्य प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में उत्पादित ध्वनि दर्शकों से कुछ-न-कुछ अवश्य बताती है जिसको समझकर उनके मन में उसके प्रति प्रतिक्रिया होती है, उनके संवेग जागृत होते हैं तथा वे तीव्र नाटकीय अनुभूति को प्राप्त करते हैं। नाटक में भावाभिव्यक्ति एवं विचार संप्रेषण के लिए उपयुक्त साधनों को रेखाचित्र के द्वारा यों व्यक्त कर सकते हैं। उपर्युक्त रेखाचित्र से नाट्यभाषा का स्वरूप अधिक-स्पष्ट होगा कि नाटककार के द्वारा नाट्यार्थ की प्रस्तुति करने के लिए प्रयुक्त एक विशिष्ट अभिव्यक्ति के माध्यम को ‘नाट्यभाषा‘ की संज्ञा से अभिषित है।

समीक्षा की उत्पत्ति के लिए मानुषी वृत्ति (अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहना) इसकी धरातल कही जा सकती है। यह वृत्ति समाज, राजनीति, व्यवहार, आपसी सम्बन्ध, खेलकूद और प्रदर्शन आदि सब जगह प्रदर्शित होती है। वस्तुतः इसे बुराई,भर्त्सना, आलोचना, समालोचना, कटु आलोचना समीक्षा जैसे सम्बोधन भी दिए गए। इसे आदिकाल से किसी न किसी रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। फलतः मानव विकास के साथ इसका क्षेत्र भी बढता गया और नाट्याचार्य भरत काल में इसके क्षेत्र विशेष में एक अलग ही पहचान सामने आई जो ‘नाट्य समीक्षा‘ कहलायी। धीरे- धीरे तब से लेकर आज तक इसके कई रूप बनते गए अर्थात् रंग समीक्षा, व्यक्ति समीक्षा, पुस्तक समीक्षा, फिल्म समीक्षा, पत्र समीक्षा और सम्पादकीय समीक्षा आदि। इन समीक्षाओं ने जन्म दिया
समीक्षा का स्वरूप निरूपण ही हमारा विवेच्य है विशेषतः नाट्य क्षेत्र में नाट्य प्रस्तुतियों का, कृतियों का और लेखों का। समीक्षा की टिप्पणियों से सुधार सम्भव है वह भी उसकी पुनः प्रस्तुति के समय परन्तु पुस्तक और फिल्म समीक्षा में इसका कोई विकल्प नहीं है। इसलिए नाट्य समीक्षा उपयोगी भी है और आवश्यक भी। दरअसल सत्य का बोध कराना ही समीक्षा का धर्म होना चाहिए। वही समीक्षा सही होती है जो पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो। विद्वानों ने भी आलोचना का प्रमुखतम गुण उसका निष्पक्ष होना ही बताया है अन्यथा समीक्ष्य के गौरव की हानि का संशय सदैव बना रहता है।

समीक्षा के स्वरूप का निरूपण

वैदिक और पूर्व वैदिक काल की नाट्य झाँकियों का अथवा प्रहसन प्रयोगों का अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि यज्ञों के मध्य प्रहसनों की प्रस्तुति अथवा प्रयोजन मात्र मनोरंजन हेतु किया जाता था। प्रबुद्ध दर्शक समूह को याज्ञिक कर्मकाण्ड के बीच लघु नाटकीय दृश्य बतला कर बिठाए रखना संयोजक की कार्यकुशलता का प्रतीक था। वैदिक संवाद सूक्तों में यम-यमी, पुरूर्वा-उर्वशी, इन्द्र-वामदेव सोम-विक्रय प्रसंग आदि ऐसी ही प्रस्तुतियों के उदाहरण हैं। यज्ञ में सम्मिलित अतिथिगण यजमान आदि उसके दर्शक होते थे। इसलिए यह भी सम्भव है कि वे सभी प्रस्तुत किए जाने वाले रूपों की आपस में चर्चा अवश्य करते होंगे – किसी कार्यक्रम को सुन्दर, मनोरंजक तो किसी को हल्का, घटिया अथवा निम्न-स्तरीय भी कहा जाता होगा, यह अवश्यंभावी है। रंगशाला में अभिनय की सफलता और असफलता पर हर्ष और विषाद् सूचक ध्वनियों को मौखिक समीक्षा ही माना है। व्यावहारिक समीक्षा का मार्ग प्रशस्त नहीं था। गुण-दोष विवेचन के ही रूप में व्यावहारिक आलोचना दिखाई पडी थी। प्रमाणों के अभाव में यह सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है कि उस समय नाट्य समीक्षा होती थी अथवा नहीं परन्तु यह कहना असत्य नहीं होगा कि उस समय मौखिक नाट्य समीक्षा का प्रादुर्भाव अवश्य हो चुका था परन्तु उसका रूप निश्चित नहीं हुआ था।

भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र काल

यदि नाट्य समीक्षा के लिखित आदि रूप को आधार बनाया जाय तो भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र से बढकर अन्य कोई ग्रन्थ प्रतीत नहीं होता। भारतीय रंग परम्परा भरतमुनि से भी बहुत पहले की है जिसका समृद्ध रूप हमें भरत काल में दिखाई देता है। भरत मुनि ने जैसा देखा वैसा चित्रित किया अतः वे ही नाट्य समीक्षा क्षेत्र में प्रथम नाट्य समीक्षक कहें जाएँ तो मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भरत मुनि को रंगमंच की सम्पूर्ण विधाओं का ज्ञान था। उन्होंने तात्कालिक सम्पूर्ण नाट्य रूपों का विस्तार से विवेचन किया है – विशेषतः मंचों के आकार-प्रकार, मंच सम्बन्धी शब्दों जैसे रंगशीर्ष, रंगपीठ, दर्शकों हेतु वर्णानुकूल स्थान, वाद्ययंत्र, सूत्रधार (तौरिय), अधिपति,वेषकर, मांल्यकृत, चित्रज्ञ, रजक, प्रकाशदीप दर्शक (प्रार्थिक एवं प्रार्थक) अर्थात् आमंत्रित किए जाने वाले प्रार्थित और स्वयं आने वाले प्रार्थक दर्शक कहलाते थे। भरत के अनुसार स्वाभाविकता का अधिकाधिक ध्यान केवल उपकरणों में ही नहीं, अपितु आंगिक अभिनय में भी अभीष्ट था। उसमें बहु अंग-लीला (ओवर एक्टिंग) वर्जित थी।
भरत ने ना.शा. में रंगसज्जा का विस्तार से वर्णन किया है। रंगलेपन पात्रानुकूल बतलाया है। नाट्य समीक्षक को नाटक सम्बन्धी अथाह ज्ञान होना भी आवश्यक माना जाता होगा और भरत मुनि इसमें सिद्धहस्त प्रतीत होते हैं इसलिए रंगचर्चाओं के साथ-साथ नाट्याचार्यों को भी उनके कर्त्तव्य के प्रति सजग करते हुए दिखाई देते हैं। इन सभी तथ्यों के बावजूद पूर्व भरत और भरतकाल में न तो उन नाटकों का नामांकन हुआ है और न कहीं किसी नाट्यशाला का चित्रण अथवा चर्चा मिलती है जहाँ नाटक खेले जाते थे परन्तु इस अभाव की पूर्ति हमें संस्कृतकाल में अवश्य होती दिखाई देती है।

संस्कृत–काल

ईसा से पूर्व द्वितीय शताब्दी के मध्य से संस्कृत काल में भी नाट्य प्रदर्शन मात्र मनोरंजनार्थ बतलाया गया है। संस्कृतकाल के नाट्य समीक्षकों में पतंजलि का नाम प्रमुख है जिन्होंने अपने महाकाव्य में दो प्रकार के अभिनयों का उल्लेख किया है। काले और लाल रंगों से कंस और कृष्ण के पक्ष के अभिनेताओं को मंच पर बतलाया जाता था। भाष्य के अनुसार स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही करते थे जिन्हें भूकंस कहते थे। भूकंस अर्थात् स्त्री की भूमिका में आया हुआ पुरुष। पतंजलि ने लिखा है कि समाज में अभिनेताओं को विशेष सम्मान नहीं था क्योंकि उन्हें नैतिक दृष्टि से भ्रष्ट बतलाया गया है। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि अश्वर्जित और पुनर्वसु नामक दो भिक्षुओं को कीटगिरी की रंगशाला में अभिनय देखने, नर्तकी से बात करने के दोष में विहार से बाहर निकाल दिया गया था।
उस समय प्रस्तुतियों पर राजकर लगता था। सभी ललित कलाओं को राज्य की ओर से प्रोत्साहन भी मिलता था। नाट्य प्रदर्शन और दर्शकवृंद को उस समय समाज कहा जाता था। यहाँ समीक्षात्मक विवेचन का अभाव प्रतीत होता है। कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीय, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, महाराज विक्रमादित्य की सभा में अभिनीत हुए बतलाए गए हैं। श्ूाद्रक का मृच्छकटिक नाटक उज्जयिनी में अभिनीत हुआ था। इस काल में भी वेदकालीन प्रस्तुति शैली का रूप कहीं-कहीं दिखाई देता है। भवभूति का उत्तररामचरित नाटक भगवान कालप्रिय महादेव की यात्रा के भाव पर श्रेष्ठ सामाजिकों के समक्ष अभिनीत हुआ था और मुद्राराक्षस तथा सम्राट हर्ष के प्रियदर्शिका, रत्नावली तथा नागानन्द नाटकों का प्रदर्शन विश्व के प्रतिष्ठित व्यक्तियों का परिषद् के समक्ष हुआ था। इस काल में रंगमंचीय कृतियों का अभाव प्रतीत नहीं होता। विद्वानों की मान्यता है कि संस्कृत नाटकों में दृश्यात्मक विधान उतना नहीं हुआ करता था,रंगमंचीय योग कम से कम था। संभवतः इसीलिए संस्कृत नाट्य समीक्षा के सूत्र कहीं दृष्टिगत नहीं होते।
हाँ, आज के युग में ऐसे समीक्षक हैं जिन्होंने संस्कृत नाटकों का रंगमंचीय दृष्टि से मूल्यांकन किया है जैसे डॉ. वी. राघवन, डॉ. सूर्यकान्त, श्री रमाशंकर तिवाडी, डॉ. कुंवरचन्द्र प्रकाशसिंह, डॉ. रघुवंश, श्री कृष्णदास, कान्तिकिशोर भरतिया, डॉ. रामविलास शर्मा, बलवन्त गार्गी आदि। इनमें से किसी ने कथ्य की उपादेयता पर टीका-टिप्पणी की तो किसी ने प्रयोगात्मक स्वरूप का विवेचन किया जैसे संस्कृत नाटकों का प्रदर्शन सोद्देश्य होता था, उनमें जनहित समाहित था, इसी दृष्टिकोण को लेकर वे जनता के समक्ष अभिनीत किए जाते थे।
कहीं-कहीं समीक्षक अपना स्पष्ट मत भी पाठक के सामने रख देता है यथा – मंच पर दुर्योधन की मृत्यु दिखाकर भास ने परिपाटी का उल्लंघन किया है लेकिन इन्होंने नाट्य प्रस्तुतियों को देखा नहीं और केवल नाटक पढकर अपनी विचारधारा (समीक्षा) प्रस्तुत की है जो पुस्तकीय समीक्षा के सदृश्य है परन्तु यह सब उस युग से चली आ रही नाट्य समीक्षा की कडी में जोड देना एक अनायास प्रयास होगा क्योंकि संस्कृत काल में नाट्य समीक्षा नाम से जानकारी अप्राप्य है। यत्र-तत्र कुछ ऐसे संकेत भी प्राप्त नहीं होते हैं जहाँ पर तत्कालीन लेखकों ने नाट्य प्रस्तुतियों पर अथवा उनके किसी पक्ष विशेष पर कुछ कहा हो जैसा पतंजलि ने रंगमंच के कई पक्षों पर कुछ न कुछ टिप्पणी अवश्य की है परन्तु कालिदास के काल में समीक्षा का कुछ भी अंकुर दिखाई नहीं देता।

लोकनाटक और समीक्षा

लोकमंच आदि और अनंत है, सर्वव्याप्त रहता आया है। नश्वर नहीं है। समय-समय पर बदलती संस्कृति का उस पर भी प्रभाव पडता है परन्तु फिर भी उसका अपना मूल रूप होता है जिसे समय-समय पर भाषायी नाट्य समारोह अपनाते रहते हैं इसलिए लोकमंच का गहरा प्रभाव हिन्दी नाट्य प्रस्तुतियों पर देखा जाने लगा है।
हिन्दी रंगमंच ने तो लोक शैली (विशेषतः सूत्रधार) पर आधारित नाट्य-प्रस्तुतियाँ देना आरम्भ कर दिया है। इसका रूप हमें कई नाटकों में साफ दिखाई देता है। १९७० के बाद ही ऐसे एक लहर-सी चल पडी है। लोक नाटक तो मूलतः मनोरंजनार्थ प्रस्तुत होते आए हैं और उनकी निजी शैली और विशेषता होती है। अतः समीक्षा के लिए आवश्यकता नहीं होती परन्तु यदि इस युग में लोकनाट्य समारोह हो तो अवश्य उनके स्तर और प्रभाव को दर्शाने के लिए कोई समीक्षक अपनी लेखनी उठा सकता है। हाँ,आज का लेखक यदि लोकनाट्यों का ज्ञाता है तो उन प्रस्तुतियों की सही एवं तुलनात्मक समीक्षा दृष्टि रख सकता है परन्तु ऐसा बहुत कम होता है।

ऐसा समीक्षक तो हिन्दी, मराठी, बंगला प्रस्तुतियों में प्रयुक्त लोक शैली के प्रयोग का सही मूल्यांकन करने में भी समर्थ हो सकता है इसलिए यहाँ से सीधा भारतेन्दु काल पर दृष्टिपात करना श्रेयस्कर हो गया है जहाँ से हिन्दी रंग- आन्दोलन का बीजारोपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया जिसे हिन्दी का पारसी रंगमंच कहा गया है।

भारतेन्दुकाल और नाट्य समीक्षा

हिन्दी समीक्षा के आरम्भ की चर्चा करते हुए डॉ. रामदरश मिश्र ने भारतेन्दुकाल से आलोचना का आरंभ स्वीकार किया है और लिखा है कि अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव से गद्य में निबन्धों तथा सम्पादकीय टिप्पणियों के रूप में आलोचना होने लगी थी। उन्होंने माना है कि इस काल की व्याख्या परक आलोचनाओं में गुण और दोष दर्शन प्रवृत्ति का प्राधान्य रहा। यहाँ तक कि स्वयं भारतेन्दु ने ‘नाटक‘ नामक लेख में यह दर्शाया है कि हमारे पुराने सिद्धान्त आज कितने उपयोगी हैं और कितने अनुपयोगी तथा पाश्चात्य सिद्धान्तों में किन-किन का ग्रहण श्रेयस्कर होगा। इस प्रकार ‘नाटक‘लेख को प्रथम सैद्धान्तिक समीक्षात्मक कृति तथा भारतेन्दु को प्रथम समीक्षक माना गया है परन्तु यह युग नाट्य प्रस्तुतियों की दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण है। पारसी रंगकर्मियों ने सभी भाषाओं के रूपान्तरित नाटक प्रस्तुत कर अर्थप्राप्ति को अपना ध्येय बनाया था और उनमें चमत्कार के साथ कुछ निम्न स्तर (पभद्देपन) को भी महत्त्व दिया जाने लगा था। इस प्रकार दर्शकवृंद को शिक्षित करने के बजाय भारतीय संस्कृति के आदर्श रूपों को खेमटिये वालों की तरह मंच पर प्रस्तुत किया जाने लगा। पारसियों को आदर्श से कोई मतलब नहीं था। वे तो व्यापारी थे नाटक के व्यापारी। बस इसी विरोधाभास ने भारतेन्दु के हृदय में भारतीय आदर्श को ललकारा और जागृत किया तत्पश्चात् पारसी प्रस्तुतियों का घोर विरोध किया जाने लगा। बस यहीं (१९वीं शताब्दी) से सही समीक्षा का उदय हुआ।
नारायण प्रसाद ‘बेताब‘ ने पारसियों की भाषा शैली के लिए अपनी समीक्षात्मक दृष्टि”न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी” बतलाकर रखी है। हाँ, गिरीश रस्तोगी ने ”चुटीले संवाद बोलते-बोलते पद्य में बोल जाना, हल्की किस्म के शेर अपनाए जाना” कहकर साहित्य और शैलीगत अपने विचार रखे हैं। १९०३ में भट्ट जी ने एक लेख में लिखा था –”हिन्दू जाति तथा हिन्दुस्तान को जल्द गिरा देने का सुगम से सुगम लटका यह पारसी थियेटर हैं जो दर्शकों को आशिकी, माशूकी का लुत्फ हासिल करने का बडा उम्दा जरिया है, क्या मजाल जो तमाशबीनों को कहीं से किसी बात में पुरानी हिन्दुस्तानी की झलक मन में आने पाये।” श्री जयशंकर प्रसाद ने भी इनकी प्रस्तुतियों को ‘एक असम्बन्ध फूहड भडैती‘ लिखकर कटु भर्त्सना की है। इस प्रकार इन समीक्षाओं से कुछ पारिसयों की बाह्य प्रस्तुतियों में सुधार भी हुआ जिनमें श्री सूर विजय, व्याकुल भारत,रासमहल नाटक मंडली आदि के नाम गणनीय हैं। सुधार का दूसरा कारण यह भी था कि भारतेन्दु नाटक मंडली के प्रसिद्ध अभिनेता डॉ. वीरेन्द्रनाथ दास, कृष्ण कौल,केशवदास टंडन आदि भी इसमें सक्रिय भाग लेने लगे थे। माधव शुक्ल ने भी पारसी रंगमंच के फूहडपन को समाप्त करने में अपना पूर्ण सहयोग दिया था। फलस्वरूप पारसी फूहडपन के साथ-साथ पारसी कम्पनियों का भी पतन हो गया और १८५७ से हिन्दी रंगमंच ने अपनी जडें जमाना आरम्भ कर दिया।
इस प्रकार इस काल में समीक्षा के नाम पर केवल एक ही तत्त्व हमारे सामने उभर कर आता है वह है ”हीन प्रदर्शनों का घोर विरोध।” इन सुधारवादी समीक्षकों में श्री विश्वम्भर सहाय व्याकुल और जनेश्वर प्रसाद भायल का इसमें विशेष योगदान रहा। पं. बालकृष्ण भट्ट की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी प्रेरणा से पं. माधव शुक्ल, प्रताप नारायण मिश्र, महादेव भट्ट, पं. गोपालदत्त, रास बिहारी शुक्ल, देवेन्द्रनाथ बेनर्जी, मुद्रिका प्रसाद आदि के नाम गणनीय हैं। इन्होंने हिन्दी रंग आन्दोलन से हिन्दी रंगमंच को विकसित करने में अत्यधिक सहयोग दिया। इस काल में नाट्य प्रतिस्पर्द्धा के तो अनेक उद्धरण मिलते हैं परन्तु किसी भी प्रकार की सीधी समीक्षात्मक अभिव्यक्ति अप्राप्य है। इस युग की सबसे बडी विशेषता यही है कि हिन्दी रंगकर्मियों ने दर्शक रुचि को बदल दिया। चमत्कार प्रयोग और शेर ओ शायरी से प्रभावित दर्शक रुचि को परिष्कृत कर शुद्ध साहित्यिक एवं राष्ट्रीय प्रेरणायुक्त परिस्थितियों की ओर खींच लाना कोई सहज कार्य नहीं कहा जा सकता।
केवल ‘ब्राह्मण‘ नामक पत्र में श्री रामनारायण त्रिपाठी और प्रताप नारायण मिश्र द्वारा लिखित कुछ नाट्यालोचनाएंँ प्राप्त होती हैं तथा मौखिक समीक्षा का एक उदाहरण भी मिलता है कि एक मजिस्टट ने भारतेन्दु के नाटकों को देखकर उन्हें कवि शिरोमणि शेक्सपियर से भी उत्तम बताया और भट्ट जी ने १९०३ में अपने लेख में पारसियों की प्रस्तुतियों को हीन बतलाया और भारतेन्दु ने नाटक नामक लेख में पारसियों के कुछ कुरुचिपूर्ण प्रदर्शन का चित्रण भी किया। समाज सुधार और जनजागृति की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के उद्देश्य से भारतेन्दु ने व्यावसायिक नाटक मण्डलियों की पद्धति का भी खण्डन किया। भारतेन्दु स्वयं एक अच्छे नाटककार, अभिनेता, निदेशक और व्यवस्थापक भी थे इसलिए रंगमंच के हर अच्छे – बुरे पहलू को अच्छी तरह पहचानते थे। उनकी कलम में जो समीक्षा रूप हमें दिखाई देता है, उसी आधार पर उन्हें ही हिन्दी रंग आन्दोलन का सर्वप्रथम नाट्य-समीक्षक मानना समीचीन प्रतीत होता है।
भारतेन्दुकाल की नाट्यकृतियों से समीक्षात्मक दृष्टि का पता चलता है कि अभिनय में अतिनाटकीयता थी, उच्च स्वर, संगीतपूर्ण वाणी, सुन्दर आकर-प्रकार, अनूदित नाटकों का प्रचलन, मंगलाचरण, सूत्रधार, नेपथ्य और आकाशभाषित आदि का प्रयोग संस्कृत के अनुरूप, गीत मौन झाँकी, रामलीला-सी चित्र सज्जा, पद्यात्मक संवाद, नाट्यधर्मी मंच सज्जा, प्रत्येक नाटक का मौन झाँकियों पर समाप्त होना, लम्बे संवाद, जनोपयोगी कथोपकथन, लोकप्रिय गीत ध्वनियाँ, पात्रानुकूल भाषा, देशभक्ति और देशोद्धार पूर्ण कथानक ब्रज और खडी बोली मिश्रित संवाद मेलों, बाजारों आदि में नाटक प्रस्तुत करना आदि-आदि।
स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष ही करते थे परन्तु उनमें इतनी स्वाभाविकता थी कि दर्शक रो पडते थे, भारतेन्दु के द्वारा ‘हरिश्चन्द्र‘ और माणक जी के द्वारा शैव्या की भूमिकाएँ ऐसे ही उदाहरण हैं।
उस समय के दर्शकों को गुणग्य एवं रसिक भी बतलाया गया है। डॉ. गोविन्द चातक ने भारतेन्दुकालीन नाट्य रचना की समीक्षा की है। इन समीक्षकों के द्वारा तत्कालीन वेशभूषा, प्रकाश योजना तथा नेपथ्य संगीत की ओर ध्यान दिया गया है। डॉ. गिरीश रस्तोगी आदि ने भी भारतेन्दुकाल के रंगबोध को अपनी समीक्षात्मक दृष्टि से उभारा है।
श्रीकृष्णदास ने भारतेन्दु की नाटक रचना और गठन में कुछ ढीलापन बतलाया है साथ ही उसे सही भी कह दिया गया क्योंकि उसमें समीक्षक को लेखक के द्वारा एक नई दिशा की खोज का संकेत मिला।
डॉ. बच्चनसिंह ने भारतेन्दु के नाटकों को एक ‘क्रांतिकारी कदम‘ बताया। डॉ. सी.पी. सिंह ने सैद्धान्तिक समीक्षा करते हुए लिखा है कि भारतेन्दु जी का प्रधान तथा धीरोदात्त और धीर ललित पर ही विशेष अनुराग लक्षित होता है, उनके पास सभी कवि उच्च कोटि के हैं।

द्विवेदी एवं प्रसाद–युगीन समीक्षा

उत्तर भारतेन्दुकाल में खेले जाने वाले नाटकों का कथ्य प्रायः पौराणिक सामाजिक विषयों से सम्बद्ध था परन्तु कई स्थानों पर राजनीतिक समस्याओं की ओर भी संकेत कर दिया जाता था जैसे ”सीता स्वयंवर” नाटक में ब्रिटिश कूटनीति के समान कठोर शिवधनुष को टस से मस नहीं किया जा सकता” कहा गया। इस प्रकार संवादों के माध्यम से ही जन-जागृति उत्पन्न करने का उपक्रम किया जाता था। ऐसे आयोजन कहीं-कहीं प्रतिबन्धित भी कर दिये जाते थे। इस प्रकार इस युग में राजनैतिक संकेत प्रतीकात्मक रूप में प्रेषित किए जाने लगे।
सार्वजनिक स्थल पर मंच-निर्माण, घरों में नाट्य प्रदर्शन, नाट्य पुनरावृत्ति, पूर्वाभ्यास,भडकीली पोशाकें, ट्रान्सफर सीन, दर्शक श्रेणियाँ, कुलीन वर्ग आदि का कला प्रेम, आमंत्रण पत्रों का चलन, चमत्कार प्रयोग आदि के संकेत मिलते हैं। द्विवेदीयुगीन अभिनय कला आदि अतिनाटकीयता से प्रेरित कही गई है परन्तु इन सबसे बडी बात तो यह है कि इस युग में रंगमंचीय समीक्षाओं का भी प्रचलन हो चुका था।
समीक्षाओं का रूप कैसा था, यह बतलाना कठिन है। १९२०-१९३० तक साहित्यिक नाटकों के साथ-साथ पारसी रंगमंचीय नाटकों की धारा चलती रही थी। सभी नाटकों में अतिनाटकीयता प्रसंगों, दैवीशक्ति, कौतुहल चमत्कार, शोखी और छेडछाड प्रेम सम्बन्धी सस्ते गाने, रोमांचकारी घटनाओं, कुरुचिपूर्ण हास्य आदि की प्रधानता थी। इन व्यावसायिक रंगमंचीय नाटकों ने जनरुचि को इतना विकृत कर दिया कि आधुनिक काल में भी नाटककारों को साहित्यिक नाटकों के अनुसार, गीत, गजल का प्रयोग अनिवार्य करना पडा। इसलिए जयशंकर प्रसाद पर भी रचनागत शिथिलता, अराजकता,बहुउद्देशीयता, घटना प्रधानता का दोषारोपण किया गया है परन्तु ऐसा लगता है कि उस युग में कुछ लेखकों ने कटु आलोचना करना ही अपना ध्येय बना लिया था। चाहे वे सही हो या गलत लेकिन आलोचक को अध्येता होने के साथ-साथ प्रस्तुति के काल,पात्र और वस्तुस्थिति से भी पूर्ण परिचित होना चाहिए अन्यथा किसी के दोषी ठहराने के पूर्वाग्रह के आक्षेप से वह स्वयं को बचा नहीं सकेगा क्योंकि समीक्षा के दौरान कभी-कभी भारी भूलें रह जाती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम प्रसाद जी की इस उक्ति की ओर ध्यान दें – ”मैंने उन कम्पनियों के लिए नाटक नहीं लिखे हैं जो चार चलते अभिनेताओं को एकत्र कर कुछ पैसा जुटाकर चार पर्दे मँगनी माँग लेती हैं और दुअन्नी-अठन्नी के टिकिट पर इक्केवालो, खोमचेवालो और दुकानदारों को बटोर कर जगह-जगह प्रहसन करती फिरती हैं। उत्तर रामचरित, शकुन्तला और मुद्राराक्षस कभी न ऐसे अभिनेताओं द्वारा अभिनीत हो सकते हैं और न जन साधारण में वे रसोद्रेक का कारण बन सकते हैं ….।” तो प्रसाद जी पर किया गया दोषारोपण विद्वजनों के प्रति ईर्ष्या का द्योतक लगने लगता है।
प्रसाद काल में कुछ नए रूप सामने आए वे हैं – नेपथ्य में गान, कोलाहल और रणवाद्य आदि। बहुत कम अवसर ऐसे होते हैं जब लेखक स्वयं पूर्वाभ्यास के समय कलाकारों के मध्य बैठकर अपनी लिखित भावधारा के मूर्त रूप का रसास्वादन करता है और उसमें कहीं अर्थ का अनर्थ हो रहा हो तो सुधार भी करवा देता है। काशी में प्रसाद जी पूर्वाभ्यास के समय कलाकारों के मध्य बैठा करते थे। भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग के कलाकारों द्वारा मंचित उदयपुर में १२, १३, १४ जुलाई १९८८ को मंचित मेरे एक नाटक ”मेरा देश मेरे सपने” के पूर्वाभ्यास के दौरान मुझे भी उन कलाकारों के मध्य बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
समीक्षाएँ नाटक क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं – वे नाट्य जगत् की अथवा साहित्य के विविध विधाओं की प्रस्तुति का बोध कराती हैं जिससे कला का और विकास होता है और युग का बोध। प्रसाद युग में समीक्षात्मक माध्यम का पूर्ण अभाव प्रतीत होता है यही कारण है कि रंगमंच की दृष्टि से इस युग को मात्र एक कडी समझा गया है, यद्यपि समीक्षाओं का अपेक्षाकृत रूप तात्कालिक ‘जागरण‘, ‘इन्दु‘, ‘सरस्वती‘, ‘माधुरी‘, ‘प्रभा‘, ‘आज‘ आदि पत्र-पत्रिकाओं में द्रष्टव्य बतलाया गया है पर यह सब अप्राप्य होने के कारण ही इस युग के समीक्षात्मक रूप को उभारने में असमर्थता प्रतीत होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि समीक्षा का आदिकाल कुछ बिखरे-बिखरे सूत्रों में दिखाई देता है।

समीक्षा युग

प्रसादोत्तर युग में रंगमंचीय गतिविधियों की एक जबरदस्त हलचल दिखाई देने लगी। अनेक प्रकार के प्रयोग और परीक्षण यहीं से विकसित होने लगे। इस युग में अनेक कलाकारों एवं उनकी नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षात्मक चर्चा मिलती है। इस युग के लोक विख्यात पृथ्वीराज कपूर के लिए लिखा गया है कि इनके प्रस्तुत नाटकों के कथा शिल्प में एक स्वाभाविक विकासक्रम है। इनमें न अतिमानवीय तत्त्व है और न कोई कृत्रिम अप्राकृतिक नाटकीय चमत्कार। पृथ्वीराज कपूर के समय से ही प्रकाश उपकरणों का प्रयोग आरम्भ हो चुका था। इनके नाटकों में देशभक्ति एवं साम्प्रदायिक एकता की कलात्मक अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है। नाटकों के कथोपकथन स्वाभाविक एवं व्यंग्यपूर्ण होने के कारण मर्म पर सीधी चोट करते हैं। इनके नाटकों द्वारा साम्प्रदायिक एकता का शंखनाद फूँका जाना आर्यावृत्त की बहुत बडी सेवा थी। श्री पृथ्वीराज कपूर द्वारा बार-बार ड्राप गिराकर ३०-३० या ४०-४० सीन दिखाने की परम्परा भी समाप्त कर दी गई। मंच सज्जा की ओर श्री पृथ्वीराज विशेष ध्यान रखते थे। उन्होंने बडे-बडे खम्भों,छत्रधारी सिंहासनों और चित्रांकित दीवारों तक को भव्य रूप में प्रस्तुत किया। उस समय के आलोचकों ने अभिनेता, निदेशक और व्यवस्थापक पृथ्वीराज कपूर के व्यक्तिगत प्रभाव तक की ओर भी दृष्टिपात किया। दरअसल इस युग का समीक्षक नाटक देखने वाले दर्शक, अभिनेता, वेषकार, रंगलेपन, ध्वनि, संगीत तथा प्रकाश प्रयोग आदि सभी पहलुओं की ओर बडे एकाग्रचित्त से ध्यान देकर उनकी अच्छाई-बुराई को कलमबद्ध करता है। इतना ही नहीं, समीक्षक स्वयं निदेशक और व्यवस्थापकों से व्यक्तिगत भेंटवार्ता कर अपनी शंकाओं का समाधान भी कर लेता है ताकि वह प्रस्तोताओं के उस संदेश का भी मूल्यांकन कर लेता है कि प्रस्तोता अमुक प्रस्तुति के द्वारा अपना संदेश पहुँचाने में कहाँ तक सफल हुआ है।
इस युग में नाट्य कला का सरकारी, गैर सरकारी स्तर पर नाट्य प्रशिक्षण भी आरम्भ हो गया जिससे सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ अच्छे दर्शक, परिष्कृत समीक्षक और नए-नए आयाम दिखाई देने लगे। इस चहुँमुखी प्रगति से हिन्दी रंग आन्दोलन ने नाटक जगत् में अपनी अभूतपूर्व सम्पदा से विशिष्ट ख्याति प्राप्त की। नाट्य समीक्षा के लिए यथोचित व्यवस्था भी ‘धर्मयुग‘, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान तथा कई दैनिक पत्रों में पाई जाने लगी। यहाँ तक कि नियमित स्तम्भ आने लगे। इसलिए यदि इस काल को पूर्णरूपेण समीक्षा-युग के नाम से सम्बोधित किया जाय तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

समीक्षा युग की देन

इस युग के पत्र-पत्रिकाओं को श्रेय है कि जिनके सहयोग से समीक्षा ने अपना अलग स्थान बनाया है। बडी उपलब्धि यह हुई कि नाट्य जगत् के वैविध्य को इसने उभारा जिससे हिन्दी रंगमंच के विकसित परम्परा की अनेक विधाओं को अपनाया जाने लगा। एब्सर्ड नाटकों की प्रस्तुतियों ने कई लेखकों और प्रस्तोताओं को बहुत प्रभावित किया। मोहन राकेश के ‘बीज‘ और ‘आधे अधूरे‘ नाटक इसी परम्परा के द्योतक हैं। लेखन में नयापन होगा तो निःसंदेह समीक्षा भी अपना रूप बदलेगी।
नाट्य अध्येताओं, समीक्षकों और लेखकों ने सम्प्रति नाटकों की कथावस्तु को केवल‘मूड‘ और ‘तर्क‘ का स्वरूप माना है। डॉ. लाल की भी यही मान्यता है। बिम्बवादी और अमूर्त कथा वस्तुपूर्ण नाटक भी मंच पर प्रस्तुत हुए हैं। राजनैतिक अव्यवस्था और अत्याचारों की कटु आलोचना भी आज के नाटक की विषय वस्तु है। मनोवैज्ञानिक कथावस्तु, प्रकृति प्रकोपयुक्त लघुकथानक भी इस युग की विशेष देन है। इस प्रकार इस युग ने पुरानी शैली को छोड सर्वथा नवीन शैली को जन्म दिया है।

Source: https://vimisahitya.wordpress.com/

Friday, April 3, 2015

7 Wants

'Want' means 'desire for something' and Vedas says-


"आशायाः ये दासाः ते दासाः सर्वलोकस्य ।

  आशा येषां दासी तेषां दासायते लोकः ॥"

Means those who are slaves of desire are slaves of entire world. They may be true but I still want many things in my life, still want to do/visit/buy/purchase things, and here is my list-

1. Dream: I have and I want it. Actually its more than a Want.

2. A Royal Enfield: My friend have one and  after sitting as pillion for many times, now feeling like I have desire for my own.

3. A home with self-designed interior, coloured theme, lawn, a big library and reading room.

4. To Publish My Book.

5. To Learn Guitar: New in the list.

6. Listen to good music from around the world

7. Learn Painting and paint something big.


Thursday, April 2, 2015

नर हो न निराश करो मन को / मैथिलीशरण गुप्त

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।
संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।

- मैथिलीशरण गुप्त (Maithili Sharan Gupt)

आलोचना : गद्य व काव्य


डॉ. गुलाबराय का कथन है – ?आलोचना का मुख्य उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वाद कर पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना तथा उसकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति निर्धारित करने में योग देना है।? इस तरह आलोचना साहित्य की व्याख्या करती है, उसके गुण-दोष बताती है, उसके निर्माण की दिशा निर्धारित करती है।
यह सर्वविदित है कि जहाँ रचनाकार का कर्म विराम लेता है वहीं से आलोचक का कर्म प्रारम्भ होता है। आधुनिक उत्तर संरचनावादी रचनाकार और आलोचक में बुनियादी भेद नहीं मानता। उसकी दृष्टि में दोनों ही भाषा का खेल खेलते हैं, दोनों रचना करते हैं। जहाँ रचयिता समाप्त करता है वहाँ से पाठक शुरू करता है। अतः आलोचना और साहित्य तत्वतः एक हैं परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। आलोचना मानव व्यक्तित्व से भी अंशतः प्रभावित होती है।
आलोचना से सामान्यतः छिद्रान्वेषण का अर्थ लिया जाता रहा है, किन्तु आलोचना का लक्ष्य वस्तुतः लेखक या उसकी कृति के दोषों को संकलित करना नहीं कृति का विवेचन करते हुए उसके विविध पक्षों का उद्घाटन कर उसके महत्त्व एवं अमहत्त्व को स्थापित करना है। अंग्रेजी में आलोचना के लिए ?क्रिटिसिज्म? शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका मूल अर्थ है – निर्णय। आलोचक वह है जो निर्णय दे। भारतीय वाङ्मय में ?आलोचना? केवल निर्णय की प्रवृत्ति का अर्थ बोध नहीं कराती, उसके अर्थ का क्षेत्र अधिक व्यापक है। आलोचना शब्द के मूल में ?लुच्? धातु है जिसका अर्थ है – देखना। आलोचना के लिए हमारे यहाँ पर्यायवाची शब्द समीक्षा है, वह भी इसी अर्थ की व्यंजना करता है। अतः साहित्य के क्षेत्र में आलोचना किसी साहित्यिक कृति का सम्यक एवं समग्र निरीक्षण है। यह निरीक्षण एक तो कृति के बाह्य रूप का विवेचन है, दूसरे लेखक की अन्तः प्रकृति की चेतन, अवचेतन प्रक्रियाओं का विश्लेषण है, तीसरे भावक के प्रभाव संवेदनों की अभिव्यक्ति है और अन्त में कृति की समग्र प्रतिक्रियाओं के अनुरूप वस्तु का मूल्य निर्धारण है।
आलोचना के विकास की आरम्भिक अवस्था में कृति का गुण-दोष विवेचन अथवा उसके अर्थ का भाष्य ही आलोचक का मुख्य कर्त्तव्य रहा है। ?काव्य मीमांसा? आलोचना अथवा समीक्षा के इसी ध्येय की ओर इंगित करती है – ?अन्तर्भाष्यं समीक्षा। अवान्तरार्थ विच्छेदश्च सा।? अर्थात् समीक्षा का लक्ष्य किसी कृति का अन्तर्भाष्य, उसके तत्त्वों का विवेचन और उसके सम्बन्ध अवान्तर से प्राप्त अर्थों का संकलन है। किन्तु जैसे-जैसे आलोचना विकसित होती जाती है वह कृति के आंतरिक और बाह्य पक्षों का अन्वीक्षण करती है। सूक्ति, भाष्य, व्याख्या, निर्णय आदि आलोचना के अंग स्वरूप हो जाते हैं।
आलोचना का मुख्य उद्देश्य है साहित्य के मर्म का उद्घाटन करना। इस उद्घाटन की क्रिया में आलोचक, लेखक और पाठक के बीच दुभाषिए का काम करता है। राजशेखर ने आलोचक के ध्येय को इस प्रकार व्यक्त किया है -
सा च कवेः श्रममभिप्रायं च भावयति। तथा खलु फलितः कवेव्यापारतरुः अन्यथा स्रोडवकेशी स्यात्।
(काव्य मीमांसा)
अर्थात् आलोचक कवि के श्रम अभिप्राय तथा भाव को व्यक्त करता है। उसके प्रयत्न से ही कवि व्यापार तरु फल देता है, अन्यथा वह फलित नहीं होता। इस प्रकार आलोचक की प्रतिभा साहित्य के बाह्यांगों के साथ-साथ उसके अंतरंग को भी प्रकाश में लाती है।
आलोचक के उत्तरदायित्व को अत्यन्त गम्भीर मानते हुए अर्नाल्ड ने उसके निस्संग प्रयत्न पर अधिक बल दिया है। यह निस्संग प्रयत्न एक ओर तो आलोचक को पूर्वाग्रह से मुक्त रखता है, दूसरी ओर सांसारिक क्षुद्रताओं से तटस्थ। आचार्य शुक्ल की शब्दावली में इस निस्संग प्रयत्न के द्वारा आलोचक लोक मंगल की सच्ची साधना कर सकता है। अतः आलोचकों के पक्ष में उसका पूर्वाग्रह रहित एवं संयमित होना अत्यावश्यक है। आचार्य शुक्ल आलोचना के लिए विस्तृत अध्ययन, सूक्ष्म अन्वीक्षण और मर्मग्राही प्रज्ञा को अपेक्षित मानते हैं। एक स्थान पर वे लिखते हैं – ?समालोचक के लिए विद्वता और प्रशस्त रुचि दोनों अपेक्षित हैं। न रुचि के स्थान पर विद्वता काम कर सकती है और न विद्वता के स्थान पर रुचि।?
हिन्दी आलोचना का व्यवस्थित विकास भारतेन्दु युग में ही गद्य की अन्य विधाओं के साथ-साथ प्रारम्भ हो जाता है। आलोचना की विभिन्न पद्धतियों के विषय में भी गहन विश्लेषण आरम्भ हुआ। आलोचना पद्धतियों को व्यापक रूप से दो वर्गों में बाँटा जा सकता है -
(१) सैद्धान्तिक आलोचना
(२) व्यावहारिक आलोचना
सैद्धान्तिक आलोचना – सैद्धान्तिक आलोचना काव्य का शास्त्रीय पक्ष है। साहित्य का स्वरूप जब स्थिर हो जाता है तब उसके आधार पर आलोचक की प्रतिभा जिन सिद्धान्तों का निर्माण संकलन करती है वे कालांतर में साहित्य के नियामक बन जाते हैं। इन सिद्धान्तों की आधारशिला पर ही व्यावहारिक आलोचना का भव्य भवन खडा होता है।
व्यावहारिक आलोचना – व्यावहारिक आलोचना, आलोचना के सिद्धान्तों का प्रयोगात्मक पक्ष है। व्यावहारिक आलोचना काव्य अथवा साहित्य का प्रयोगात्मक अध्ययन करती है। व्यावहारिक आलोचना की तीन प्रमुख पद्धतियाँ हैं – प्रभावात्मक, निर्णयात्मक, व्याख्यात्मक।
इनमें व्याख्यात्मक आलोचना का विशेष महत्त्व है। यह वस्तुतः वैज्ञानिक आलोचना प्रणाली है। व्याख्यात्मक आलोचना कृति के मूल्यों को कृति में ही खोजती है। कृति की स्पिरिट, कला और विषय की यह वैज्ञानिक विवेचना करती है। आलोचक वैज्ञानिक की तरह आलोच्य वस्तु का विश्लेषण करता है और निस्संग भाव से उसका विवेचन करते चलता है।
व्याख्यात्मक आलोचना के कई उपभेद किये जा सकते हैं – इनमें चार प्रमुख हैं – मनोवैज्ञानिक, चरितमूलक, तुलनात्मक, ऐतिहासिक। ऐतिहासिक आलोचना के अन्तर्गत ही माक्र्सवादी और समाजशास्त्रीय आलोचना पद्धतियों को रखा जा सकता है।
साहित्य आरम्भ से ही पद्य रूप में अस्तित्व ग्रहण करता आया है। अतः प्रारम्भिक समीक्षा के मानदण्ड भी पद्य के आधार पर निर्धारित किए गए हैं। संस्कृत का काव्य शास्त्र साहित्य निर्माण एवं आलोचना दोनों के लिए ही प्रतिमान प्रदान करता है। धीरे-धीरे बदलते युग सन्दर्भ के साथ प्रतिमान भी बदलते गए।
गद्य का विकास आधुनिक युग में हुआ है। भारतेन्दु से हिन्दु गद्य के विकास की सुदीर्घ परम्परा परिलक्षित होती है। गद्य की प्रमुख विधाएँ उपन्यास, कहानी, निबन्ध, नाटक आदि हैं। इन विधाओं के विकास के साथ ही इनके मूल्यांकन की आवश्यकता महसूस की गई। प्रारम्भ में गद्य के समसामयिक समस्याओं को वर्णित किया गया था। गद्य का स्वरूप भी परिष्कृत नहीं था तब आलोचना कथ्य तक ही सीमित थी। भारतेन्दु युग में पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षाओं के रूप में आलोचना का विकास हुआ। जैसे-जैसे कथ्य में जटिलता आती गई वैसे-वैसे आलोचना का स्वरूप भी विकसित होता गया है। छायावाद तक आते-आते अर्थात् प्रेमचन्द के समय में गद्य का स्वरूप काफी स्थिर हो चुका था। जब गद्य का स्वरूप स्थिर हो गया तो उसकी आलोचना के मानदण्ड भी निर्धारित कर दिए गए। आलोचक के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह गद्य के विभिन्न रूपों के मूल तत्त्वों को पहचाने इसके अनन्तर आलोचना कर्म में प्रवृत्त हो। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने अपने ?हिन्दी साहित्य सर्वस्व? में उपन्यास, कहानी, निबन्ध आदि की समीक्षा के कतिपय मानदण्डों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार उपन्यास की समीक्षा करते समय निम्नांकित प्रश्नों को ध्यान में रखकर निर्णय करना चाहिए -
१. उपन्यास की कथावस्तु कहाँ से ली गई है ?
२. यदि कथा वस्तु ऐतिहासिक या पौराणिक है तो लेखक ने उसमें क्या परिवर्तन करके क्या विशेष प्रभाव उत्पन्न करना चाहा है ?
३. इस परिवर्तन के निमित्त लेखक ने किन नवीन पात्रों या घटनाओं का समावेश किया है ?
४. इन पात्रों या घटनाओं में से कितनों की आवश्यकताएँ वास्तविक हैं और कहाँ तक उचित हैं ?
५. यदि कथा काल्पनिक है तो वह कहाँ तक सम्भव, विश्वसनीय, स्वाभाविक और संगत है और उपन्यासकार जो प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है, उसमें उसे कहाँ तक सफलता मिली है ?
६. लेखक अपना उद्दिष्ट प्रभाव उत्पन्न करने में कहाँ तक सफल हुआ है ?
७. इस सफलता के लिए उसने किस भाषा शैली का आश्रय लिया है और वह भाषा शैली कथा की प्रकृति तथा पाठकों की योग्यता के कहाँ तक अनुकूल है ?
८. संवादों की भाषा शैली पात्रों की प्रकृति तथा परिस्थिति के कहाँ तक अनुकूल, स्वाभाविक तथा उचित मात्रा में है ?
९. लेखक ने पाठक का मन उलझाए रखने के लिए किस कौशल का प्रयोग किया है -
(क) प्रारम्भ उचित ढंग से किया है या नहीं ?
(ख)घटनाओं का गुंफन अधिक जटिल तो नहीं हो गया और मार्मिक स्थलों पर उचित ध्यान दिया गया है या नहीं?
(ग) कथा का चरमोत्कर्ष दिखाने में शीघ्रता या विलम्ब तो नहीं हुआ और यह चरमोत्कर्ष दिखाने में अनुचित, अनावश्यक, अस्वाभाविक तथा असंगत घटनाओं का समावेश तो नहीं किया गया ?
(घ) उपन्यास का अन्त किस प्रकार किया गया ? वह कथा की प्रकृति, घटना-प्रवाह और पात्रों के चरित्र और मर्यादा के अनुकूल, संगत, आवश्यक, अपरिहार्य और स्वाभाविक है या नहीं ? अनावश्यक रूप से उपन्यास को दुखान्त या सुखान्त तो नहीं बना दिया गया ?
(ङ) किस पुरुष में कथा कही गई है ? वर्णन, पत्र, भाषण, समाचार, संवाद, वार्तालाप, आत्मकथा, सूचना आदि।
(च) रूप की नवीनता उत्पन्न करने से उपन्यास के कथा प्रवाह में क्या दीप्ति या दोष आ गए ?
१०. उपन्यास में वर्णन कहाँ तक उचित परिमाण में, आवश्यक और स्वाभाविक हैं ?
११. जो बातें (पात्रों का स्वभाव आदि) व्यंजना से बतानी चाहिए थीं, उन्हें अपनी ओर से तो नहीं बता दिया गया? पात्रों का चित्रण उनकी मर्यादा और प्रकृति से भिन्न, अस्वाभाविक, असंगत या अतिरंजित तो नहीं हो गया ?
१२. उपन्यासकार ने किस विशेष वाद या सम्प्रदाय या नीति या सिद्धान्त से प्रेरित होकर लिखा है और उनकी सिद्धि में वह कहाँ तक सफल हो पाया है ?
१३. उपन्यासकार ने अपने व्यक्तिगत जीवन या अनुभव की जो अभिव्यक्ति उपन्यास में की है, वह कितनी प्रत्यक्ष है और कितनी व्यंग्य ? वह कहाँ तक उचित है या अनुचित ?
१४. उस उपन्यास का साधारण मन पर क्या प्रभाव पड सकता है और वह पाठक की वृत्ति-प्रवृत्ति, स्वभाव, चेष्टा आदि को कहाँ तक अपने पक्षों में ला सकता है? सामाजिक तथा नैतिक दृष्टि से वह प्रभाव कहाँ तक वांछनीय है ?
१५. उपन्यास में क्या मौलिकता है और उसमें सुन्दर अद्भुत तथा असाधारण सन्निवेश कहाँ तक और किस प्रकार किया गया है ?
१६. अलौकिक तत्त्वों का प्रयोग कहाँ तक उचित और बुद्धि संगत हुआ है ?
१७. उपन्यास की कथावस्तु, घटना, गुम्फन, भाषाशैली, चरित्र चित्रण और परिणाम आदि में जो दोष हों उनका सुधार आप कैसे करते हैं ?
यद्यपि उपन्यास और कहानी में विशेष अन्तर नहीं है। उपन्यास के प्रतिमान कहानी के प्रतिमान मान सकते हैं पर कहानी का आकार छोटा होने के कारण उसके कतिपय निम्न प्रतिमानों का विवेचन अपेक्षित है -
१. कथाकार का क्या उद्देश्य है ? कथाकार कोई विशेष प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है या केवल मनोविनोद ?
२. कथाकार ने एक ही घटना ली है या नहीं ?
३. वह कथा अपने में पूर्ण-आदि-मध्य और अन्त सहित है या नहीं और वह एक ही प्रभाव उत्पन्न करती है या नहीं*?
४. अनावश्यक वर्णन या विस्तार तो नहीं है ?
उपर्युक्त समीक्षा-मानदण्ड सामान्य कथा साहित्य पर ही लागू होते हैं।
युगीन परिस्थितियाँ नए आयाम और नए सन्दर्भ देती है, फलतः आलोचना के पुराने मानदण्ड निरर्थक प्रतीत होने लगते हैं। अतः कथ्य के अनुरूप नए मानदण्डों की तलाश आवश्यक है। पद्धति विशेष पर आधारित कथा साहित्य का विवेचन पद्धति विशेष के मानदण्ड पर ही किया जा सकता है और इसी के परिणाम मनोविश्लेषणवादी, प्रगतिवादी अर्थात् माक्र्सवादी समीक्षा पद्धतियों का विकास हुआ परन्तु ये समीक्षा की एकांगी दृष्टियाँ हैं जो कृति विशेष पर ही लागू होती हैं और कृति का वास्तविक पक्ष अनुद्घाटित ही रह जाता है।
प्रेमचन्दोत्तर कथा साहित्य, स्वातन्त्र्योत्तर कथा साहित्य के कथ्य में जटिलता आने लगी। व्यक्ति के आन्तरिक और बाह्य द्वन्द्व ने कथा में अपना स्थान निर्धारित किया और इसके साथ ही पुराने कथा तत्त्व भी धूमिल पडने लगे और आलोचना के प्रतिमान भी। कथ्य के अनुरूप आलोचना का स्वरूप भी स्थूल से सूक्ष्मतर होने लगा। अब आलोचना कथा तत्त्वों या गुण-दोष विवेचन तक सीमित नहीं रही बल्कि उसका उद्देश्य रचना के मूल उद्देश्य के साथ रचना-प्रक्रिया, रचनाकार के मानसिक परिवेश की परीक्षा करना रहा है। शिल्प की अपेक्षा आज कथ्य महत्त्वपूर्ण हो चुका है।
हिन्दी में आधुनिक कथा समीक्षा के इतिहास में मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, भीष्म साहनी, मार्कण्डेय, इन्द्रनाथ मदान, कृष्णा सोबती आदि के नाम भी उभरकर आए। पुराने कथा प्रतिमानों की अपर्याप्तता घोषित करते हुए निर्मल वर्मा ने लिखा – उपन्यास की अर्थवत्ता यथार्थ में नहीं, उसे समेटने की प्रक्रिया में, उसके संघटन की अन्दरूनी चालाक शक्ति में निहित है।? इस प्रकार कथा साहित्य के नये प्रतिमानों की खोज का सिलसिला जारी है। डॉ. नामवरसिंह ने कहानी समीक्षा की पुरानी दृष्टि – जिसमें कथानक, चरित्र, वातावरण, प्रभाव वस्तु आदि अवयवों की अलग-अलग अभ्यस्तता रहती थी – का खुलकर विरोध किया और रचनाधर्मी कहानी की संश्लिष्टता को समझने-समझाने का सवाल उठाया गया है। नामवरसिंह के अनुसार कहानी की आलोचना के लिए उसका पाठ बुनियादी महत्त्व रखता है। बिना उसके कहानी के मूल आशय को जानना कठिन है। साथ ही इसके समीपी सम्फ के बिना कहानी का मूल आशय जानना असम्भव है (कहानीः नई कहानी, पृ. १४५) उन्होंने आगे लिखा है – किसी अच्छी का निर्माण करने के लिए एक बनाये मानदण्ड से आरम्भ करने की अपेक्षा पढने की प्रक्रिया से शुरू करना अधिक उपयोगी हो सकता है। (पृ. १६५-१६६) इसलिए आज कहानी की आलोचना में भी मुख्य प्रश्न पद्धति का है, प्रतिमान का नहीं। (पृ.१९९) ऐसी पाठ प्रक्रिया जिसमें पाठक कहानी को अपने भीतर फिर से रचते हुए समग्रता से उसका प्रभाव ग्रहण करता है कहानी की आलोचना का आधार हो सकती है। कहानी ः नयी कहानी में कहानी के संबंध में लिखते हुए नामवर सिंह ने कहा – ?मुख्य कथा घटना विन्यास इस प्रकार का हो कि ?फिर क्या हुआ का कुतूहल न तो मर्यादा से अधिक प्रबल होने पाए और भूमिका इतनी लम्बी न हो कि मन अतीतवासी हो रहे। …..आज की कहानी का शिल्प की दृष्टि से सफल होना काफी नहीं है बल्कि वर्तमान वास्तविकता के सम्मुख उसकी वास्तविकता भी परखी जानी चाहिए। कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि वह अपने युग के मुख्य सामाजिक अन्तर्विरोध के सन्दर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है।? (उपर्युक्त पृ. ३७)
समानान्तर कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी जनवादी कहानी पर इधर प्रखर समीक्षा दृष्टि विकसित हुई है और कहानी को उनकी समग्र अन्तर्योजना अन्विति प्रभाव में पहचानने की कोशिश की गई है। कथा साहित्य में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श जैसी अवधारणाओं ने भी कथा मूल्यांकन के दृष्टिकोण में पर्याप्त विकास किया है। इधर क्षण-क्षण बदलते परिवेश और कथा वस्तु ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक रचना अपने प्रतिमान स्वयं निर्धारित करती है, किसी बने बनाए फार्मूले से कृति की परख अपूर्ण होने की पूर्ण सम्भावना है। हर आलोचक की एक विशेष दृष्टि होती है और वह अपनी विशेष दृष्टि से मूल्यांकन करता है, अतः आवश्यकता इस बात की है कि मूल्यांकन पूर्ण होना चाहिए उसे वाद विशेष के दायरे में आबद्ध कर उसके स्वरूप को संकुचित नहीं करना चाहिए।
उपन्यास समीक्षा की किसी सुनिश्चित पद्धति का विकास हिन्दी में नहीं हो सका। इस क्षेत्र में प्रयास किए जा रहे हैं। नेमिचन्द्र जैन की ?अधूरे साक्षात्कार? उपन्यास समीक्षा को नई दृष्टि देने वाली पुस्तक है।
अतः गद्य की समीक्षा के लिए किसी भी प्रकार की अतिवादिता से बचते हुए मौलिक एवं गहन दृष्टि का होना आवश्यक है। आचार्य शुक्ल द्वारा प्रतिपादित विश्लेषण, विवेचन और निगमन पद्धति का अनुसरण करते हुए तटस्थ भाव से आलोचना की जानी चाहिए। सतही आलोचना प्रवृत्ति से बचना चाहिए। रचना का मूल्यांकन उसकी समग्रता में किया जाना चाहिए। आलोचना की महानता रचना को महान बनाती है। सच्ची आलोचना तो उस विद्युत तरंग की तरह है जो निमिष मात्र में साहित्यिक कृति को प्रकाश से उद्भासित कर देती है। आलोचना कर्म की इस गंभीरता को देखते हुए आलोचक को व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए, रचना की समझ को विकसित करते हुए मूल्यांकन कर्म में अग्रसर होना चाहिए। आलोचना का महत्त्व सर्जक एवं भोक्ता दोनों ही दृष्टियों से है। इसलिए आलोचना कर्म सर्जन से भी अति महत्त्वपूर्ण है। घ्
संदर्भ ः
१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. नगेन्द्र
२. हिन्दी आलोचना का विकास – नन्दकिशोर नवल
३. हिन्दी साहित्य सर्वस्व – आचार्य सीताराम चतुर्वेदी
४. आलोचना*और*आलोचक – मोहनलाल, सरेशचन्द्र गुप्त


काव्य-आलोचना की अवधारणा, औचित्य, यथार्थ और प्रक्रिया तथा इसके प्रतिमानों को लेकर यहाँ प्रस्तुत विचार लेखक के अनुभवपरक निष्कर्षों तथा व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित हैं तथा जहाँ तक सम्भव हो सका है, विविध ग्रंथों तथा विद्वानों के उद्धरणों से बचने का प्रयास किया गया है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि अपने समय का अधिकृतियों के प्रति अवमानना का भाव है, बल्कि यहाँ प्रयास इस बात का किया गया है कि विषय को जटिल तथा बोझिल होने से बचाया जाये। यह भी आग्रह है कि लेख में प्रस्तुत विचारों को संकेत रूप में ग्रहण किया जाये।
जिस तरह से विभिन्न रचनाकारों के रचनात्मक आधार, प्रेरणा तथा अभिप्रेत कभी भी समान नहीं हो सकते, ठीक उसी प्रकार आलोचना की कोई एक निश्चित तथा सर्वमान्य अवधारणा भी स्थापित नहीं की जा सकती क्योंकि रचना की भाँति ही आलोचना भी लेखक की बौद्धिक-तात्त्विक चिंता और विचार-प्रक्रिया का परिणाम होती है। आलोचना रचना के प्रति उत्तरदायी सामाजिक और सांस्कृतिक कर्म है। कविता जीवन के अनुभवों को रचनाकार के संवेदनशील दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जिसमें सर्जक की यथार्थपरक कल्पना तथा कल्पनापरक यथार्थ का समावेश होता है। कविता जीवन का भाव पक्ष है, संश्लिष्ट पक्ष और संवेदनात्मक पक्ष है जिसे कवि अपने अनुभवों की आँच में तपा कर कलाकृति के तौर पर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। आलोचना इसका विश्लेषण करती है।
आलोचना को उसकी उपयोगिता या सार्थकता के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाना मुनासिब लगता है क्योंकि आलोचना का महत्त्व रचना से कम नहीं हुआ करता। आलोचक को सबसे पहले तो एक गंभीर तथा धैर्यवान पाठक होना चाहिए और इस स्तर पर आलोचना के मूल्य तथा महत्त्व को सरसरी तौर पर न आँक कर तर्कसम्मत ढंग से रेखांकित करना चाहिए।
कवि के सर्जनात्मक व्यापार की सूक्ष्मता, संवेदना और व्यापकता के विश्लेषण और व्याख्या का जो महत्त्व होता है, वह सिर्फ आलोचना के जरिये ही सम्भव हो सकता है। आलोचना कवि-कर्म को जाँचने-परखने-विश्लेषित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है, रचना की खामियों-खूबियों को उजागर करती है, कवि की कमियाँ बताती है, रचना का स्थान निर्धारित करती है तथा उसका मूल्यांकन करती है। तटस्थ, गंभीर तथा निरपेक्ष आलोचना सचेत करने का दायित्व भी निभाती है। इस प्रकार की आलोचना से ही रचना-परिवेश की सेहत सुधारने में सहायता मिल सकती है। आलोचना-कर्म रचना से कम जम्मेदार कर्म नहीं है। आलोचना साहित्य का अभिन्न सिद्धान्त अवश्य है लेकिन वह साहित्य की कोई उपशाखा न होकर उसकी पूरक हुआ करती है। दरअसल आलोचना का मूल भी रचना की भाँति ही सौन्दर्यशास्त्र में अवस्थित होता है। जीवन, रचना और आलोचना दोनों का ही आधार होता है। यदि कविता कवि की दृष्टि से जीवन का नवसर्जन है, तो आलोचना जीवन के उस नवसृजन का पुनर्सृजन है क्योंकि वह रचना में मौजूद अर्थ को प्रकट करती है। आलोचना पाठक और कविता को परस्पर जोडने वाले पुल का काम करती है।
आलोचना में आलोचक की निजी पसंद-नापसंद का ना तो अधिक महत्त्व होता है और ना ही होना चाहिए। यह कविता की ओर से पाठक को सम्बोधित होने वाला कर्म है। कविता में मौजूद और प्रकट होने वाला जीवन और रचनात्मक दृष्टि के प्रति गंभीर नजरिया ही वस्तुतः आलोचना-कर्म की गहराई और सार्थकता को निश्चित करता है। कुल मिलाकर आलोचना रचना के नवीन अर्थों तथा सम्भावनाओं को उद्घाटित करने वाला कर्म और किसी भी आलोचक के लिए उसका आलोचना-कर्म ही वास्तव में आलोचना का धर्म है। आलोचना किसी भी रचना का उपसंहार नहीं होती, बल्कि वह रचना के अर्थ-प्रवाह का सातत्य है। यही आलोचना-कर्म की धुरी है।
आलोचक के दायित्व के बारे में कहा जा सकता है कि कृति से गुजरते समय आलोचक महज एक आलोचक ही न होकर रचना का पाठक और प्रशंसक, विरेचक और कृति विषयक मंतव्य देने वाला सजग व्यक्ति भी होता है। इस लिहाज से, उसका दायित्व एकल न होकर बहुआयामी होता है। एक सुलझा हुआ आलोचक इस बात से भलीभाँति परिचित होता है कि मानवीय गतिविधियाँ और मानव स्वभाव ही रचना तथा आलोचना के मूल बिन्दु होते हैं। आलोचक को उस चेतना से, उस संवेदनात्मक ज्ञान और अनुभूति से सम्पृक्त होना ही चाहिए, जिसने रचनाकार की चेतना का संस्पर्श किया है। उसके लिये जीवन, मानव स्वभाव तथा संस्कृति की अनेकानेक परम्पराओं की एक समग्र-समन्वित परम्परा से परिचित होना भी आवश्यक होता है। इस रूप में वह कहीं न कहीं जीवनानुभूतियों, कार्य व्यापार तथा मनुष्य स्वभाव के इतिहासकार की भूमिका का निर्वाह भी कर रहा होता है।
किसी रचना में यथार्थ और मानव स्वभाव का तथा परम्परा का कौनसा, कितना पक्ष अभिव्यक्त हुआ है और कैसे, यह संकेत करना आलोचक का काम है। जिस वक्त आलोचक रचना के उक्त बिन्दुओं पर केन्द्रित होता है, ठीक उसी वक्त उसकी भूमिका आलोचक की न रहकर रचनाकार की हो जाती है। दरअसल, रचना में रचनाकार के भटकाव को रेखांकित करते समय आलोचक की भूमिका रचनाकार के सहयात्री की बन जाती है। एक अनुभवसम्पन्न, सिद्धहस्त आलोचक यह बता सकता है कि रचना का कथ्य भाषा तथा जीवन से किस हद तक मेल खाता है। इस रूप में आलोचक की भूमिका निःसन्देह अन्वेषक की भी हो जाती है।
कवि को रचना में जीवन के प्रभावों की, जबकि आलोचक को रचना में सन्निहित प्रभावों की पुनर्संरचना करनी होती है। आलोचक का प्रथम कार्य रचना की गुणवत्ता की पडताल करना ही होता है। वह वस्तुतः पाठक की ओर से कर्मप्रवृत्त होता है तथा अपनी रचना की ओर से कवि को जवाब देने को तैयार करता है। वह रचनात्मक जीवन मूल्यों को अपने समग्र परिवेश में विवेचित कर रचना विशेष की सार्थकता, गंभीरता के बारे में तर्कसम्मत निष्कर्ष निकालता है और यह उल्लेख भी करता है कि सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में उस रचना का क्या मूल्य है। तदनंतर रचना के शिल्पगत सौष्ठव, भाषा-कौशल, अर्थव्यापकता और समग्र रचनात्मक परिवेश में रचना-विशेष की मूल्यवत्ता के बारे में स्पष्ट, पूर्वाग्रहरहित निष्कर्ष भी देना पडता है। अतएव रचना को सम्प्रेषण, भाषा, संवेदन, अर्थ और संरचना के स्तर पर पूर्णता प्रदान करना ही आलोचक का दायित्व है। इस लिहाज से देखें तो आलोचक को भी एक ही साथ अनेकायामी भूमिका का निर्वाह करना पडता है।
आलोचना की तकनीक तथा प्रतिमानों को अलग कर नहीं देखा जा सकता। इस स्तर पर रेखांकित किया जाना चाहिये कि आलोचना के अन्तर्गत कवि की आशापरक खूबियों, उसकी शैलीपरक विशेषताओं तथा रचनाकार की अनुभूतियों, संवेदनों और अनुभवों के रचना में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया का खुलासा करने का प्रयास मौजूद होना चाहिये। आलोचना को इतना सक्षम होना चाहिये कि वह कवि के अनुभवों की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता को समीचीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित कर सके। कविता के ?पाठ? ;ज्मगजद्ध के अर्थ को उजागर करने की दृष्टि से कथ्य और शिल्प का समान महत्त्व हुआ करता है। कथ्य चूँकि कविता का प्राण तत्त्व होता है तो आलोचना उसी कथ्य को तथ्य के तौर पर उद्घाटित करती है। कथ्य और शिल्प का अभिन्न समन्वय ही किसी रचना की आकृति को निश्चित करता है।
रचना में मौजूद राजनैतिक विचारधारा का आलोचक के लिये कितना महत्त्व हो सकता है ? इसका उत्तर यों दिया जा सकता है – जितना भोजन में नमक का। विचारधारा की प्रचुरता से रचना की आँच कम पडती है और वह उसकी सीमा बन जाया करती है। किसी विचारधारा विशेष का वाद्ययंत्र बन जाना जिस तरह से रचना के लिये हानिकारक हैं, ठीक उसी तरह आलोचक के लिये भी यह श्लाघनीय नहीं माना जा सकता। असल में आलोचक की जम्मेदारी तो रचना के प्रति ही होनी चाहिये। विचारधाराओं का ज्ञान आलोचकीय दृष्टिकोण को पैना बना सकता है लेकिन आलोचक को किसी विचारधारा का बंधक नहीं बनना चाहिये। दृष्टि की व्यापकता, विचारों का खुलापन, जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण तथा परिवेश और परम्परा से जुडाव आलोचक के मंतव्य को ठोस-विश्वसनीय बनाने के लिहाज से कारगर होते हैं।
भारतीय साहित्य-आलोचना के प्रतिमानों के अन्तर्गत इस बात पर जोर दिया जाना चाहिये कि काव्य कृति की भाषा, शैली, बिम्ब, प्रतीक, देशकाल तथा रचना में विद्यमान प्राकृतिक प्रभावशीलता को भारतीय काव्य सिद्धान्त के प्रकाश में ही विश्लेषित किया जाना चाहिये। ऐसा करते समय समकालीन यथार्थ की जटिलता को रेखांकित करना भी आवश्यक बन जाता है। संस्कृत के काव्य सिद्धान्त या पाश्चात्य काव्य सिद्धांत पर निर्भर रह कर ही आधुनिक काव्य कृति का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिये हमारे पास केन्द्रवर्ती भारतीय परम्परा से निःसृत काव्य दृष्टि और समकालीन युग बोध का होना आवश्यक है। कविता में मौजूद लय को अलग से रेखांकित किया जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि वह कविता के प्रवाह और संरचना का अभिन्न अंग होता है। आलोचक को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि रचना का ?लोकल कलर? ही वस्तुतः उस कृति की ?यूनिवर्सल अपील? को; उसकी गहनता को; उसकी गंभीरता को; उसकी अर्थवत्ता को तथा अंततः सांस्कृतिक-परम्परा में रचना के स्थान को निर्धारित करता है। प्रतिमान-विकास के सन्दर्भ में कहना जरूरी लगता है कि भारतीय जनमानस तथा यहाँ की जडों व यहाँ के जीवन परिवेश से निःसृत सिद्धान्तों के आधार पर ही समकालीन आलोचना का स्वरूप निश्चित होना चाहिये। अमेरीकी या अंग्रेजी आलोचना सिद्धान्तों के माध्यम से भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य की आलोचना नहीं की जा सकती।
रचना की भाँति आलोचना भी अंततः एक शोधयात्रा और सतत संवाद का सिलसिला ही होती है। अपनी यात्रा के दूसरे व्यक्ति के नजरिये से किये मूल्यांकन को ही आलोचना का पर्याय माना जाना चाहिये। यह मूल्यांकन एक ऐसा व्यक्ति करता है जो रचनाकार की कृति से अपना आत्मीय रिश्ता बनाने का प्रयास करता है। इसलिये रचनाकार-कवि को भी आलोचना के समीप आत्मीय भाव से ही जाना चाहिये। आत्मीयता के आधार पर ही आलोचना रचनाकार के लिये भविष्य में सहायक सिद्ध हो सकती है।
आलोचना की विभिन्न धाराओं तथा आलोचना सिद्धान्त और प्रतिमानों की बहस में उलझे बिना इतना तो निःसन्देह कहा ही जा सकता है कि अंततः रचना का पाठ, आलोचक की जीवन दृष्टि तथा कवि की सर्जनात्मक दृष्टि का द्वंद्व तथा समन्वय एवं कृति की ओर से प्रस्तुत स्वयं को परखने के प्रतिमान ही काव्य-मूल्यांकन के लिये कारगर औजारों के निर्माण में मददगार हो सकते हैं। सर्जनात्मक आलोचना की संभावना इसी से बनती है।
आलोचना प्रत्यक्ष रूप से समय की रचनात्मक प्रवृत्तियों को रेखांकित करती है और इसके विकास को दर्शाती है। आलोचना का यह दायित्व किसी भी लिहाज से कमतर नहीं है। एल.पी. स्मिथ ने आलोचना की महत्ता को बेहतर ढंग से प्रकट करते हुए लिखा है कि – ?साहित्य के महान् तात्पर्य सादृश्य दर्शकों (शेक्सपीयर के नाटकों के संदर्भ में) के प्रति मेरे मन में इतना अधिक उपकार का भाव है कि आलोचकों की निन्दा करने के काम में मैं शायद ही शामिल हुआ करता हूँ। आलोचकों ने मुझे कान दिये हैं, आँखें दी हैं। उनसे मैंने सीखा है। दरअसल उन्होंने हमें सिखाया है कि जीवन सौन्दर्य का बेहतरीन ढंग से रसास्वादन किस तरह से किया जा सकता है, उसकी प्रशंसा कैसे की जा सकती है और उसे कहाँ-कैसे पाया जा सकता है और जब हम प्रतिष्ठित-समर्थ लेखकों की अनेक पुस्तकें पढने से चूक जाते हैं तो कितनी महत्त्वपूर्ण और सौन्दर्यपरक सम्पदा से वंचित रह जाते हैं।


Source: https://vimisahitya.wordpress.com/category/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96/page/2/

हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को काव्य के विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे वही दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को भी हवा दे रहे थे। कवि व साहित्यकार अपनी उर्वर प्रज्ञा भूमि के कारण युगीन समस्याओं के प्रति अधिक सावधान व संवेदनशील रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के आरम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक भिन्न-भिन्न चरणों में राष्ट्रीय भावनाओ से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातन्त्र्य चेतना का विकास होता रहा। ‘विप्लव गान’ शीर्षक कविता में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठी है।
”कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये
एक  हिलोर  इधर  से आये,  एक  हिलोर  उधर को जाये
नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की प्रलयंकारी आंख खुल जाये।
-नवीन
भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वाहन था। यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ। जिसके फलस्वरूप द्विवेदी युग ने अपने प्रौढ़तम स्वरूप के साथ नवीन आयामों और दिशाओं की ओर प्रस्थान किया। भारतेन्दु की ‘भारत दुर्दशा’ प्रेमघन की आनन्द अरूणोदय, देश दशा, राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई। द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में ‘प्राणों का बलिदान देष की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी। ‘बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लाग लगा दे’ के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतीकार मैथिलीषरण गुप्त ने स्वदेश-संगीत व सर्वश्रेष्ठ सशक्त रचना भारत-भारती में ऋषिभूमि भारतवर्ष के अतीत के गौरवगान के साथ में वर्तमान पर क्षोभ प्रकट किया है। छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुन्दर और प्रेरक देशप्रेम सम्बन्धी मधुरगीतों व कविताओं की सृष्टि की । निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, ‘भारती जय विजय करे’, ‘जागो फिर एकबार’, ‘शिवाजी का पत्र’, प्रसाद की ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया ‘हिमाद्रि तुंगश्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि कविताओं में कवियों ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है।
स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित हिन्दी कवियों की श्रृखला में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सियाराम शरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, श्याम नारायण पाण्डेय, अज्ञेय इत्यादि कवियों ने परम्परागत राष्ट्रीय सांस्कृतिक भित्ति पर ओजपूर्ण स्वरों मे राष्ट्रीयता का संधान किया।
हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा के समस्त कवियों ने अपने काव्य में देशप्रेम व स्वतन्त्रता की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति दी है। राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी की हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण आदि के काव्यकृतियों के माध्यम से उनकी राष्ट्रीय भावछाया से अवगत हुआ जा सकता है। चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतन्त्र कर जनतन्त्रात्मक पद्धति की स्थापना का आहवाहन किया। गुप्त जी के बाद स्वातन्त्र्य श्रृखला की अगली कड़ी के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी का अविस्मृत नाम न केवल राष्ट्रीय गौरव की याद दिलाता है अपितु संघर्ष की प्रबल प्रेरणा भी देता है। जेल की हथकड़ी आभूषण बन उनके जीवन को अलंकृत करती है।
‘क्या? देख न सकती जंजीरो का गहना
हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना’
(कैदी और कोकिला)
पिस्तौल, गीता, आनन्दमठ की जिन्दगी ने इनके भीतर प्रचण्ड विद्रोह को जन्म दे वैष्णवी प्रकृति विद्रोह और स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया। 1912 में उनकी जीवन यात्रा ने बेड़ियों की दुर्गम राह पकड़ ली।
‘उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है
कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है।’
1921 में कर्मवीर के सफल सम्पादक चतुर्वेदी जी को जब देशद्रोह के आरोप में जेल हुई तब कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ और महात्मा गाँधी के ‘यंग इण्डिया’ ने उसका कड़ा विरोध किया। ‘मुझे तोड़ लेना वन माली देना तुम उस पथ पर फेंक मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पर जाते वीर अनेक ”पुष्प की अभिलाषा” शीर्षक कविता की यह चिरजीवी पंक्तियाँ उस भारतीय आत्मा की पहचान कराती है जिन्होनें स्वतन्त्रता के दुर्गम पथ में यातनाओं से कभी हार नही मानी।
” जो कष्टों से घबराऊँ तो मुझमें कायर में भेद कहाँ
बदले में रक्त बहाऊँ तो मुझमें डायर में भेंद कहाँ!”
अनुभूति की तीव्रता की सच्चाई, सत्य, अहिंसा जैसे प्रेरक मूल्यों के प्रति कवि की आस्था, दृढ़ संकल्प, अदम्य उत्साह और उत्कट् अभिलाषा को लेकर चलने वाला यह भारत माँ का सच्चा सपूत साहित्यशास्त्र और कर्मयंत्र से दासता की बेड़ियों को काट डालने का दृढ़व्रत धारण करके जेल के सींखचों के भीतर तीर्थराज का आनन्द उठाते है।
”हो जाने दे गर्क नशे में, मत पड़ने दे फर्क नशे में, के उत्साह व आवेश के साथ स्वतन्त्रता संग्राम श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में आबद्ध एक श्लाघ्य नाम बालकृष्ण शर्मा नवीन का है वह स्वतन्त्रता आन्दोलन के मात्र व्याख्यता ही नहीं अपितु भुक्तभोगी भी रहे। 1920 में गाँधी जी के आह्वाहन पर वह कालेज छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े। फलत: दासता की श्रृंखलाओं के विरोध संघर्ष में इन्हे 10 बार जेल जाना पड़ा। जेल यात्राओं का इतना लम्बा सिलसिला शायद ही किसी कवि के जीवन से जुड़ा हो। उन दिनों जेल ही कवि का घर हुआ करता था।
‘हम संक्रान्ति काल के प्राणी बदा नही सुख भोग
घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग’
नवीन

अपनी प्रथम काव्य संग्रह ‘कुंकुम’ की जाने पर प्राणार्पण, आत्मोत्सर्ग तथा प्रलयंकर कविता संग्रह में क्रान्ति गीतों की ओजस्विता व प्रखरता है।
‘यहाँ बनी हथकड़िया राखी, साखी है संसार
यहाँ कई बहनों के भैया, बैठे है मनमार।’
राष्ट्रीय काव्यधारा को विकसित करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान का ‘त्रिधारा’ और ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झासी की रानी’ ‘वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में तीखे भावों की पूर्ण भावना मुखरित है। उन्होने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। ‘जलियावाला बाग में बसंत’ कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करूण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है।
”आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना
यह है शोक स्थान, यहाँ मत शोर मचाना
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खा कर
कलियाँ उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर।”
दिनकर की हुँकार, रेणुका, विपथगा में कवि ने साम्राज्यवादी सभ्यता और ब्रिटिश राज्य के प्रति अपनी प्रखर ध्वंसात्मक दृष्टि का परिचय देते हुए क्रान्ति के स्वरों का आह्वाहन किया है। पराधीनता के प्रति प्रबल विद्रोह के साथ इसमें पौरूष अपनी भीषणता और भंयकरता के साथ गरजा है। कुरूक्षेत्र महाकाब्य पूर्णरूपेण राष्ट्रीय है।
‘उठो- उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो
बढो-बढो कि आग में गुलामियों को झोंक दो ‘।
दिनकर
स्वतन्त्रता की प्रथम शर्त कुर्बानी व समर्पण को काव्य का विषय बना क्रान्ति व ध्वंस के स्वर से मुखरित दिनकर की कवितायें नौंजवानों के शरीर में उत्साह भर उष्ण रक्त का संचार करती है ।
जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त, सीमापति! तूने की पुकार
पददलित उसे करना पीछे, पहले ले मेरा सीस उतार।
सोहनलाल द्विवेदी की भैरवी राणाप्रताप के प्रति, आजादी के फूलों पर जय-जय, तैयार रहो, बढ़े चलो बढ़े चलो, विप्लव गीत कवितायें, पूजा गीत संग्रह की मातृपूजा, युग की पुकार, देश के जागरण गान कवितायें तथा वासवदत्ता, कुणाल, युगधारा काब्य संग्रहों में स्वतन्त्रता के आह्वान व देशप्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर फूटे है उन सबके तल में प्रेम की अविरल का स्रोत बहाता कवि वन्दनी माँ को नहीं भूल सका है ।
‘कब तक क्रूर प्रहार सहोगे ?
कब तक अत्याचार सहोगे ?
कब तक हाहाकार सहोगे ?
उठो राष्ट्र के हे अभिमानी
सावधान मेरे सेनानी।’
सियाराम शरण गुप्त की बापू कविता में गाँधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करूणा, विश्व-बधुत्व, शान्ति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है। राजस्थानी छटा लिये श्यामनारायण पाण्डेय की कविताओं में कहीं उद्बोधन और क्रान्ति का स्वर तथा कहीं सत्य, अहिंसा जैसे अचूक अस्त्रों का सफल संधान हुआ है। इनकी ‘हल्दीघाटी’ व ‘जौहर’ काव्यों में हिन्दू राष्ट्रीयता का जयघोष है । देशप्रेम के पुण्य क्षेत्र पर प्राण न्यौछावर के लिए प्रेरित करने वाले रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, मानसी, पथिक, स्वप्न आदि काव्य संग्रह देश के उद्धार के लिए आत्मोत्सर्ग की भावना उत्पन्न करते है । देश की स्वतन्त्रता को लक्ष्य करके श्री गया प्रसाद शुक्ल सनेही ने कर्मयोग कविता में भारतवासियों को जागृत कर साम्राज्यवादी नीति को आमूल से नष्ट करने का तीव्र आह्वाहन किया । श्रीधर पाठक ने भारतगीत में साम्राज्यवादियों के चंगुल में फंसे भारत की मुक्ति का प्रयास किया। प्रयोगवादी कवि अज्ञेय भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई बार जेल गये। जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की कवितायें भी इस दिशा मे सक्रिय हैं।
इस प्रकार हम देखते है कि स्वतन्त्रता आंदोलन के उत्तरोत्तर विकास के साथ हिन्दी कविता और कवियों के राष्ट्रीय रिश्ते मजबूत हुए। राजनीतिक घटनाक्रम में कवियों के तेवर बदलते रहे और कविता की धार भी तेज होती गई। आंदोलन के प्रारम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दी काव्य संघर्षो से जूझता रहा। स्वाधीनता के पश्चात राष्ट्रीय कविता के इतिहास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। नये निर्माण के स्वर और भविष्य के प्रति मंगलमय कल्पना उनके काव्य का विषय बन गया। फिर भी स्वतन्त्रता यज्ञ में उनके इस अवदान और बलिदान को विस्मृत नही किया जा सकता । भारत का ऐतिहासिक क्षितिज उनकी कीर्ति किरण से सदा आलोकित रहेगा और उनकी कविताए राष्ट्रीय आस्मिता की धरोहर बनकर नयी पीढ़ी को अपने गौरव गीत के ओजस्वी स्वर सुनाती रहेगीं।

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