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Thursday, March 30, 2017

पाश हमारे राष्ट्रकवि हैं : सुधीर सुमन


Pash
क्रान्‍ति‍कारी कवि‍ पाश के शहादत दि‍वस पर सुधीर सुमन का आलेख-
पाश का जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के गाँव तलवंडी सलेम में हुआ था। उनका पारिवारिक नाम अवतार सिंह था। उनके पिता सेना में थे और मेजर पद से रिटायर हुए। लेकिन एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्में अवतार सिंह किशोर उम्र से ही सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की लड़ाई से जुड़ गये और महज 38 साल की उम्र में भारतीय शासकवर्ग द्वारा पैदा किए गये खालिस्तानी पृथकतावादियों की गोलियों से शहीद हुए।
अवतार सिंह ने पंद्रह साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और उसी समय उनका जुड़ाव कम्युनिस्ट आंदोलन से हुआ और दो साल बाद जब उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई, उसी साल ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ और उसने राष्ट्र, लोकतंत्र और देशभक्ति को आम मेहनतकश जनता की नजर से परिभाषित करने पर जोर दिया। पाश एक बौद्धिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता की तरह उस आंदोलन से जुड़ गये। उन्होंने राजनीति और साहित्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन का भी जमकर अध्ययन किया। नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का उनके यहाँ जमावड़ा होने लगा। मात्र 19 साल की उम्र में उन्हें एक झूठे केस में फँसाकर जेल में डाला गया और भीषण यंत्रणाएं दी गईं। लेकिन उनके इंकलाबी विचारों को कुचलने में शासकवर्ग विफल रहा। उस लोहे को नष्ट करने में उसे सफलता नहीं मिली, बल्कि लोहा फौलाद में ढलता गया। कवितायें जेल से बाहर आती रहीं और 1970 में उनका पहला कविता संग्रह ‘लौहकथा’ प्रकाशित हुआ, जिसमें 36 कविताएं थीं, जिन्होंने हिन्‍दी की क्रान्‍ति‍कारी कविता को नई चमक और आवेग दे दी। यह जनता का लोहा था, जिस लोहे में उसकी आकांक्षा, प्रतिरोध और उसके नैतिक मानवीय मूल्यों बड़ी मजबूती से मुखरित थे- मैंने लोहा खाया है/आप लोहे की बात करते हो/लोहा जब पिघलता है/तो भाप नहीं निकलती/जब कुठाली उठानेवालों के दिलों से/भाप निकलती है/तो लोहा पिघल जाता है/पिघले हुए लोहे को/किसी भी आकार में/ढाला जा सकता है।
पाश ने ज्यादातर कवितायें पंजाबी में ही लिखीं। जिस कविता को हिन्‍दी में उपलब्ध उनकी एकमात्र कविता बताया जाता है, उसकी पंक्तियाँ देखने लायक हैं- ‘वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने?/ इस जर्जर शरीर में लिखी/लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने?’ और सचमुच हिन्‍दी ही नहीं,  दूसरी भारतीय भाषाओं के पाठकों ने भी लहू की उस शानदार इबारत को पढ़ा और लहू के रिश्ते सा ही आत्मीय महसूस किया। जिस तरह भगतसिंह हमारे राष्ट्रनायक हैं, उसी तरह पाश मुझे अपने राष्ट्रकवि लगते हैं, जनता के वास्तविक राष्ट्र के स्वप्न को आकार देने वाले और उसे हकीकत में बदलने के लिये चलने वाले संघर्षों के साथी कवि। अपनी चर्चित कविता ‘भारत’ में उन्होंने लिखा है-
भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। जाहिर है उनके लिए ‘भारत’ ऐसा शब्द नहीं है, जिसकी रक्षा के नाम पर जनता के जनवादी अधिकारों और उसके लिए चलने वाले आंदोलनों को शासकवर्ग कुचलता है। बकौल पाश-
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं….
उनके लिए जिंदगी एक पंरपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
अवतार सिंह साहित्य की दुनिया में पाश के नाम से मशहूर हुए। पिछले चार दशक की भारतीय कविता की दुनिया में पाश एक ऐसा नाम है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज करना सम्‍भव नहीं है। उनकी कवितायें क्रान्‍ति‍कारी कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रतिनिधि आवाज तो बनी ही हुई हैं, जिस तरह शहीद-ए-आजम भगतसिंह के नारे और कई कथन भारतीय जनता के रोजमर्रा जीवन का हिस्सा बन गये, हर किस्म के परिवर्तनकामी शक्तियों ने जिस तरह इंकलाब जिंदाबाद को अपना लिया, उसी तरह पाश की कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं। ‘हम लड़ेगे साथी’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी कवितायें। ये दोनों कालजयी कवितायें हैं और हर किस्म की गुलामी के खिलाफ आजाद जिंदगी के लिये हर स्तर से लड़ने के लिये और बदलाव के सपनों को न मरने देने के लिए प्रेरित करती हैं- जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी/जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी/लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी/और हम लड़ेंगे साथी…..
आजादी के आंदोलन के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए और भविष्य में देशी और विदेशी शासकवर्ग के बीच समझौते की आशंका जताते हुए भगतसिंह ने यही तो कहा था कि शोषण के विरुद्ध जनता की लड़ाई भिन्न-भिन्न रूपों में जारी रहेगी। पाश के आदर्श भगतसिंह थे और उन्होंने लिखा था कि लेनिन की पुस्तक के उस मुड़े हुए पन्ने से पंजाब की नौजवानी को वे आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसे छोड़कर भगतसिंह फाँसी पर चढ़े थे। आज पाश पंजाब ही नहीं, भारत के हर उस नौजवान के प्रिय कवि हैं, जो मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट और आक्रोशित है और इसमें बदलाव चाहता है।
हमारे दौर में जिस तरह जीवन के संकट और असुरक्षा के बहाने हमारे भीतर यथास्थिति के तर्क घर करते जाते हैं, पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक’ उसी से टकराती है- ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती/पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती/गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती/….सबसे खतरनाक होता है/मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना/घर से निकलना काम पर/और काम से लौटकर घर आना/सबसे खतरनाक होता है/हमारे सपनों का मर जाना।’ अकारण नहीं है कि हमें एक यंत्र या गुलाम में तब्दील कर देने वाली राजनीतिक पार्टियों और शासकवर्ग को सपनों को इस तरह जगाए रखने की कोशिश खतरनाक लगती है, पाठ्यक्रम में पाश की कविता होना खतरनाक लगता है। एक दूसरी कविता में उन्होंने लिखा है- ‘हम अब खतरा हैं सिर्फ उनके लिये/जिन्हें दुनिया में बस खतरा ही खतरा है’। ‘युद्ध और शांति’, ‘प्रतिबद्धता’, ‘पुलिस के सिपाही से’, ‘जहाँ कविता खत्म होती है’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’, ‘धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘सलाम’, ‘घास’, ‘वफा’, ‘सच’, ‘जिंदगी/मौत’ जैसी उनकी कई कवितायें हैं, जो बार-बार उद्धृत की जाती हैं। वर्ग-संघर्ष को वह जनता की मुक्ति का रास्ता समझते हैं और यह कभी नहीं भूलते कि ‘यहाँ हर जगह पर एक बार्डर है/जहाँ हमारे हक खत्म होते हैं/और प्रतिष्ठित लोगों के शुरू होते हैं।’ और प्रतिष्ठित लोगों यानी शासकवर्ग हमेशा उनके निशाने पर रहता है। इस लिहाज से अपेक्षाकृत कम उद्धृत की जाने वाली कविता ‘द्रोणाचार्य के नाम’ को भी देखा जा सकता है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन की खासियतों को रेखाँकित करते हुए प्रो. नामवर सिंह ने कहा था कि उसने साहित्य का रुख गाँवों की ओर मोड़ा, पाश की कविता और उनके रचनाकार-व्यक्तित्व दोनों पर यह बात लागू होती है। उन्होंने ‘सिआड़’, ‘हेम ज्योति’ ‘हाँक’ और ‘एंटी-47’ का सम्‍पादन करते हुए कई महत्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक लेख लिखे। 1971 में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपने गाँव से ‘सिआड़’ पत्रिका निकाली। 1982-83 में उन्होंने गाँवों में हस्तलिखित पत्रिका ‘हाँक’ को लोगों के बीच वितरित करने काम भी किया। यह लोगों की वैचारिक-राजनीतिक चेतना को उन्नत बनाने की ही कोशिश थी।
पाश वामपंथ के पिछलग्गूपन को कतई पसंद नहीं करते थे। ‘हमारे समयों में’ नामक अपनी बहुचर्चित कविता में उन्होंने लिखा-
यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाउँ
मार्क्‍स का सिंह- जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारों, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था।
मगर इस कुफ्र के बावजूद न वह निराश हुए न उनकी कविता। वह एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद और पृथकतावाद दोनों से लड़ते रहे और खालिस्तानी उग्रवादियों की गोलियों से भगतसिंह की शहादत के दिन ही शहीद हुए।
अगर उन्हीं की कविता पंक्तियों से उन्हें याद किया जाए, तो ‘प्रतिबद्ध’ कविता की ये पंक्तियाँ बिल्कुल वाजिब हैं उनके लिये-
हम झूठमूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
जिंदगी, समाजवाद या कुछ और

Source: http://lekhakmanch.com/

Saturday, March 25, 2017

पाश के पास बीच का कोई रास्ता नहीं था

उन्हें क्रांति का कवि माना गया. उनकी तुलना भगत सिंह और चंद्रशेखर से भी की जाती रही पर वे जिंदगी और इस दुनिया को बेपनाह प्यार करनेवाले कवि थे. अवतार सिंह संधू यानी हम सबके प्यारे कवि ‘पाश’ जिंदगी की धूल, धूप, ऊष्मा और नमी को अपनी सांसों में महसूस करने वाले और मिटटी की गंध से भी किसी प्रेमिका की देह-गंध की तरह बेपनाह इश्क करने वाले कवि थे.
पाश के लिखे में गांव की मिटटी की महक है. उनकी कविताओं में बैल, रोटियां, हुक्का, गुड़, चांदनी रात, बाल्टी में झागवाला फेनिल दूध, खेत खलिहान सब अपने पूरे वजूद में जीते-जागते मिलते हैं. उनका पूरा वजूद जिंदगी के इन्हीं बहुत छोटी-छोटी बिंदुओं से मिलकर बना था. पाश के बारे में एक सबसे खासबात यह भी है कि पंजाबी भाषा का कवि होने के बावजूद पूरी हिंदी पट्टी उन्हें अपना मानती है. अपनी भाषा का कवि. अपवाद के रूप में यदि अमृता प्रीतम की बात न की जाए तो इस भाषा के किसी और कवि को हिंदी में शायद ही इतनी प्रसिद्धि प्राप्त हुई हो.
वे अकेले कवि हैं जिनकी कविताओं में जितना ज्यादा प्यार है, उतना ही आक्रोश भी. यह आक्रोश, क्रांति या फिर वैचारिक प्रतिबद्धता उनका शौक नहीं थी. यह उनके लिए लाचारी और मजबूरी थी
पाश ने खुद भी कहा है - ‘मैं आदमी हूं / बहुत-बहुत छोटा-छोटा कुछ/ जोड़कर बना हूं.’ वे जिंदगीभर इसी छोटे–छोटे बहुत कुछ को बचाने की जिद और इस बहाने इंसान को इंसान बनाए रखने की ललक में लहूलुहान होते रहे. कभी-कभी उनमें कंटीलापन भी दिखा पर हां कड़वाहट कभी नहीं आई. वे अकेले कवि हैं जिनकी कविताओं में जितना ज्यादा प्यार है, उतना ही आक्रोश भी. यह आक्रोश, क्रांति या फिर वैचारिक प्रतिबद्धता उनका शौक नहीं थी. यह उनके लिए लाचारी और मजबूरी थी. दुनिया को जीने लायक बनाने में, उसका सपना देखने की चाह में, चुनी गई मजबूरी - ‘मैं जो सिर्फ आदमी बना रहना चाहता था, यह क्या बना दिया गया हूं.’ इसी तरह ‘अब मैं विदा लेता हूं’ शीर्षक के तहत पाश कहते हैं –‘मुझे जीने की बहुत-बहुत चाह थी / कि मैं गले-गले तक जिंदगी में डूब जाना चाहता था / मेरे हिस्से की जिंदगी भी जी लेना मेरे दोस्त.’
क्रांति ऐसा शब्द है जिसके नीरस और कठोर स्वरूप की कल्पना सबसे पहले आती है लेकिन पाश इस रूप में क्रांतिकारी कवि कतई नहीं थे. वे एक बेहद भावुक और प्रेमी हृदय व्यक्ति थे. एक ऐसे इंसान जिसका पोर-पोर संवेदनशीलता से पगा था लेकिन जिसे जिंदगी ने वैसा रहने नहीं दिया. अपनी इस मजबूरी पर उनके भीतर दुनिया को अथाह प्यार करने वाला, एक साधारण-सी खुशहाल जिंदगी के सपने देखनेवाला बहुत मामूली-सा इन्सान दुखी होता और खीजता भी बहुत था -‘बहुत ही बेस्वाद है / इस बेरंग दुनिया के नक़्शे से निबटना.’
इसे त्रासदी ही कहा जाएगा कि प्रेम और जिंदगी की दूरी पाटने के बीच जिसकी कविता पूरे जीवनभर घूमती रही, उसकी कविताएं आखिरकार उसका दोष बन गईं. विचारधारा उसका सबसे बड़ा अपराध. उनके शब्द क्रांति के किसी भी औजार से कम नहीं थे.
पाश को अपने शब्दों की इस शक्ति पर पूरा यकीन था और उनसे भी ज्यादा यकीन उनके हत्यारों को था. पाश के शब्दों में शायद यह ताकत इसलिए थी कि इन्हें सबसे पहले उन्होंने खुद ही झेला
पाश को अपने शब्दों की इस शक्ति पर पूरा यकीन था और उनसे भी ज्यादा यकीन उनके हत्यारों को था. पाश के शब्दों में शायद यह ताकत इसलिए थी कि इन्हें सबसे पहले उन्होंने खुद ही झेला. उनके तीखे नुकीले नाखूनों को पहले अपने भीतर गहरे धंसने दिया था. फिर बाहर की दुनिया में उन्हें छोड़ा था. इन शब्दों को बाहर अकेला और निहत्था लड़ने के लिए छोड़ने की इस त्रासदी पर उनका कवि हृदय खूब रोया भी था - ‘ सिर्फ अपनी सुविधा के लिए तुमने / शब्दों को तराशना सीख लिया है / तुमने उन्हें इस तरह कभी नहीं देखा / जैसे अंडे में मचल रहे चूजों को / मैंने शब्दों को झेला है / ..अपने रक्त में शरण दी है / मैं गुरु गोबिंद सिंह नहीं / अपनी कविता का कवच पहनाकर / इन्हें भेजने के बाद / बहुत-बहुत रोया हूं’.
यह संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है जिसके अपने खतरे होते हैं. कितने ही लेखकों, कलाकारों के जीवन अनुभवों से हम सब यह जानते हैं. सबसे बड़ा खतरा तो यही होता है वे आत्महत्या कर सकते हैं. उनकी रचनाओं में कोई क्रांति या यथास्थिति में बदलाव की आग देख ले तो उनकी ह्त्या की संभावना बन जाती है. पाश के साथ तो ठीक ऐसा ही हुआ था. उनकी कविताएं हद दर्जे की संवेदनशीलता से निकली थीं. सबको यही लगता था और आज भी लगता है कि उन्होंने बिलकुल वही कहा जो हम सब महसूसते हैं पर किन्हीं अज्ञात भयों से डरकर कहते नहीं या फिर हमें उस तरह कहना नहीं आता. इसी खूबी ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया था और कई अराजक विचारों के लिए खतरा भी.
पाश 15 वर्ष की किशोरवय उम्र से ही कविताएं लिखकर छोटे-छोटे कदमों से प्रसिद्धि की ऊंचाइयों की तरफ बढ़ने लगे थे और 20 साल की उम्र में जब उनका पहला कविता संग्रह ‘लौह कथा’ छपा उससे पहले ही वे क्रांतिकारी कवि के रूप में प्रसिद्धि पा चुके थे. पाश का कविता संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ पंजाबी भाषा की सबसे अधिक बिकने वाली किताब है. (हिंदी में भी इसके कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं) पाश का इस किताब के साथ एक बुरा अनुभव भी रहा. जिस प्रकाशक ने पंजाबी में इसे छापा था, सालभर के भीतर उसने इसकी सारी प्रतियां बेच लीं पर पाश को इस बिक्री से एक पाई भी नहीं दी. पाश इस बात को लेकर बहुत क्षुब्ध रहे. वे खुलकर मानते थे कि वे पंजाबी भाषा के बड़े कवि हैं. लेकिन खुद को स्थापित करने के लिए उन्होंने कभी आलोचकों की खुशामद नहीं की. दुनिया के तमाम इंसानों की आन-बान और उनकी रीढ़ की हड्डी सधी रहे इस बात की चिंता के साथ उतने ही शदीद तरीके से उन्हें अपना स्वाभिमान भी प्यारा था.
पाश का कविता संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ पंजाबी भाषा की सबसे अधिक बिकने वाली किताब है लेकिन इसके बदले में उन्हें एक पाई भी नहीं मिली थी
पाश की जिंदगी का सबसे बड़ा गम था ‘उच्च शिक्षित’ नहीं होने का. हालांकि अपने बेहतर कवि होने को वे अपने विधिवत शिक्षित न होने के बहुत ऊपर रखते थे. उनके पिता फ़ौज में होने के कारण हमेशा घर से बाहर रहे. मां अशिक्षित थीं सो घर में पढ़ाई का कोई सवाल ही नहीं था. बड़े भाई को जब पढ़ाई के लिए बाहर भेजा गया तो वे अराजक लोगों की संगत का शिकार बन गए. लिहाजा पाश को कोई ऐसी टेक नहीं मिली जिसकी मदद से वे उच्च शिक्षा की सीढ़ियां चढ़ पाते. हालांकि अपने दमपर वे इसकी कोशिश करते रहे. इसी कोशिश में इंटर की परीक्षा तो पास कर गए पर बीए कर पाना उनके लिए संभव नहीं हो सका. दिलचस्प बात है कि इसकी एक वजह उनके पढ़ने की लगन ही थी. परीक्षा के बीच में भी उन्हें जो किताब सामने दिख जाती उसे शुरू से लेकर आखिर तक पढ़ने बैठ जाते. पाठ्यक्रम से इतर तमाम विषय पढ़ने की इस ललक ने उन्हें डिग्री तो नहीं दिलवाई लेकिन इसने उनकी संवेदनशीलता और समझ के दायरे को ऐसा विस्तार दिया कि वे अपने दिल की अकूत गहराइयों और उसके जरिए जनमानस की बातों को भी अभिव्यक्त कर सकने में सक्षम हो गए.
पाश अपने निजी जीवन में बहुत बेबाक थे. चाहे इश्क हो या नशा, सब उन्होंने खूब खुलकर किया. अपनी कविताओं में तो वे अपने जीवन से भी अधिक बेबाक रहे. विचारों या जीवन में उन्हें किसी तरह की मिलावट पसंद नहीं थी. घुट-घुटकर, डर-डरकर जीनेवालों में से पाश बिलकुल नहीं थे. उन्हें किसी अंतहीन समय में आनेवाले सुरक्षित दिन के इंतजार में दुबककर जीना भी मंजूर नहीं था. पाश को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए शोषण, दमन और अत्याचारों से मुक्त समतावादी दुनिया चाहिए थी. यही उनका सपना था और इसके लिए लड़ाई मजबूरी. उनके पास कोई बीच का रास्ता नहीं था.
पाश की जिंदगी का सबसे बड़ा गम था ‘उच्च शिक्षित’ नहीं होने का. हालांकि अपने बेहतर कवि होने को वे अपने विधिवत शिक्षित न होने के बहुत ऊपर रखते थे
वे सबको आगाह कर रहे थे - ‘यह वक़्त बहुत अधिक खतरनाक है साथी.’... और यह भी कि - ‘हम सब खतरा हैं उनके लिए / जिन्हें दुनिया में बस ख़तरा-ही-खतरा है.’ और उनका यह डर भी कोई बेबुनियाद डर नहीं था. पहले उन्हें 1969 में झूठे आरोपों में फंसाकर जेल भेजा गया फिर खालिस्तानी आतंकवादियों ने 23 मार्च, 1988 को उनकी हत्या कर दी.
पर इस हत्या से पाश के शब्द नहीं मरे. उनकी कविताएं लोगों के दिल में जीती रहीं. हर गलत वक़्त में उन्हें ताकीद करती रहीं - ‘सबसे खतरनाक होता है / सपनों का मर जाना / न होना दर्द का / सब कुछ सहन कर जाना / सबसे खतरनाक वे आंखें होती हैं / जो सबकुछ देखते हुए भी जमा हुआ बर्फ होती हैं.’
नामवर सिंह ने पाश को श्रद्धांजलि देने के क्रम में उन्हें एक शापित कवि कहा था. पाश शापित कवि थे, किसी शापित यक्ष की ही तरह. जिंदगी से भरे इस कवि को कभी भी अपने मन लायक जीवन या दुनिया नहीं मिली. शायद पाश से शापित वह विचारधारा है जिसने उनकी जान ली. ये विचारधाराएं आज भी हमारे आसपास कभी-कभार प्रभावी होती दिख जाती हैं लेकिन, इनसे लड़ने के लिए अब हमारे पास पाश हैं.
Source: http://satyagrah.scroll.in/article/100240/pash-avtar-singh-sandhu-poet-tribute

Thursday, March 23, 2017

‘गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है, तो हमें उससे खतरा है…’ क्या पाश आज फिर यह कह पाते! | अनुराग अन्वेषी

सड़ांध मारती राजनीति के इस दौर में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की कविताएं दर्दनाशक मरहम की तरह काम करती हैं. उन्हें पढ़ते हुए एक सवाल मन में घुमड़ता है कि गर आज पाश जिंदा होते तो इस व्यवस्था पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती? जेल में बंद उम्मीदवारों की जीत पर, या जहर भरने वालों को मुख्यमंत्री पद पर पहुंचता देखकर या इरोम शर्मिला चानू की शर्मनाक हार पर पाश क्या कहते? क्या उनकी कविताओं का सुर बदल जाता या इस वक्त भी वह अपना रोष जताने के लिए बोल देते कि ‘जा पहले तू इस काबिल होकर आ, अभी तो मेरी हर शिकायत से तेरा कद बहुत छोटा है…’
पाश की कविताएं बार-बार यकीन दिलाती हैं कि वे छद्म व्यक्तित्व वाले शख्स नहीं थे. नतीजतन, उनकी कविता आज और ज्यादा मारक होती. उनके शब्दों में और पैनापन होता, उनकी अभिव्यक्ति और तीखी होती. पाश की पहली कविता 1967 में छपी थी. इसी वक़्त वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और बाद में नागा रेड्डी गुट से भी. पर खुद को हिंसा से हमेशा दूर रखा. पाश की राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज रही हैं. विभिन्न पार्टियों से जुड़कर आमजन के लिए लड़ना उनका धर्म रहा है. पर उनकी मुख्य पहचान किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बनी, बल्कि एक क्रांतिकारी और जुझारू कवि के रूप में बनी. उस वक्त भी पार्टियों के बदलते स्टैंड और वहां पैठी अवसरवादिता पाश को कचोटती थी. यह पाश की खीज ही थी जो हमारे समय में पूरे चरम पर दिखती है : ‘यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था / कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्द ने / बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं / मार्क्स का सिंह जैसा सिर / दिल्ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता / हमें ही देखना था / मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था...’
सुदामा पांडेय धूमिल ने अपनी लंबी कविता ‘पटकथा’ में तार-तार होते भारत की तस्वीर खींची है. उन्होंने बताया है कि इस तार-तार होने में भी हाथ हमारा ही है. क्योंकि अक्सर हमारे विरोध की भाषा चुक जा रही है. हम चुप होते जा रहे हैं. इतना ही नहीं, अपनी चुप्पी को हम अपनी बेबसी के रूप में पेश कर उसे सही और तार्किक बता रहे हैं. कुछ इस तरह : यद्यपि यह सही है कि मैं / कोई ठंडा आदमी नहीं हूं / मुझमें भी आग है / मगर वह / भभक कर बाहर नहीं आती / क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता / एक पूंजीवादी दिमाग है / जो परिवर्तन तो चाहता है / आहिस्ता-आहिस्ता/ कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बनी रहे / कुछ इस तरह कि कांख भी ढंकी रहे / और विरोध में उठे हुए हाथ की / मुट्ठी भी तनी रहे/ और यही वजह है कि बात / फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है / क्योंकि हर बार / चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने / अभियोग की भाषा चुक जाती है…
पर पाश की कविताएं बीच का रास्ता नहीं जानतीं, न बताती हैं. वे तो प्रेरित करती हैं विद्रोह करने के लिए, सच को सच की तरह देखने के लिए, उससे आंखें मूंद कर समझौता करने के लिए नहीं :
‘हाथ अगर हों तो / जोड़ने के लिए ही नहीं होते / न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं / यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं / हाथ अगर हों तो / ‘हीर’ के हाथों से ‘चूरी’पकड़ने के लिए ही नहीं होते / ‘सैदे’ की बारात रोकने के लिए भी होते हैं / ‘कैदो’ की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं / हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते / लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं.’
सोचना चाहता हूं कि आज जब गला फाड़कर ‘भारत माता की जै’ चिल्लाना ही ‘राष्ट्रभक्ति’ का पर्याय बनता जा रहा है, जब लाठी के बल पर राष्ट्रगीत का ‘सम्मान’ स्थापित करवाया जा रहा है, ऐसे समय में पाश की इस कविता को कैसे लिया जाता : ‘मैंने उम्रभर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है / अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है / तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें .../ ... इसका जो भी नाम है - गुंडों की सल्तनत का / मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं / मैं उस पायलट की चालाक आंखों में / चुभता हुआ भारत हूं / हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में / अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है / तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.’
क्या ‘भारत का नागरिक होने पर थूकने’ या ‘गुंडों की सल्तनत’ की अभिव्यक्ति पाश को राष्ट्रद्रोहियों की कतार में खड़ा करवा देती? या यह समझने का धैर्य ‘राष्ट्रभक्तों’ में होता कि यह कविता नवंबर 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के खिलाफ सात्विक क्रोध में भरकर पाश ने रची थी. इस कविता में मारे गये निर्दोष सिखों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ सत्ता की गलत नीतियों के प्रति विद्रोह भी.
या कि पाश की यह कविता पढ़कर पाश के नाम के जयकारे लगाए जाते : ‘भारत / मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द / जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है / बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं...’ या ‘राष्ट्रभक्त’ पाश की इस बात से सहमत होते कि भारत किसी सामंत पुत्र का नहीं. पाश की तरह वे भी मानने लग जाते कि भारत वंचक पुत्रों का देश है. भारत को अपने लिए सम्मान मानने वाले पाश के शब्दों में : ‘इस शब्द के अर्थ / किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं / वरन खेतों में दायर है / जहां अनाज उगता है / जहां सेंध लगती है...’
पाश वाकई खतरनाक कवि थे. इतने खतरनाक कि खालिस्तान समर्थक आतंकवादी उनकी कविताओं से डरते रहे. और आखिरकार जब पाश महज 36 बरस के रहे थे आंतकवादियों ने उनकी उम्र रोक दी, पर वे उनकी आवाज नहीं रोक पाए. तभी तो जहर घुली इस हवा में भी पाश की आवाज गूंजती है. जब विरोध के स्वर को देशद्रोही बताया जा रहा हो, जब समस्याओं को सुलझाने की जगह राष्ट्रभक्ति की आड़ लेकर दबाया जा रहा हो, जब आपकी हर गतिविधि को राष्ट्र सुरक्षा के नाम पर संदिग्ध करार दिया जा रहा हो तो पाश की यह आवाज फिर गूंजने लगती है :
‘यदि देश की सुरक्षा यही होती है / कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये / आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द / अश्लील हो / और मन / बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे / तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है. हम तो देश को समझे थे घर जैसी पवित्र सी चीज/ जिसमें उमस नहीं होती / आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है / गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है/ और आसमान की विशालता को अर्थ देता है / हम तो देश को समझे थे आलिंगन जैसे एक एहसास का नाम / हम तो देश को समझते थे काम जैसा कोई नशा/ हम तो देश को समझते थे कुरबानीसी वफा / लेकिन गर देश / आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है / गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है / तो हमें उससे खतरा है / गर देश का अमन ऐसा होता है / कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह / टूटता रहे अस्तित्व हमारा / और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे / कीमतों की बेशर्म हंसी / कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो / तो हमें अमन से खतरा है / गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा / कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी / कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा/ अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी / तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.’
मुमकिन है कि सुरक्षा के ऐसे खतरों से आगाह करती हुई कविता से फिर कोई अतिवादी डर जाता और गर पाश जिंदा होते तो फिर मार दिए जाते. पर इतना तो तय है कि जितनी बार वे मारे जाते उतनी बार उनकी कविताओं की आवाज ऊंचे सुर में जन-जन तक पहुंचती रहती.
source: https://satyagrah.scroll.in/article/105673/could-pash-have-said-these-lines-today

Wednesday, February 24, 2016

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है | अवतार सिंह संधू 'पाश'


यदि देश की सुरक्षा यही होती है कि
बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये
आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द 
अश्लील हो 
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.
हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे खतरा है
गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे
कीमतों की बेशर्म हंसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से खतरा है
गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.