Saturday, January 24, 2026

एक बेबस 'गुलबाघ': एक मुश्किल रेस्क्यू की कहानी

जनवरी 2025 की एक ठंडी सुबह... हम 'अनुभूति' कार्यक्रम के लिए निकले थे। बच्चों को जंगल के करीब लाना था, उन्हें प्रकृति की खूबसूरती दिखानी थी। लेकिन जंगल की अपनी ही 'अनुभूतियाँ' होती हैं, जो हमें कभी भी किसी भी मोड़ पर चौंका सकती हैं। हम अभी अपनी गाड़ी में थे कि अचानक रोहित ने खबर दी "सर, जंगल में, प्लांटेशन के अंदर, एक तेंदुआ सुस्त अवस्था में पड़ा है!"

यह खबर सुनते ही मेरा दिमाग तेजी से दौड़ने लगा। प्लांटेशन! यानी घने पेड़, कटीली तार की जाली और ऊपर से तेंदुए का सुस्त होना... यह किसी आम रेस्क्यू से कहीं ज्यादा पेचीदा होने वाला था।

हमने तुरंत प्रोटोकॉल का पालन किया। मौकस्थल का मुआयना करने के उपरांत मैंने डीएफओ सर को सूचना दी और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की एक्सपर्ट रेस्क्यू टीम से संपर्क साधा। सर ऑफिशियल काम से स्टेट हेडक्वार्टर में थे। उन्होंने कहा "आप तो कर लोगे।" मैंने हां में जवाब दिया। वो आश्वस्त थे, उन्हें भरोसा था। मैं पहले भी काफी रेस्क्यू कर चुका था। जब तक बांधवगढ़ की टीम पहुँची, हमारी टीम ने इलाके की घेराबंदी कर ली थी और सतत मॉनिटरिंग जारी थी, ताकि कोई भी ग्रामीण या राहगीर गलती से तेंदुए के करीब न जा सके। भीड़ का होना ऐसे वक्त में सबसे बड़ा खतरा होता है।

टीम के आते ही हमने स्थिति का जायजा लिया। तेंदुआ लगभग 3 से 4 साल का था—एक 'सब-एडल्ट'। इस उम्र के जानवर बेहद फुर्तीले और अप्रत्याशित होते हैं, खासकर जब वे घायल या बीमार हों। प्लांटेशन के अंदर घनी झाड़ियां और ऊँचे पौधे थे, जिससे उसे देखना और उस तक पहुँचना दोनों मुश्किल थे।

सबसे पहले उसे ट्रेंकुलाइज करने का फैसला किया गया। डॉक्टर ने निशाना साधा और 'डार्ट' सही जगह लगी। लेकिन यह सिर्फ आधी लड़ाई थी। अब चुनौती थी उस बेहोश तेंदुए को उस घने प्लांटेशन से बाहर निकालना।

प्लांटेशन की मजबूत जाली को तोड़ना पड़ा। हमारे स्टाफ और बांधवगढ़ की टीम के लोग पैदल ही उस घनी झाड़ियों के बीच घुसे। एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा था। तेंदुआ बेहोश था, लेकिन उसका वजन और उस घनी जगह से उसे बाहर लाना, यह एक बड़ी मशक्कत थी। साथियों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। कभी रस्सियों का सहारा, कभी सावधानी से उसे खींचना—करीब आधे घंटे की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार हमने उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

तत्काल उसका प्राथमिक परीक्षण किया गया। वह कमजोर लग रहा था और उसे विशेषज्ञ देखभाल की जरूरत थी। डॉक्टर्स की सलाह के बाद बिना देर किए उसे मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी, सतना भेजने की तैयारी की गई।

जंगल की ड्यूटी हमें सिखाती है कि यहाँ हर दिन एक जैसा नहीं होता। सुबह हम बच्चों को जंगल के बारे में बताने निकले थे, और दोपहर तक हम जंगल के एक अभिन्न सदस्य की जान बचाने की जद्दोजहद में जुटे थे। यही तो है फॉरेस्ट लाइफ—जहाँ हर पल एक नयी चुनौती और एक नयी 'अनुभूति' इंतज़ार करती है।

फोटो: प्लांटेशन के अंदर बीमार तेंदुआ और रेस्क्यू उपरांत हमारी मुस्तैद टीम।

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Thursday, January 22, 2026

नन्ही जान और वो लंबी रात: एक टाइगर शावक का रेस्क्यू

कहते हैं जंगल में कब, क्या और कैसे हो जाए, कोई नहीं जानता। अभी कुछ ही समय हुआ है इस जगह का अतिरिक्त प्रभार लिए, लेकिन यह अनुभव ताउम्र के लिए जेहन में दर्ज हो गया है। 

दिसंबर 2023.. सर्दी की एक रात का वक्त था, गश्त के दौरान अचानक पंकज से खबर मिली कि जंगल के बीचों-बीच एक बाघ का बच्चा अकेला पड़ा है। हम मौके पर पहुंचे तो देखा—हथेली जितना छोटा, आंखें भी पूरी तरह नहीं खुली थीं, बस धीमी सी आवाज़ में अपनी मां को पुकार रहा था। लगभग 8 दिन की उम्र... यानी वह पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर था। आसपास बाघिन के पदचिह्न तो थे, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही थी।

नियम और भावना के बीच की कशमकश शुरू हुई। हमारा पहला मकसद था कि बच्चा अपनी मां से मिल जाए, क्योंकि मां के आंचल से बड़ी कोई सुरक्षा नहीं होती। हमने तय किया कि हम दूर से निगरानी रखेंगे। पूरी रात हम वहीं रहे, सांसें थामे इंतजार करते रहे कि शायद बाघिन वापस आए और उसे ले जाए। अंधेरी रात, जंगल की खामोशियां और वह नन्हा शावक—वक्त जैसे ठहर गया था।

लेकिन सुबह की पहली किरण तक भी कोई हलचल नहीं हुई। बाघिन का न आना खतरे की घंटी थी। शायद वह किसी वजह से उसे छोड़ के (परित्याग कर) चली गई थी (जंगल में अक्सर इस होता है)। अब उस बच्चे को वहां छोड़ना उसे मौत के मुंह में धकेलने जैसा था।

सुबह होते ही हमने वरिष्ठों के निर्देश पर प्रोटोकॉल के तहत उसका मेडिकल परीक्षण (Health Checkup) करवाया। वह बहुत कमजोर था और उसे तत्काल देखभाल की जरूरत थी। अंततः भारी मन से, लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए, निर्णय लिया गया कि उसे मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी, सतना भेजा जाए।

सफर के दौरान जब वह नन्हा बच्चा हमारी टीम की तरफ देख रहा था, तो लगा जैसे वह पूछ रहा हो कि "मेरी मां कहां है?" लेकिन एक फॉरेस्ट ऑफिसर के तौर पर कभी-कभी हमें 'पिता' बनकर कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। उसे मुकुंदपुर में सुरक्षित छोड़ दिया गया।

वो 8 दिन का नन्हा मेहमान आज भी याद आता है, टाइगर स्टेट की उम्मीद की एक किरण सा...

फोटो: नन्हा बाघ का बच्चा परीक्षण के दौरान।



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Thursday, January 15, 2026

Papa's Letters to Shaurya 16.

 प्रिय शौर्य,


आज मैं तुम्हें वह पत्र लिख रहा हूँ जो शायद तुम्हारी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण 'क्लास' होगी। तुम्हारी मम्मा चाहती हैं कि मैं तुम्हें ये पत्र जरूर लिखूं जिससे तुम आज के परिवेश में धर्म, धार्मिक चेतना और Wisdom के सही मायने समझ सको। इसलिए यह पत्र किसी स्कूल के सिलेबस या किसी लीडर के बारे में नहीं, बल्कि 'चेतना के सिलेबस' के बारे में है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ जानकारी का सैलाब है, लेकिन विवेक (Wisdom) का अकाल। चारों तरफ शोर है—धार्मिक मान्यताओं का, राजनीतिक विचारधाराओं का और सामाजिक परंपराओं का। ऐसे में एक 'प्रबुद्ध मानव' कैसे बना जाए, यही आज हम डिसकस करेंगे।

इस सामाजिक रूप से कठिन दौर में मैंने पिछले पत्रों के जैसे ही, इस पत्र को लिखने के पहले आधुनिक विचारों और धार्मिक ग्रंथों के प्रति समालोचनात्मक दृष्टिकोण (Critical Thinking) पर कुछ गहरे लेख पढ़े हैं, बहुत से स्पिरिचुअल लीडर्स (जैसे ओशो, दाजी, बुद्ध की बायोग्राफी, जैन फिलासफी का क्रिकिकल एनालिसिस इत्यादि) की किताबें पढ़ी हैं, उन्हीं के आलोक में मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ कि एक 'स्वच्छ और स्वतंत्र सोच' का निर्माण कैसे होता है।

1. मान्यताओं का परीक्षण: प्रश्न ही सत्य की पहली सीढ़ी है -
बेटे, सबसे पहले यह समझो कि 'मान्यता' (Belief) और 'सत्य' (Truth) में क्या अंतर है। मान्यता वह पुरातन सोच है जो तुम्हें थमा दी गई है, और सत्य वह है जिसे तुम अपनी तर्कशक्ति से खोजते हो। राजा राम मोहन राय को 'भारतीय पुनर्जागरण का जनक' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने उस समय के सती प्रथा और मूर्तिपूजा जैसे कट्टर रिवाजों को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि वे 'परंपरा' थे। उन्होंने सोचा, तर्क (Reason) दिया और फिर सती प्रथा जैसी कुरीति को हटाने के लिए भरकस प्रयास किए।

तुम्हें भी यही करना है। यदि कोई धार्मिक ग्रंथ या सामाजिक परंपरा तुमसे कुछ करने को कहती है, तो पहले यह पूछो—"क्या यह मानवता के पक्ष में है? क्या यह न्यायपूर्ण है?" हमें पवित्र ग्रंथों या धार्मिक विश्वासों के प्रति विश्लेषणात्मक रूप से आलोचनात्मक (Critical) होना बहुत जरूरी है। आलोचना का मतलब अपमान करना नहीं, बल्कि उसका विश्लेषण करना है ताकि तुम अंधविश्वास की बेड़ियों से आजाद हो सको।

2. मानसिक गुलामी से मुक्ति -
एक प्रबुद्ध मानव की सबसे बड़ी निशानी यह है कि वह किसी 'भीड़' का हिस्सा नहीं बनता। आज के दौर में सोशल मीडिया और 'इको चैम्बर्स' तुम्हें वही दिखाते हैं जो तुम पहले से मानते हो। यह तुम्हें एक ऐसी 'मानसिक जेल' में डाल देता है जहाँ तुम दूसरी तरफ की बात सुनना ही बंद कर देते हो।

सच्ची आधुनिकता वह नहीं है जो तुम पहनते हो, बल्कि वह है कि तुम कैसे सोचते हो। राम मोहन राय से लेकर गांधी तक के लिए आधुनिकता का मतलब था—स्वतंत्रता, समानता और तर्कशीलता। तुम्हें अपनी सोच को इतना लचीला बनाना होगा कि यदि कल तुम्हें कोई नया तथ्य (Fact) मिले जो तुम्हारी पुरानी मान्यता को गलत साबित करता हो, तो तुम उसे स्वीकार करने का साहस दिखा सको।

3. 'डॉग्मा' (Dogma) और 'डिस्कशन' (Discussion) के बीच का अंतर -
अक्सर धर्म और परंपराएं 'डॉग्मा' पर टिकी होती हैं—यानी ऐसी बातें जिन्हें बिना सवाल किए मान लेना अनिवार्य है। लेकिन एक वैज्ञानिक सोच और एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व 'डिस्कशन' और 'डायलॉग' पर टिका होता है।
- डॉग्मा कहता है: "यही सही है क्योंकि ऐसा लिखा है।"
- प्रबुद्ध सोच कहती है: "चलो इसे परखते हैं, देखते हैं कि यह आज के समय में कितनी प्रासंगिक है।"

तुम्हें उन 'पवित्र बेड़ियों' से बचना होगा जो तुम्हें संकीर्ण बनाती हैं। धर्म या ईश्वर की तुम्हारी व्यक्तिगत धारणा तुम्हें करुणा और प्रेम से भरनी चाहिए, न कि नफरत या श्रेष्ठता के अहंकार से।

4. विवेक: एक प्रबुद्ध मानव की ताकत -
विवेक का अर्थ है—सही और गलत के बीच फर्क करने की क्षमता। जब तुम अपनी मान्यताओं और धारणाओं से परे जाकर देखते हो, तब तुम्हें इंसानियत का वह चेहरा दिखता है जो किसी धर्म या जाति से नहीं बंधा है।

सारे विश्लेषणों और आधुनिक दार्शनिकों के विचारों का सार यही है कि एक 'प्रबुद्ध मानव' वह है जो:
i. तर्क को सर्वोपरि रखता है: वह भावनाओं के बहाव में आकर गलत फैसले नहीं लेता।
ii. समानता का पक्षधर है: वह किसी भी ग्रंथ या परंपरा को स्वीकार नहीं करता जो स्त्री और पुरुष, या ऊंच-नीच के बीच भेदभाव करती हो।
iii. निरंतर विद्यार्थी रहता है: वह कभी यह दावा नहीं करता कि उसके पास 'अंतिम सत्य' है।

धारणाओं के जाल से कैसे निकलें?

मेरे बेटे, धारणाएं बहुत ताकतवर होती हैं। वे हमारे दिमाग में ऐसे घर बना लेती हैं कि हम उनके बाहर की दुनिया देख ही नहीं पाते। इनसे उबरने के लिए मैं तुम्हें तीन 'मंत्र' देता हूँ:
1. आलोचनात्मक चिंतन (Critical Inquiry): हर उस चीज़ पर सवाल उठाओ जो तुम्हें 'नफरत' करना सिखाती है। यदि तुम्हारी मान्यता तुम्हें किसी दूसरे इंसान से दूर कर रही है, तो समझो वह मान्यता गलत है।
2. विविधता का अध्ययन (Explore Diversity): केवल अपने धर्म या अपनी विचारधारा की किताबें मत पढ़ो। दुनिया के महान विचारकों, वैज्ञानिकों और अन्य संस्कृतियों को भी जानो। जितना अधिक तुम जानोगे, उतनी ही तुम्हारी संकीर्णता खत्म होगी।
3. करुणा आधारित तर्क (Compassionate Reason): तर्क शुष्क नहीं होना चाहिए, उसमें करुणा होनी चाहिए। राजा राम मोहन राय ने जब तर्क दिया, तो उसके पीछे सती हो रही महिलाओं के प्रति गहरी करुणा थी। तर्क जब करुणा से मिलता है, तभी वह 'बुद्धत्व' बनता है।

बेटा, इस लंबे पत्र का सार यह है कि तुम्हारी पहचान तुम्हारे नाम, तुम्हारे धर्म या तुम्हारी जाति से नहीं होनी चाहिए। तुम्हारी असली पहचान तुम्हारी 'स्वतंत्र चेतना' होनी चाहिए।

एक प्रबुद्ध मानव वह है जो अपनी बुद्धि का दीया खुद जलाता है (अप्प दीपो भव)। वह किसी ग्रंथ का गुलाम नहीं, बल्कि सत्य का खोजी होता है। वह परंपराओं का आदर करता है, लेकिन उन परंपराओं को ढोता नहीं है जो सड़ चुकी हैं और समाज में बदबू फैला रही हैं।

मैं चाहता हूँ कि तुम एक ऐसे इंसान बनो जो निर्भय होकर सोच सके, जो अपनी गलतियों पर हंस सके और जो हर उस दीवार को गिरा सके जो इंसान को इंसान से अलग करती है। यही वह 'स्वच्छ सोच' है जो तुम्हें भीड़ से अलग करेगी और तुम्हें एक प्रबुद्ध मानव बनाएगी।

पिछले पत्रों में मैंने संविधान की प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों का जिक्र किया है। अगले पत्रों में मैं एक अच्छा इंसान और नागरिक बनने में उनके महत्व को बतलाना चाहूंगा।

फिलहाल मैं चाहूंगा कि तुम सदा अपनी तर्कशक्ति और हृदय की आवाज़ को जीवित रखना। ढेर सारा प्यार।

तुम्हारे पापा.

#शौर्य_गाथा #Shaurya_Gatha 180.

Papa's Letters to Shaurya 16.

Sunday, January 4, 2026

Papa's Letters to Shaurya #ThirteenthLetter

 डियर शौर्य,

पिछले पत्र के बाद मुझे लगा कि न सिर्फ प्री स्कूल शिक्षा के बारे में बल्कि मुझे उसके भी आगे तुम्हें असली शिक्षा के मायनों से भी अच्छे से अवगत कराना चाहिए। इसलिए भी कि आजकल बच्चों की स्कूली शिक्षा को बहुत गंभीरता से प्राप्त मार्क्स या ग्रेड से जोड़कर देखा जाता है।

असल में, तुम जिस दौर में अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे हो, वह भारतीय इतिहास और वैश्विक बदलाव का एक अत्यंत जटिल कालखंड है। अक्सर मुझे लगता है कि कोई तुम्हें केवल 'पढ़ने' के लिए कह कर अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता। हमें तुम्हें उस 'तंत्र' की हकीकत भी बतानी होगी जिसमें तुम दिन के आठ घंटे बिताने वाले हो।

यह पत्र मैं केवल एक पिता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में लिख रहा हूँ जिसने पिछले कुछ दिनों में भारत की शिक्षा प्रणाली के गहरे विश्लेषणों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और महान शिक्षाविदों के विचारों का अध्ययन किया है। यह पत्र थोड़ा लंबा होगा, शायद किसी किताब के अध्याय जितना, लेकिन इसमें वह सार है जो तुम्हें स्कूल की चहारदीवारी के बाहर एक सफल और सार्थक जीवन जीने में मदद करेगा।

1. औपनिवेशिक विरासत और '3 Cs' का जाल: 

सबसे पहले तुम्हें यह समझना होगा कि हमारा वर्तमान स्कूल सिस्टम कहाँ से आया है। 'द हिंदू' के एक प्रसिद्ध लेख में भारतीय शिक्षा को डराने वाले '3 Cs' का जिक्र है: Colonial (औपनिवेशिक), Conformist (लीक पर चलना), और Competitive (प्रतिस्पर्धात्मक)।

हमारी शिक्षा का ढांचा आज भी काफी हद तक अंग्रेजों द्वारा बनाया गया है। उनका उद्देश्य वैज्ञानिक या दार्शनिक पैदा करना नहीं था, बल्कि ऐसे 'क्लर्क' पैदा करना था जो उनके प्रशासन को चला सकें। इसे ही 'रॉकफेलर मॉडल' भी कहा जाता है। जॉन डी. रॉकफेलर ने जब अमेरिका में शिक्षा के लिए फंड दिया, तो उनका स्पष्ट मानना था कि उन्हें 'विचारक' नहीं, बल्कि 'आज्ञाकारी कर्मचारी' चाहिए।

आज भी हमारे स्कूल अनजाने में यही कर रहे हैं। तुम्हें एक कतार में खड़ा करना, घंटी बजते ही विषय बदलना, और बिना सवाल किए टीचर की बात मानना—यह सब तुम्हें एक फैक्ट्री वर्कर बनाने की ट्रेनिंग जैसा है। मेरा पहला सबक यही है: अनुशासन जरूरी है, लेकिन वह तुम्हारी स्वतंत्र सोच की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

2. 'मेरिट' का छलावा और सामाजिक असमानता:

तुम्हें अक्सर सिखाया जाता है कि जो कक्षा में प्रथम आता है, वही सबसे योग्य (Merit) है। लेकिन बेटा, हालिया विश्लेषण बताते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली हाशिए पर मौजूद समुदायों और गरीब बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पाती। 'मेरिट' की हमारी परिभाषा दोषपूर्ण है।

एक बच्चा जिसके पास इंटरनेट, अच्छी कोचिंग और शिक्षित माता-पिता हैं, और दूसरा बच्चा जिसके पास ये कुछ भी नहीं है—दोनों को एक ही परीक्षा से मापना अन्याय है। मैं तुम्हें यह इसलिए बता रहा हूँ ताकि तुम कभी अपने ग्रेड्स पर अहंकार न करो और न ही किसी कम नंबर वाले साथी को कमतर समझो (या कभी इसका उल्टा ही।) असली 'मेरिट' केवल परीक्षा के अंक नहीं हैं, बल्कि वह संघर्ष और लगन है जो एक व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में दिखाता है।

3. रटने की संस्कृति बनाम बुनियादी शिक्षा:

महात्मा गांधी ने जिस 'बुनियादी शिक्षा' (नई तालीम) की कल्पना की थी, वह आज के रटने वाले सिस्टम (Rote Learning) के बिल्कुल विपरीत थी। गांधीजी का मानना था कि शिक्षा 3Hs: Hand (हाथ), Heart (हृदय), और Head (मस्तिष्क) का समन्वय होनी चाहिए।

आज की शिक्षा केवल 'मस्तिष्क' पर बोझ डालती है। तुम भूगोल पढ़ते हो, लेकिन तुम्हें मिट्टी की महक और उसकी बनावट का अंदाजा नहीं होता। तुम गणित पढ़ते हो, लेकिन तुम उसे बाजार या बढ़ईगिरी (Carpentry) में तक इस्तेमाल नहीं कर पाते। शिक्षाविद् डॉ. कृष्ण कुमार कहते हैं कि जब तक हम 'हाथ के काम' को 'दिमाग के काम' से छोटा समझेंगे, हमारा समाज प्रगति नहीं कर पाएगा।

मेरा तुमसे आग्रह है: अपने हाथों को गंदा करने से मत डरना। चाहे वह घर की मरम्मत हो, बगीचे की देखभाल हो या कोई नया यंत्र बनाना—असली ज्ञान काम करने (Learning by Doing) से आता है, केवल पन्ने पलटने से नहीं।

4. नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और बदलता परिदृश्य:

अच्छी बात यह है कि अब भारत अपनी गलतियों को पहचान रहा है। NEP 2020 ने 10+2 के पुराने ढांचे को बदलकर 5+3+3+4 का जो नया ढांचा बनाया है, वह प्री-प्राइमरी शिक्षा पर बहुत जोर देता है। सरकार अब मानती है कि बच्चे के दिमाग का 85% विकास 6 साल की उम्र तक हो जाता है।

अब 'बालवाटिका' और खेल-आधारित शिक्षा (Play-based learning) की बात हो रही है। यह व्यवस्था रटने के बजाय 'क्रिटिकल थिंकिंग' (तार्किक सोच) को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। लेकिन नीति कागजों पर अच्छी होती है, उसे हकीकत में बदलने की जिम्मेदारी तुम जैसे छात्रों और हम जैसे अभिभावकों की है। तुम इस नए युग के पथप्रदर्शक बनो, जहाँ भाषा बाधा नहीं बल्कि एक सेतु हो। अपनी मातृभाषा में सोचना और सीखना तुम्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखेगा।

5. डिजिटल युग की चुनौतियाँ और अवसर:

2024-25 के विश्लेषण बताते हैं कि 'डिजिटल डिवाइड' एक बड़ी समस्या है। जहाँ एक तरफ AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और एडटेक कंपनियां शिक्षा को आसान बना रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मानवीय संवेदनाएं कम हो रही हैं।

स्क्रीन के सामने घंटों बिताना तुम्हें सूचनाएं तो दे सकता है, लेकिन 'संस्कार' और 'अनुभव' नहीं। इंटरनेट का उपयोग अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए करो, न कि केवल मनोरंजन के लिए। एल्गोरिदम को तुम्हें नियंत्रित मत करने दो, बल्कि तुम तकनीक के मालिक बनो।

6. जीवन के असली सबक जो स्कूल नहीं सिखाएगा: 

बेटे, इस लंबे पत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है। स्कूल तुम्हें साक्षर बना सकता है, लेकिन शिक्षित तुम्हें खुद बनना होगा।

 i. असफलता का उत्सव मनाओ: हमारा सिस्टम फेल होने को पाप मानता है। जबकि विज्ञान और नवाचार की बुनियाद ही असफलताओं पर टिकी है। एडिसन हजार बार फेल हुए थे। फेल होना यह बताता है कि तुम कुछ नया करने की कोशिश कर रहे हो।

 ii. संवाद और सहानुभूति (Empathy): आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा तुम्हें अपने सहपाठियों को 'प्रतिद्वंद्वी' (Rival) मानना सिखाती है। लेकिन याद रखना, दुनिया को जीतने वाले नहीं, दुनिया को समझने वाले लोग बदलते हैं। दूसरों के दुख को समझना ही सबसे बड़ी शिक्षा है।

 iii. आत्मनिर्भरता (Self-reliance): स्कूल तुम्हें नौकरी ढूंढने वाला (Job seeker) बनाना चाहता है। मैं चाहता हूँ कि तुम एक निर्माता (Creator) बनो। तुम्हारे पास कोई ऐसा हुनर होना चाहिए जिससे तुम खुद का और दूसरों का पेट भर सको।

 iv. पर्यावरण और जड़ें: हम एक ऐसी दुनिया में हैं जहाँ जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है। तुम्हारी शिक्षा अधूरी है अगर तुम अपने आसपास के पेड़-पौधों, पक्षियों और जल स्रोतों की रक्षा करना नहीं जानते।

7. निष्कर्ष: तुम क्या बनोगे?

अंत में, मैं तुम्हें जॉन डी. रॉकफेलर के उस स्कूल सिस्टम की याद दिलाना चाहता हूँ जिसने 'आज्ञाकारी मजदूरों' की फौज खड़ी की। मैं नहीं चाहता कि तुम उस फौज का हिस्सा बनो। मैं चाहता हूँ कि तुम वह 'विद्रोही' बनो जो सवाल करता है, वह 'कलाकार' बनो जो सपने देखता है, और वह 'इंसान' बनो जो हर किसी के साथ प्रेम और गरिमा से पेश आता है।

शिक्षा का असली उद्देश्य डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि खुद के भीतर छिपे हुए 'सर्वश्रेष्ठ' को बाहर लाना है। यदि तुम कक्षा में पीछे भी बैठते हो, लेकिन तुम्हारे मन में दुनिया को बेहतर बनाने का कोई विचार है, तो तुम टॉपर से कहीं आगे हो।

मेरा सहयोग हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा। जब भी तुम्हें लगे कि किताबों का बोझ बढ़ रहा है, तो बाहर निकलकर खुली हवा में सांस लेना और याद रखना कि जिंदगी स्कूल से बहुत बड़ी है और तुम्हारे मम्मा पापा हमेशा तुम्हारे साथ हैं। प्यार।

तुम्हारे पापा.


#शौर्य_गाथा #Shaurya_Gatha 175.

Papa's Letters to Shaurya 13.

Thursday, January 1, 2026

Papa's Letters to Shaurya #TwelfthLetter

 डियर शौर्य,

मैं और तुम्हारी मम्मा अक्सर इस बात पर डिसकस करते रहते हैं कि तुम्हें स्कूल होमवर्क करना चाहिए या नहीं। मैं होमवर्क कराने के बिल्कुल ख़िलाफ़ रहता हूं और इसके अपने कारण हैं। मम्मा को लगता है कि तुम होम वर्क करना एंजॉय करते हो। इसलिए वो अपनी जगह भी सही हैं। तुम LKG में हो और होकवर्क कर रह हो! शायद यह एक छोटी जगह पर रहने और स्कूलिंग का drawback है, लेकिन इसने मुझे प्री स्कूलिंग पर बहुत से आर्टिकल्स पढ़ने पर मजबूर कर दिया और ये पत्र लिखने पर भी।

अक्सर लोग सोचते हैं कि प्री-प्राइमरी स्कूलिंग का मतलब सिर्फ अक्षर पहचानना या गिनती सीखना है, लेकिन हाल ही में मैंने शिक्षा पर कुछ गंभीर लेख (जैसे द हिंदू के आर्टिकल) और नई शिक्षा नीति के बारे में पढ़ा। उनसे मुझे अहसास हुआ कि तुम्हारी इस शुरुआती शिक्षा के उद्देश्य उन किताबों से कहीं बड़े हैं जो तुम अपने बैग में लेकर जाते हो।

मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी इस शुरुआती पढ़ाई के असली उद्देश्यों को समझो:

1. जिज्ञासा को जीवित रखना (Fueling Curiosity) : 

तुम्हारी इस शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य तुम्हें जवाब रटाना नहीं, बल्कि सवाल पूछना सिखाना है। दुनिया 'P for Policy' से नहीं, बल्कि 'P for Potential' (क्षमता) से चलती है। मैं चाहता हूँ कि तुम हमेशा यह पूछते रहो कि 'क्यों?' और 'कैसे?'। तुम्हारी जिज्ञासा ही तुम्हारी सबसे बड़ी टीचर है।

2. खेल-खेल में जीवन सीखना (Learning through Play) : 

बचपन के इन सालों का मकसद तुम्हें क्लास में चुपचाप बैठाना नहीं है। असली शिक्षा वह है जो तुम्हें मिट्टी में खेलने, चित्र बनाने और कहानियों के जरिए दुनिया को समझने का मौका दे। नई शिक्षा नीति भी यही कहती है कि इस उम्र में 'खेल ही पढ़ाई है'। खेल तुम्हें टीम वर्क, हार को स्वीकार करना और फिर से कोशिश करना सिखाते हैं।

3. रटने की संस्कृति (3Cs) से दूरी : 

हमारे समाज में शिक्षा अक्सर 3Cs (Colonial, Conformist, Competitive) यानी दूसरों की नकल करने और सिर्फ जीत की दौड़ में शामिल होने तक सीमित रह गई है। मैं चाहता हूँ कि तुम इस दौड़ का हिस्सा न बनो। तुम्हारी शिक्षा का उद्देश्य खुद को दूसरों से बेहतर साबित करना नहीं, बल्कि कल के खुद से बेहतर बनना होना चाहिए।

4. जुड़ाव और संवेदना (Connection and Empathy) : 

स्कूल जाने का एक बड़ा मकसद यह भी है कि तुम अलग-अलग पृष्ठभूमि के बच्चों से मिलो, उनके साथ अपना टिफिन साझा करो और दूसरों की भावनाओं को समझना सीखो। एक अच्छा इंसान बनना किसी भी डिग्री से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

5. नैसर्गिक प्रतिभा का उत्थान (Nurturing Natural Talent) :

साथ ही, नई शिक्षा नीति के अनुसार प्री स्कूलिंग का उद्देश्य रटने की प्रवृत्ति से तुम्हें बचाकर, होमवर्क, बस्ते का बोझ और एग्जाम के दवाब से तुम्हें मुक्त रखते हुए तुममें fundamentional literary और numeracy को विकसित करना है, इस तरीके से कि तुम्हारी नैसर्गिक प्रतिभा का हनन न हो (बल्कि उसका उत्थान हो) और आवश्यक ज्ञान का विकास भी तुम्हारे अंदर हो।

अंत में एक पिता के रूप में यह कहना चाहूंगा कि याद रखना कि स्कूल सिर्फ एक जरिया है, मंजिल नहीं। मैं चाहता हूँ कि तुम एक ऐसा इंसान बनो जो स्वतंत्र रूप से सोच सके, जो असफल होने से न डरे और जिसके पास एक दयालु दिल हो।

तुम जैसा भी करोगे, मुझे तुम पर हमेशा गर्व रहेगा।

तुम्हारे पापा


[P. S.   न्यू एजुकेशन पॉलिसी NEP 2020 को बनाने वालों में कई बेहतरीन व्यक्ति शामिल थे। जिनमें से कुछ हैं -

डॉ. के. कस्तूरीरंगन (अध्यक्ष): इसरो (ISRO) के पूर्व प्रमुख।

प्रो. वसुधा कामत: पूर्व कुलपति, SNDT महिला विश्वविद्यालय, मुंबई।

प्रो. मंजुल भार्गवा: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (USA) में गणित के प्रोफेसर और 'फील्ड्स मेडल' विजेता।

डॉ. राम शंकर कुरील: बाबासाहेब अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति।

प्रो. टी. वी. कट्टीमनी: पूर्व कुलपति, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक। 

इनके अलावा भी शिक्षा पर काम करने वाले कई और लोग भी शामिल थे।


इसके अनुसार प्री स्कूलिंग में- 

खेल-आधारित शिक्षा (Play-based Learning)

प्री-प्राइमरी स्तर पर कोई भारी-भरकम किताबें या परीक्षाएं नहीं होंगी। शिक्षा का आधार 'अक्षर ज्ञान' के बजाय निम्नलिखित होगा:

1. खेलकूद और गतिविधियों पर आधारित शिक्षा।

पहेलियां, कला, शिल्प और संगीत के माध्यम से सीखना।

तार्किक सोच और समस्या समाधान (Problem solving) की शुरुआती समझ विकसित करना।

2. मातृभाषा का महत्व

नीति में इस बात पर जोर दिया गया है कि जहाँ तक संभव हो, शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा, मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा ही होनी चाहिए। बच्चों के लिए अपनी भाषा में नई अवधारणाओं को समझना आसान होता है।

ये महत्वपूर्ण बिंदु हैं। स्वाभाविक है NEP 2020 होमवर्क, रटने रटाने, परीक्षा को अमान्य करती है।]