Saturday, October 7, 2023

शौर्य गाथा 81

 भाईसाहब ने सारे कपडे बेड पर फैला दिए हैं. मम्मा परेशान हो गई है. वे लेकिन समझ नहीं रहे हैं. पापा के आते ही उनसे शिकायत करती हैं: 'ये आजकल कुछ भी ऊधम कर रहे हैं और मम्मा की बात भी नहीं सुन रहे हैं.'

पापा भाईसाहब को गोद में लेते हैं. सोफे पर बैठते हैं और उनको समझाना शुरू करते हैं. 'बेटा, अच्छे बच्चे मम्मा का काम नहीं बढ़ाते हैं, उनकी मदद करते हैं. कपडे फैलाना नहीं है, जमाना होता है...'

यकायक से अपनी गर्दन मटकाकर भाईसाहब बोलते हैं 'बिलटुल (बिल्कुल)... बिलटुल पापा.'

अब पापा समझाने के लिए आगे कुछ बोल रहे हैं और भाईसाहब सिर हाँ में मटकाते हुए, पापा का चेहरा हाथों में लेकर 'बिलटुल... पापा बिलटुल...' बोल रहे हैं.

'बेटा ऐसे बच्चे... बिलटुल पापा...बिलटुल... अच्छे बच्चे... बिलटुल पापा... नहीं होते... होते हैं पापा, बुलटुल...'

यह दृश्य देख मम्मा की हंसी छूट जाती है. पापा भी हंसने लगते है. 

उफ़! इस ढाई साल के बच्चे को कैसे समझाया जाए.


Friday, October 6, 2023

शौर्य गाथा 80

 भाईसाहब अपने ननिहाल गए हैं. उनकी यशी दीदी उन्हें बहुत प्यार करती है. वो अभी मात्र साढ़े चार साल की है लेकिन समझदारी और बातों में दादी हो चुकी है. दीदी और ढाई साल के भाईसाहब दोनों दिनभर खेलते रहते हैं.

भाईसाहब ने खेल खेल में दीदी को मार दिया है. वो रोने लगी है. भाईसाहब को मम्मा की डांट पड़ती है, लेकिन उनपर कोई असर नहीं है.

दीदी को रोता देख उसके दादू कहते हैं: 'यशी आप भी शौर्य को डांट दो.'

भोली सी दीदी जवाब देती है: 'दादू, बेचारा बच्चा है, अभी अक्ल नहीं है. रहने देते हैं. अकल आ जाएगी तो नहीं करेगा ऐसा.' साढ़े चार साल की यशी की बात सुनकर सबको हंसी आ जाती है. 

इतनी सी यशो और इतना बड़ा दिल! दादू अब उसे गोद में ले प्यार कर रहे हैं. भाईसाहब को देखकर शायद जलन हो रही है. वो भी दौड़ आकर पहुँच गए हैं. 'नानू..नानू ... मुझे भी.... दोदी (गोदी)... दोदी.'

Wednesday, September 27, 2023

Papa's Letters to Shaurya #SixthLetter


मैं अपने एक मित्र से पूछता हूं "क्या बड़ा होकर शौर्य इन पत्रों को पढ़ेगा? पढेगा तो क्या रिएक्ट करेगा?"


"अरे! वह बड़ा खुश होगा। तुमने बहुत सारी अच्छी बातें उसे समझाने की कोशिश की है।"

मैं मुस्कुराता हूं। उन्हें कितनी भारी पड़ी है ज्ञान से, ढेर सारी किताबों से, शक्यमुनि से लेकर मंडेला तक के उदाहरण से। नोबेल शांति पुरस्कार सम्मानित हर व्यक्ति एक नया उदाहरण रख देता है। फिर भी क्या बदल गए लोग?
अहिंसा! अहिंसा! अहिंसा! समझाते समझाते 1915 से 1947 तक गांधी बत्तीस साल निकल देते हैं और अंत में हिंसा के शिकार होते हैं!

सोचते सोचते मैं अखबार पढ़ने लगता हूं और अखबार में नकारात्मक खबरें पढ़ते-पढ़ते मुझे लगने लगा है कि मनुष्य हिंसा के लिए ही बना है, हिंसा उसका मूल स्वभाव है! जो सीख वो तो महज किताबी ज्ञान है।

लेकिन मेरे कहे को खारिज करने जेहन में कई हजार उदाहरण खड़े हो जाते हैं! मानवता के उदाहरण, उम्मीद के उदाहरण... महज मंडेला ही प्रताड़ित करने वालों को माफ करते दिखते हैं और मानवता की उम्मीद में आंखों में आंसू ले आते हैं।

महज बुद्ध, महावीर ही खड़े होकर 2600 साल पहले Indian Plains (गंगा का मैदानी क्षेत्र) की तस्वीर बदल देते हैं। गांधी सही कहते थे हिंसा कायर है, अहिंसा के लिए मुझे एक व्यक्ति काफी है। लौ की तरह!

सती प्रथा खत्म करते राजा राममोहन राय है, लॉर्ड बेंटिक, दास प्रथा खत्म करते अब्राहम लिंकन, बराबरी का हक दिलाती संविधान सभा, छुआछूत मिटाते अंबेडकर, रंगभेद से लड़ते मार्टिन लूथर किंग जूनियर किसी लौ की तरह दिखते हैं।

पी. साईंनाथ को सुन रहा हूं। वह कहते हैं "I get very offended when people make list of freedom fighters and do not include Baba Saheb Ambedkar. As a freedom fighter he launched the greatest battle on the face of the Earth for human dignity (fight against untouchability). That's freedom (struggle). Justice for all, social, political, economic. That's freedom (struggle). Directive principles of State policy talk about education, nutrition to children. That's freedom (struggle)." [मुझे बहुत दुख होता है जब लोग स्वतंत्रता सेनानियों की सूची बनाते हैं और उसमें बाबा साहब अंबेडकर को शामिल नहीं करते। एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने मानवीय गरिमा (छुआछूत के खिलाफ लड़ाई) के लिए पृथ्वी पर सबसे बड़ी लड़ाई शुरू की। यही आज़ादी (के लिए संघर्ष) है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सभी के लिए न्याय। यही आज़ादी (के लिए संघर्ष) है. राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत बच्चों को शिक्षा, पोषण की बात करते हैं। यही (आज़ादी के लिए संघर्ष) है।]

बाबा अंबेडकर के सारे संघर्ष अहिंसक थे। नीतिगत, कानूनी और नैतिक... और साथ ही 2000 साल के भारतीय इतिहास में में सबसे असरदार और प्रभावी भी!

मानव सभ्यता में वे आंदोलन ही तो महान है जो Human Dignity (मानवीय गरिमा) और Equality (समानता) के लिए लड़े गए हों। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भी, क्योंकि वह एक सामाजिक सुधार आंदोलन भी था।

हजारों उदाहरणों को पढ़ने के बाद तुम भी इस नतीजे पर पहुंचोगे की मनुष्य प्रेम और समरूपता के लिए बना है। प्रेम और महज प्रेम! अहिंसा का मौलिक भाव प्रेम है। मैं भी इसी नए नतीजे पर पहुंचा हूं। बस हिंसा के उदाहरण हमेशा हमें ज्यादा दिखलाए जाते हैं, अखबारों में ज्यादा आते हैं।

यह 2023 है भारतीय पत्रिका के प्रथम पुरुष राजा राममोहन राय ने 200 वर्ष पहले 1822 में मिलात-उल-अखबार निकाल भारतीय पत्रिका को सही अर्थों में प्रारंभ किया था। किसी अन्य पत्र में उनके बारे में भी...

तुम्हारे पापा

Tuesday, September 26, 2023

शौर्य गाथा 78

 भाईसाहब की मम्मा की तबियत ठीक नहीं है, वो 'कुछ भी हो जाये, मुझे मत जगाना' कह बैडरूम का दरवाजा बंद कर सोने चली गई है। पापा 'भूकंप आया, भागो! भागो!' कहकर जगाना चाहते हैं, पर बेचारी की तबियत का हाल देख 'ओके' कह देते हैं। 

अब भाईसाहब और पापा अकेले हैं।  भाईसाहब टीवी लगाने की जिद करते हैं पापा थोड़ी देर के लिए लगा देते हैं, साथ में दूध पिलाना शुरू करते हैं।  भाईसाहब का हाथ पड़ता है और आधा दूध बिखर जाता है। "पापा सोल्ली" भाईसाहब बड़े क्यूटली कहते हैं, पापा मुस्कुराते हैं। 

अब भाईसाहब टीवी देख रहे हैं और पापा दूध साफ कर रहे हैं। 

कुछ देर बाद पापा बहाने से टीवी बंद कर इन्हें दूसरे रूम में ले जाते हैं।  इनका छोटा सामान जैसे मौजे, नीकैप, टाई एक बास्केट में रखे हुए हैं।  वो बास्केट इनके हाथ लग जाती है। 

भाईसाहब एक एककर सारा सामान बेडपर बिखरा देते हैं। इन्होंने मौजे पहन लिए हैं और हाथ में भी मौजे ही पहने जा रहे हैं कि  यकायक से चिल्लाते हैं  'पापा मेरे मौजे उतारो। ' पापा मौजे निकालते हैं और ये तेजी से बेड के नीचे भागते हैं। "पापा मैंने पुट्टी कर ली।" शुक्र है भाईसाहब ने डायपर पहना हुआ है, नहीं तो... 

पापा क्लीन करा कर बेड पर लाये हैं और भाईसाहब फिर मौजों से खेलने में व्यस्त हो गए हैं। 

पापा लाइट बंद करते हैं , 'आओ तुम्हें चाँद पर ले जाएँ ' गाना लगाते हैं , भाईसाहब को थोड़ा डांटकर 'सो जाओ, सो जाओ...' बोलते हैं लेकिन भाईसाहब "नहीं पापा " कह खेलने में व्यस्त हैं। 

पापा घड़ी देखते हैं, ग्यारह बज गए है।  तभी बैडरूम का गेट खुलता है और मम्मा निकलकर कहती है "अरे जबतक माहौल नहीं बनाओगे तबतक ये कहाँ सोयेंगे। ऐसे तो दो बजा देंगे ये। " मम्मा एक झपकी पूरी करने के बाद उठ गई है। 

पापा माहौल नहीं बना रहे थे तो क्या तम्बूरा बजा रहे थे? हुंह!

पापा भाईसाहब को उठाकर बैडरूम ले जाते हैं , उन्होंने हाथ-पांवों दोनों में ही मौजे पहन रखे हैं!

"शौर्य सो जाओ चुपचाप, बाहर हाथी  आ गया है, वो आ जायेगा...  सो जाओ..." मम्मा थोड़ा डांटकर बोलती है। 

भाईसाहब मम्मा से चिपककर दस मिनट में सो जाते हैं! पापा कभी भाईसाहब का चेहरा देख रहे हैं, कभी मम्मा का।  


Saturday, September 23, 2023

शौर्य गाथा 76

 भाईसाहब पापा से बोलते हैं "पापा, पालवती गालडन तलें?" पापा व्यस्त हैं, सुन नहीं पाते हैं।

भाईसाहब पास आते हैं, पापा को झकझोरते हैं "पापा तलो..."
"कहां चलना है शौर्य?"
"पापा, पालवती गालडन तलें, पापा।" भाईसाहब रिपीट करते हैं।
"ओके" पापा बोलते हैं और भाईसाहब आश्वस्त हो जाते हैं।
दस मिनट बाद भाईसाहब पापा के पास फिर आते हैं "पापा तलो।"
पापा सुनते नहीं हैं। भाईसाहब और पास आते हैं। शायद अब भाईसाहब गुस्सा हो गए हैं। पापा का हाथ पकड़ते हैं और कहते हैं "पापा, मैं आपतो डांट दूंगा।"
बेचारे पापा डर गए हैं, अपना काम छोड़ कर भाईसाहब को लेकर मम्मा के साथ गार्डन जा रहे हैं।

Wednesday, September 20, 2023

Papa's Letters to Shaurya #FifthLetter


 तुम मोशन सिकनेस की वजह से वॉमिट किए जा रहे हो और वो तुम्हें गोद में बिठाए हुए है। वो तुम्हारी वॉमिट से पूरा भीग गई हैं। खुद को पेपर नैपकिन से क्लीन करने की कोशिश करती है, लेकिन कितना ही कर पाती है! कपड़े चेंज करने के लिए कोई ढंग की जगह नहीं है । पूरे डेढ़ घंटे तक ऐसे ही गीली और बदबू सहती बैठी रहती है। मुझे लगने लगा है कि माएं इस ग्रह से नहीं हैं, कहीं और से आई हैं। इतना निश्छल प्रेम! संतान के लिए इतना सब कुछ..!

ऐसे ही मैं बोर्डिंग में था और तुम्हारी दादी बिना गैप किए हर इतवार मिलने आती थी। पूरे रास्ते उल्टी करते हुए! वो आती थी और खुद से खाना खिलाकर ही चैन लेती थी।

अधिकतर भारतीय अस्पताल पिता को डिलीवरी के वक्त लेबर रूम में नहीं आने देते हैं। मुझे भी नहीं जाने दिया गया था। किंतु तुम्हारी मां ने किस पीड़ा का अनुभव किया होगा उसकी एक झलक मुझे तब अनुभव हुई जब रूम में शिफ्ट होते-होते स्ट्रेचर से खड़ी हुई और वह भरभराकर के गिर गई! विज्ञान कहता है कि लेबर पेन किसी हड्डी टूटने से भी कई गुना ज्यादा दर्दनाक होता है।

मांओं का तप, त्याग, ममत्व कई लोगों ने लिखा है किंतु जितना भी लिखा जाए मुझे हमेशा कम लगता है। वे अमेजिंग हैं। एक लड़की मां बनते ही पता नहीं कैसे, कहां से अपार शक्ति और समझदारी से भर जाती है!

मैं तुम्हारी मां को तुम्हारा ख्याल रखते देखता हूं और सोचता रहता हूं कि ऑफिस और उसके बाद भी इतनी ऊर्जा के साथ वो सारा कैसे कर लेती है!

किसी ने लिखा था 'स्त्री काम से लौटने के बाद भी काम पर ही लौटती है।' मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी मां के साथ ऐसा हो। भरसक कोशिश करता हूं ऐसा नहीं हो। लेकिन मां के रूप में जब वह वापस लौटती है तो वह थकती नहीं है। शायद मां होना 'काम' होना नहीं होता है!

मैं तुम्हें गोद में लिए बार-बार वॉमिट से सरोबार तुम्हारी मां को देख रहा था। तुम्हारे प्रति उसका प्रेम महसूस कर रहा था। अपनी मां को भी याद कर रहा था। घर से छूटते हुए उनका चेहरा मेरी आंखों में अक्सर रह जाता है। बहुत कुछ है जो मैं जता नहीं पाता। मुझे कुछ कुछ पुरुष बनाने में शायद समाज सफल तो रहा ही है!

मर्द इमोशंस जाहिर नहीं करते। मर्द रोते नहीं हैं। मर्द परिवार का बोझ लिए ही चलते हैं! उफ !जाने क्या-क्या। उफ! ब्लडी सोसायटी!!

यह मेरा लिखा दुनिया के तमाम पिताओं के लिए, इस उम्मीद के साथ की वे थोड़े और अधिक मां होते जाएंगे। मुझे लगने लगा है कि दुनिया स्त्री से कोमलता और मां से प्रेम लेकर ही बेहतर हो सकती है!


Saturday, September 16, 2023

Days of Innocence #p6


भाईसाहब कुछ अच्छा करते हैं तो मम्मा 'शाबाश' बोलकर पीठ ठोक देती है।
एक बार भाईसाहब आए और पीठ दिखाकर कहते हैं "पापा मुझे छाबास बोलो।"
पापा पीठ ठोककर शाबाश बोलते हैं, फिर पूछते हैं "आपने क्या अच्छा किया?"
"पापा, मैंने वॉशरूम में सुसु किया।"
पापा भोली सी सूरत को चुम्मी दे देते हैं।

Sunday, September 10, 2023

Days of Innocence #p5

 

भाईसाहब दूध नहीं पी रहे हैं। मम्मा बोलती है "पापा से कंपटीशन है, चलो जल्दी पियो देखते हैं कौन फर्स्ट आता है।"
भाईसाहब गट गटकर सारा दूध खत्म कर देते हैं।
अरे वाह! आप तो फर्स्ट आ गए! पापा मम्मा बोलते हैं।
भाईसाहब खुश हो गए हैं, हहाहा.... हंसने लगते हैं।
"पापा, तलो आप भी पी लो।" भाईसाहब पापा का हाथ पकड़ गिलास मुंह की तरफ करते हैं।
पापा भी अपना दूध खत्म कर देते हैं। भाईसाहब पूछते हैं "पापा, पी लिया?"
पापा 'हां' में जवाब देते हैं और भाईसाहब चहकते हुए मम्मा से कहते हैं "मम्मा देखो पापा भी फस्त आ गए।"
पापा सोचते है अगर दुनिया भाईसाहब के हिसाब से चलने लगे तो कितनी सुंदर न हो जाए! न को आगे, न कोई पीछे। सबके सब फर्स्ट!

Friday, September 8, 2023

Papa's Letters to Shaurya. #FourthLetter



 जन्माष्टमी पर तुम्हें कृष्ण बनाते हुए मैं सोच रहा हूँ कि अगर ईश्वर से मैं तुम्हारे लिए और तुम्हारे जैसे नन्हे-मुन्ने कृष्ण-राधाओं के लिए प्रार्थना करूँगा तो क्या करूँगा? पेशे से शिक्षक लेखिका बाबुषा ने अपने छात्रों के लिए एक प्रार्थना की है-

"ऐसी शिक्षा-प्रणाली का अंत हो, जहाँ आंतरिक जीवन-मूल्यों के ऊपर महत्वाकांक्षी परियोजनाओं और गलाकाट प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित पाठ्यक्रम हो। 

तरह तरह के रंग बिरंगे उन ईश्वरों की विदाई हो, जिनका अस्तित्व जब-तब संकटग्रस्त होता है। 

मनुष्यों के सर पर पांव रख पताका फहराने वाली श्रेष्ट-बोध से ग्रसित प्राचीन संस्कृतियां विलीन हों। 

आत्म-विकास की प्रक्रिया में अन्य को हेय मानने वाले साधक-योगी सेवानिवृत्त हो। 

व्यव्हार में छद्म का नाश हो। 

शक्ति की लोलुपता का लोप हो। 

विचारों का पाखंड खंड-खंड हो। 

पृथ्वी एक बड़े घास मैदान में बदल जाए। 

बच्चों का राज हो। खेल हों, धुन हो, झगडे हों, कट्टिसे हों, 

सीखें हों, झप्पी हो।  नदियां हों, पहाड़ हों, परिंदे हों। 


महज नर-मादा न हों। 

प्रेम में मुक्त स्त्री हो।  प्रेम में युक्त पुरुष हो। 


विकास की सभ्यता नहीं, सभ्यता का विकास हो। 

पुलिस फौज की आवश्यकता न हो, सरहद न हो। 

प्रकृति की सत्ता हो।  

जीवन खोज हो। "


कितनी सुन्दर प्रार्थना है। तुम्हारे लिए भी शायद यही प्रार्थना करता या शायद इससे आगे उन मानवमूल्यों की भी प्रार्थना करता जो स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा थे। वे मूल्य जो नेहरू जी ने संविधान बनाने से पूर्व उद्देशिका में पेश किये थे जो बाद में संविधान की प्रस्तावना में सम्मिलित हुए और संविधान की आधारशिला बने। 

"सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का उद्बोधन, 

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म व उपासना की स्वतंत्रता का उद्बोधन,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता का मूल्य, बंधुत्व का उद्बोधन,

और उससे ऊपर पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र का उद्बोधन। "

यही तो वे मूल्य हैं जो मनुष्य को मनुष्यतर बनाते हैं।  मानव को मानव मात्र से प्रेम करना सिखाते हैं। जाति-धर्म से परे, अमीरी-गरीबी से परे, किसी भी विषमता से परे, हमें मात्र मानव बने रहना सिखाते हैं। मानव मात्र के लिए समस्त न्यायों की बात करते हैं। बाबुषा की प्रार्थना और प्रस्तावना के उद्बोधन कितने मिलते जुलते हैं न! 

अगर इन्हीं मानवमूल्यों के आधार पर किसी राज्य का विकास हो पाय तो क्या वो आदर्श राज्य न होगा? होगा, आदर्श नागरिकों का आदर्श राज्य! 

मुझे नहीं पता कि आदर्श राज्य का स्वप्न पूर्ण होगा या नहीं किन्तु मैं कोशिश करूँगा की तुम्हें एक बेहतर नागरिक जरूर बना पाऊं और चाहूंगा की समस्त नन्हें मुन्ने राधा-कृष्ण भी बेहतर मनुष्य बनें और मिलकर एक बेहतर भविष्य गढ़ पाएं।  

Days of Innocence #p4


भाईसाहब को मम्मा स्टोरी सुना रही है "एक बार भालू की कुल्हाड़ी टूट गई, वो रो रहा था। बंदर आया, बोला कि कभी भी रोते नहीं हैं सॉल्यूशन ढूंढते हैं। और उसने मदद कर के कुल्हाड़ी ठीक कर दी। भालू खुश हो गया।"
भाईसाहब पापा के पास आते हैं। उंगली दिखा दिखाकर समझाते हुए कहते हैं "पापा तभी भी लोना नहीं। लोना नहीं है। छोलूशन ढूंढते है छोलूशन।"