Sunday, June 27, 2021

मेघनाथ (मेघनाद) यथार्थ




रामायण में मेघनाथ का किरदार विजय अरोरा जी ने निभाया है. जो अपने समय में एक प्रसिद्द फिल्म अभिनेता रहे हैं. यादों की बारात और इंसाफ जैसी प्रसिद्द फिल्म्स उनके खाते में हैं. अपने समय में वो अपनी प्रियतम मुस्कान के लिए जाने जाते थे. कहते हैं, उन्होंने राम के किरदार के लिए भी ऑडिशन दिया था. ये पोस्ट लेकिन विजय अरोरा नहीं मेघनाथ के बारे में है.


मेघनाथ का किरदार रामायण का बड़ा अद्भुत किरदार है. मेघनाथ-लक्ष्मण युद्ध जितना प्रसिद्द है उतनी ही रौचक मेघनाथ के जन्म की कहानी भी है.


रावण बड़ा प्रतापी था किन्तु बाली और सहस्त्रबाहु अर्जुन से युद्ध में हारा भी था. इसलिए उसे पुत्र के रूप में अपने से भी ज्यादा बड़े योद्धा की कामना थी. ज्योतिष के महाज्ञानी रावण ने इसके लिए एक उपाय किया. उसने सारे ग्रहों को मेघनाथ के जन्म के समय  ज्योतिष के ग्यारहवें घर में (11th house of horoscope ) जाने का आदेश दिया. कहते हैं अगर सारे ग्रह ग्यारहवें घर में हो तो इस वक्त में उत्पन्न व्यक्ति पत्थर को भी छूने से सोना कर सकता है. बहुत ही वैभवशाली-कीर्तिवान व्यक्ति उत्पन्न होता है.


 रावण के डर से सारे ग्रह देवों ने उसकी बात मानी, सिर्फ शनिदेव को छोड़कर. वे उस वक्त बारहवें घर में बैठ गए और बाद में यही मेघनाथ की मृत्यु का कारण भी बना. रावण शनिदेव की इस हरकत से इतना क्रोधित हुआ कि उसने उन्हें बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया. मेघनाथ का जन्म हुआ तो 8  ग्रह ज्योतिष के ग्यारहवें घर (11th House of Horoscope) में थे. इसलिए वह बड़ा प्रतापी था. उसने पैदा होते ही मेघ सी गर्जना में प्रथम क्रंदन किया. इसलिए उसका नाम मेघनाथ रखा गया.


पुराणों अनुसार योद्धाओं की महामहरथी, अतिमहारथी, महारथी, अतिरथी और रथी नाम से पांच श्रेणियां हैं. महामहारथी में ब्रह्मा, विह्णु, महेश, गणेश, शक्ति और कार्तिकेय बस आते हैं. अतिमहारथियों में ब्रह्मा, विष्णु. महेश के अवतारों (राम, कृष्णा, परसुराम, हनुमान, वीरभद्र इत्यादि) के अलावा बस मेघनाथ और अर्जुन ही आते हैं. रावण और लक्ष्मण महारथी माने जाते हैं.


मतलब मेघनाथ लक्ष्मण और रावण से भी बड़ा योद्धा था!


 एक बार रावण को देवताओं से युद्ध हुआ और युद्ध में रावण को इंद्र ने बंदी बना लिया. जब मेघनाथ को पता चला तो उसने अकेले ही देवलोक पर चढ़ाई कर दी और इंद्र को बंदी बनाकर लंका ले आया. वह इंद्र का वध करने ही वाला था कि ब्रह्मा जी प्रकट हुए उन्होंने उसे इंद्र को छोड़ने को कहा. बदले में मेघनाथ ने ब्रह्मा से ब्रह्मास्त्र के अलावा अमरता का भी वर मांगा. ब्रह्मा ने अमरता का वर देने से मना कर दिया किंतु उसे वरदान दिया कि अगर वह अपनी कुलदेवी प्रत्यंगिरा माता के लिए निकुम्भिला यज्ञ करेगा तो उससे उसे एक रथ प्राप्त होगा. जिसपे बैठ वह सारे युद्ध जीत सकता है. अगर वह उस रथ पे बैठा है तो कोई भी योद्धा उसे मारने में सक्षम नहीं होगा. किन्तु यज्ञ भांग करने वाला ही उसे मारने में सक्षम भी होगा! कहते हैं ब्रह्मा ने ही मेघनाथ को इंद्रजीत नाम भी दिया था. 


वैसे मेघनाथ संसार का एकमात्र योद्धा था जिसके पास ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र और नारायणास्त्र थे. द्वापर युग में अर्जुन के पास पशुपतास्त्र और ब्रह्मास्त्र  तो थे किन्तु नारायणास्त्र नहीं था. हालाँकि स्वयं नारायण श्रीकृष्ण रूप में उनके साथ थे.


राम-रावण युद्ध में मेघनाथ ने तीन दिन युद्ध किया. पहले ही दिन उसने ब्रह्मास्त्र से 67 करोड़ वानरों का वध कर सुग्रीव की लगभग आधी सेना ख़त्म कर दी. साथ राम लक्ष्मण को भी मूर्छित कर दिया था.


युद्ध के दूसरे दिन अपनी मायावी शक्तियों से उसने बड़ा तीव्र युद्ध किया और एक अदृश्य तीर से 'वासवी शक्ति' का लक्ष्मण पर प्रयोग किया, जिससे वो मूर्छित हो गए. वासवी शक्ति क्षण भर में व्यक्ति को परलोक पहुँचाने में सक्षम थी किन्तु लक्ष्मण बलशाली वीर थे इसलिए वो सिर्फ मूर्छित हुए. सूर्योदय के पहले अगर उपचार न किया जाता तो कालकवलित हो सकते थे. इसलिए ही हनुमान संजीवनी बूटी लेने गए और पूरा का पूरा द्रोणगिरि पर्वत उठा लाये.


जब मेघनाथ को पता चला की लक्ष्मण बच गए हैं तो वह अपनी कुलदेवी प्रत्यंगिरा माता के लिए निकुम्भिला यज्ञ करने लगा.  लेकिन विभीषण ने लक्ष्मण को ब्रह्मा जी के वरदान से अवगत कराया और लक्ष्मण रात्रि में ही यज्ञ विध्वंश करने के लिए निकल पड़े.


कथाओं अनुसार यज्ञ भंग होने के बाद मेघनाथ ने यज्ञ में प्रयुक्त बर्तनों से ही युद्ध करना शुरू कर दिया. बाद में जब वो अस्त्र के ले वापस आया तो ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी लक्ष्मण पर किया किन्तु ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण की परिक्रमा कर के वापस मेघनाथ के पास आ गया.


मेघनाथ समझ गया कि लक्ष्मणजी वो वीर हैं जिनसे वह मृत्यु को प्राप्त होगा इसलिए वह कुछ देर के लिए युद्धक्षेत्र छोड़ रावण को समझाने के लिए भी गया. किन्तु दम्भ में चूर रावण ने उसकी एक न सुनी. साथ ही पितृाज्ञा न मानने के कारण मेघनाथ का अपमान भी किया.


मेघनाथ ने रावण से आज्ञापालन न करने के कारण क्षमा मांगी और पुनः रणभूमि में आ युद्ध करना प्रारम्भ किया. लक्ष्मण ने अंजलीकास्त्र से मेघनाथ का सर धड़ से अलग कर दिया. (इसी अस्त्र से द्वापर युग में अर्जुन ने कर्ण का वध किया था.) इस तरह मेघनाथ मृत्यु को प्राप्त हुआ.


कथाओं अनुसार ब्रह्मा से मेघनाथ को एक और वर प्राप्त था कि वह उसी योद्धा से मृत्यु को प्राप्त होगा जो 12 वर्षो तक सोया न हो. लक्ष्मण राम-सीता की सेवा करते-करते वन में बारह वर्षों से सोये नहीं थे. इसलिए भी मेघनाथ को मारने में सफल रहे.


एक कथा अनुसार मेघनाथ ने शेषनाग कि पुत्री सुलोचना से बिना अनुमति के विवाह किया था. इसलिए शेषनाग ने दंड देने के लिए लक्ष्मण के रूप में मेघनाथ का वध किया था.


हालाँकि मेघनाथ कि पत्नी सुलोचना पति वियोग सह नहीं पाई और समाचार सुनने के पश्चात् ही मृत्यु को प्राप्त हुई!


हिंदी में एक कहावत है कि जैसी संगत वैसी रंगत. मतलब आप बुराई के साथ हैं तो आप भी बुरे होंगे. भले ही आप कितने भी बलशाली रहे हों. मेघनाथ भी उसका एक उदहारण है. किन्तु साथ ही पितृआज्ञा का अक्षरश: पालन करने वाले पुत्र के रूप में भी उसे याद किया जाता रहेगा. 


- Vivek Vk Jain


(Photo: Internet) #Meghnath #Ramayana

Thursday, June 10, 2021

जंगल की कहानियां : भारत में सागौन प्लांटेशन के जनक मनीराम गोंड

 #Jungle

भारत में सागौन प्लांटेशन के जनक : मनीराम गोंड (1891)
लगभग 132 साल पहले छत्तीसगढ़ के रायपुर वनमंडल अंतर्गत एक अंग्रेज वन अधिकारी की पोस्टिंग पिथौरा में हुई। उसने कुम्हारीमुड़ा के मनीराम गोंड को बीटगार्ड की नौकरी पर रख लिया। मनीराम खाना बनाने में कुशल थे सो इनके हाथों बने भोजन का स्वाद साहब की जुबान पर चढ़ गया। कुछ महीनों बाद अंग्रेज अधिकारी इंग्लैंड गया तो मनीराम को भी अपने साथ ले गया। वहां पर मनीराम ने साहब की नर्सरी में पौधों के बीज उगाने और पौधा बनाने की 'रुट शूट विधि' सीख ली। जब वे वापस भारत आये तो दो साल बाद उन अंग्रेज वन अधिकारी का ट्रांसफर हो गया।
1891 का साल था जब गिधपुरी जंगल जो देवपुर फारेस्ट रेंज में आता है और बार नवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य से लगा हुआ है, वहां जंगल का बड़ा हिस्सा कटाई के कारण उजाड़ पड़ा था। मनीराम ने अपनी पत्नी के साथ वहां पौधे लगाने का निश्चय किया। बताया जाता है कि संजोगवश बर्मा से लौटे एक व्यापारी से उनकी मुलाकात हुई और उसने मनीराम को सागौन के पौधे रोपने का सुझाव दिया और इसके लिए सागौन के बीज उपलब्ध करवाए। यहां पर मनीराम ने इंग्लैंड में सीखा हुआ 'रुट शूट' पौधारोपण विधि का उपयोग किया और जंगल के 23 एकड़ क्षेत्र में सागौन के पौधे लगा डाले! इस समय जब पौधारोपण की कोई स्पष्ट नीति नहीं बनी थी, तब मनीराम ने इस उच्च तकनीक 'रुट शूट प्लांट पद्धति' से सागौन लगा दिए थे। कहा जाता है कि यह सागौन प्लांटेशन भारत ही नहीं बल्कि एशिया का पहला सागौन प्लांटेशन था।
पर इस वनपुत्र को इस अच्छाई का फल दुःख के रूप में मिलना था। बाद में आये अंग्रेज अफसर ने इस सागौन पौधारोपण को लेकर विभागीय अनुमति के दस्तावेज खोजे तो वह नहीं मिला जबकि मनीराम का पौधारोपण भावनावश था। विभाग ने इस काम को गैरकानूनी माना और मनीराम को बर्खास्त कर दिया! मनीराम इससे आहत होकर पागलों की तरह भटकने लगे और बाद में उनकी मौत हो गई! स्थानीय दैवीय विश्वासों के अनुसार मरने के बाद उनकी आत्मा जंगल और गांव में भटकती थी इसलिए बैगाओं ने उनकी आत्मा को मनीराम प्लांटेशन के एक पेड़ में पत्थर बनाकर स्थापित कर दिया और विभिन्न त्योहारों में उनकी पूजा की जाने लगी।
वक्त बीता और बाद में वन विभाग द्वारा इस प्लांटेशन का नामकरण मनीराम जी पर किया गया। आज 23 एकड़ क्षेत्र में सिर्फ एक एकड़ जगह पर ही मनीराम के लगाए सागौन बहुत कम संख्या में बचे हुए हैं। इन पेड़ों की मोटाई पौने तीन मीटर तक है और ये अपने वजन को और कितने दिन सम्भाल सकेंगे, यह कहा नहीं जा सकता। इस प्लांटेशन को लेकर लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। बचे हुए पेड़ों को संरक्षित करने के उपायों के साथ इस प्लांटेशन स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना अच्छा कदम होगा। 1997 में तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने मनीराम के पोते प्रेमसिंह को को 10 एकड़ जमीन और 50 हजार रुपये देने की घोषणा की थी। इसी तरह जून 2018 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पौधरोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करनेवाले को 'मनीराम गोंड स्मृति हरियर मितान' नाम से राज्यस्तरीय सम्मान देने की घोषणा की थी। मनीराम के वंशजों को अभी उस जमीन पर मालिकाना हक मिला है कि नहीं, यह पता नहीं है क्योंकि खबरों के अनुसार 2017 तक मनीराम के पोते प्रेमसिंग जिनकी भी मृत्यु हो चुकी है, उनकी पत्नी हीराबाई को नहीं मिला था।
आज मनीराम नहीं हैं पर पूरे देश में उनकी सागौन रोपणी पद्धति का ही अनुसरण किया जाता है। मनीराम जिनकी कद्र तत्कालीन वन विभाग न कर सका, उसे गांववालों ने वनदेवता बना दिया! यह घटना लोक में किंवदंतियों की स्थापना प्रक्रिया पर प्रकाश डालती है। इस मुद्दे पर और भी कोई जानकारी हो तो टिप्पणी में बता सकते हैं। 'वनदेवता' मनीराम जी को नमन।
- Piyush Kumar
No photo description available.

Wednesday, June 9, 2021

जंगल की कहानियां : जादव मोलई पेईंग

 #jungle #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

माजुली द्वीप के नदी द्वीप है. देश का सबसे बड़ा. जो ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में स्थित है. ब्रह्मपुत्र की बाढ़ हर साल इस पर कहर बरपाती है. 20वीं सदी की शुरुआत में यह 880 वर्ग किलोमीटर बड़ा हुआ करता था, 2014 में सिमट कर मात्र 352 वर्ग किलोमीटर का ही रहा गया है. बात 1979 की है, यहां के नदी के रेतीले किनारे (Sandbars) पर वृक्षारोपण का प्रोजेक्ट वन विभाग के द्वारा शुरू किया गया. कारण- बाढ़ के प्रभाव को कम करना. एक शख्स इस प्रोजेक्ट में मजदूर के रूप में काम कर रहा था. 1983 में, पांच साल बाद 200 हेक्टेयर वृक्षारोपण का काम पूरा हो गया. मजदूर वापिस जा चुके थे, रोपित पौधे भी काफी उम्र के थे, लिहाज वन विभाग ने भी बहुताधिक सुरक्षा की जरूरत नहीं समझी. परन्तु यह शख्स वहां रुक गया. उनने 1983 से 2013 तक लगातार 30 वर्ष काम कर 550 हेक्टेयर का एक विशाल जंगल खड़ा कर दिया. 550 हेक्टेयर अकेले ही!
इस शख्स ने सारी उम्र दे दी इतना बढ़िया, उच्च गुणवत्ता का जंगल खड़ा करने में. जिसमें बाघ, हाथी और गैंडे भी विचरण कर रहे हैं!
उस शख्स का नाम था जादव मोलई पेईंग (Jadav Molai Payeng). आप में से अधिकतर ने उनकी कहानी पढ़ी होगी या उनका नाम सुना होगा. फिर भी मैं फिर से बताना चाहता था. बताना चाहता था कि जंगल ऐसे ही निर्मित नहीं हो जाते, उच्च गुणवत्त्ता वन तो बिल्कुल भी नहीं. एक जुनून, सारी उम्र और निःस्वार्थ भाव लगता है.
जब भी बक्सवाहा या कहीं और के जंगल के उजड़ने की बात होती है मेरे आंखों के सामने जादव पेईंग का चेहरा घूम जाता है. लगता है जैसे जादव पेईंग की निःस्वार्थ सेवा, लगन, मेहनत, कोशिश और उम्र उजड़ने जा रही हो.
सबकुछ इतना आसान नहीं होता दोस्त. नए जंगल खड़े करना तो बिल्कुल भी नहीं.
[ तस्वीर: बक्सवाहा के जंगल की, जादव पेइंग 2015 में पद्मश्री पुरस्कार लेते हुए. ]



Saturday, June 5, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

1974 से हम विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं, to raise awareness on environmental issues such as marine pollution, human overpopulation, global warming, sustainable consumption and wildlife crime और बाकि हर दिन हम धरती का क्षरण करते हैं।
अगर एक व्यक्ति शतायु होता है और जिंदगी के पहले दिन से एक पौधा रोज लगाता है तो पूरे जीवन में वो 36525 (365x100 और लीप वर्ष मिला कर) पौधे ही लगा पाएगा।
मुझे पता है हम में से कोई भी ये नहीं कर पाएगा लेकिन वन संपदा जो आपको विरासत में मिली है उसे हम खत्म किए जा रहे हैं। लगभग 215000 (2.15 लाख) पेड़ बक्सवाहा में ही एक झटके में खत्म कर देंगे।
अगर कोई बोले कि मैं पर्यावरण हितैषी हूं, एक पौधा रोज लगाता हूं और आप #savebuxwahaforests या अन्य किसी जंगल/पर्यावरण क्षरण के खिलाफ़ आवाज में साथ नहीं देते हैं, उसे रोकने की कोशिश नहीं करते हैं तो ये आपकी हिपाक्रेसी (Hypocrisy) है!
आज 5 जून को हम पौधा लगाएंगे, सेल्फी लेंगे और सोशल मीडिया पर पोस्ट करेंगे। वन बचाएं, बन बनाएं का नारा लगाएंगे। लेकिन छत्तीसगढ़ की 850 हेक्टेयर की जनजातीय बसाहट की जंगल की जमीन कोयला खान के लिए आवंटित की जाएगी तो चुप रह जायेंगे। 364 हेक्टेयर का बक्सवाहा का जंगल जाएगा तो उसके लिए चुप रहेंगे, नियमगिरि (उड़ीसा) के पवित्र पहाड़ बरबाद होंगे, वहां की नदियां प्रदूषित होंगी तो कोई कुछ नहीं बोलेगा। हिपाक्रेसी की भी एक सीमा होती है!
हममें से हजारों हैं जिन्होंने Covid-19 से परिवार का कोई सदस्य या रिश्तेदार खोया है। हममें से कितने ही ऑक्सीजन सिलेंडर की लाइन में लगे हैं। कितने ही एक समय खुद की सांसे गिने हैं, कोविड पॉजिटिव हुए तो प्रार्थना किए हैं कि ईश्वर हमारी सांसे बचा ले! क्या सांसे ऐसे ही बचती हैं?
तुम्हारी सांसों के लिए ऑक्सीजन लगती है और ऑक्सीजन पैदा करने पेड़, और पेड़ कभी अकेला पेड़ नहीं होता है, जंगल के इकोसिस्टम का हमेशा एक हिस्सा होता है। पेड़ बचाने हैं तो पूरा जंगल, पूरा इकोसिस्टम बचाना होगा। Compensatory Afforestation सिर्फ पेड़ लगा सकता है, patches में लगे ये पेड़ सदियों से बना एक जंगल कभी नहीं बन सकते, ये याद रखना।
कई जगह बीच का रास्ता नहीं होता बाबू। जैसे तुम्हारी जिंदाही और मौत के बीच का कोई रास्ता नहीं है। है भी तो उसे कोमा कहते हैं उस हालत में तुम जाना नहीं चाहोगे। याद रखना जंगल बचाने और न बचाने के बीच का भी कोई रास्ता नहीं है। Compensatory Forestation look good on paper but not a substitute for a 1000 years old forest.
और हां, अंत में यदि आप किसी natural place पर, किसी जंगल, वन अभ्यारण में घूमने जाते हैं और प्लास्टिक, पॉलिथीन या रैपर या अन्य कोई कचरा छोड़ के आते हैं और सोशल मीडिया पर #SaveEnvironment या #SaveForest की बात करते हैं तो याद रखना ये आपकी हिपाक्रेसी हैं।
#WorldEnvironmentDay मनाइए #SaveForests #SaveBuxwahaForests कैंपेन का हिस्सा बनिए किंतु साथ ही खुद को भी बेहतर बनाइए।

Monday, May 24, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

बुंदेलखंड क्षेत्र जो मध्य प्रदेश के 7 और उत्तर प्रदेश के 7 जिलों में फैला हुआ है. एक पठारी क्षेत्र है. पठारी क्षेत्रों की अपनी अलग अलग समस्याएं होती हैं, किन्तु इस क्षेत्र की मुख्या समस्या ये है कि यहां पर मृदा कि बहुत गहरी परत नहीं है. कहीं तो 50cm से भी कम है. ऐसे क्षेत्र कि समस्या ये होती है कि यहाँ की मिट्टी वर्षाजल बहुताधिक नहीं सोख पाती है और वर्षाजल का Runoff बहुत अधिक होता है. जिससे मृदा का ऊपरी उपजाऊ परत का बहाव भी बहुताधिक होता है. चूँकि वर्षा का जल धरती में नहीं समाता है इसलिए वर्षाकाल में बाढ़ की आशंका और बाकि समय में सूखे की आशंका अत्यधिक होती है. अत: ऐसा क्षेत्र Flood Prone and Draught Prone दोनों होता है.
इसके अलावा बुंदेलखंड कम वर्षा (Low Rainfall), गर्म जलवायु (Hot Climate), Grid and Ravine Lands, अल्प सिंचाई (Low Quality of Irrigation) की समस्या से गुजर रहा है. जिसक जिक्र सरकार ने 2009 में बुंदेलखंड पैकेज देते वक़्त किया था और नीति आयोग अपनी रिपोर्ट 'Study of Bundelkhand' (2016) में कर चुका है.
तुम्हें पता है इतनी सारी समस्याओं के लिए हमें कई अलग अलग उपाय की जरुरत नहीं है. इन सब समस्याओं का हल एक ही उपाय से हो सकता है, और वो उपाय है- Forestation (वनोपरोपण या वनों का निर्माण), #part1 में 'वनों का महत्त्व' पढ़ेंगे तो आपको समझ आएगा.
अब हम बक्सवाहा पर आते हैं, जहां बुंदेलखंड की ऊपर लिखित अधिकतर समस्याएं तो मौजूद हैं किन्तु वहां Forestation (वनोपरोपण) नहीं, उल्टा Deforestation (वनोन्मूलन) होने वाला है.
बक्सवाहा छतरपुर जिले का हिस्सा है, जहाँ के वन क्षेत्र पन्ना टाइगर रिज़र्व के बफर क्षेत्र से मात्र 20km दूर है. मतलब वनस्पति और जीव (Flora and fauna) में यह क्षेत्र पन्ना नेशनल पार्क वनक्षेत्र जैसा ही है. मजेदार बात तो ये है कि यह क्षेत्र बुंदेलखंड की गंगा बेतवा नदी का कैचमेंट एरिया है, और यहाँ पर हीरे की खदानें आने पर सारी सरिताओं का पानी और भूमिगत जल खनन कार्य में उपयोग होने वाला है.
आप अगर गूगल पर बुंदेर डायमंड ब्लॉक (Bunder Diamond Block) डालेंगे तो यहाँ पर सर्वे करने वाली रिओ टिंटो कंपनी के प्रपोजल की एक रिपोर्ट पीडीऍफ़ फॉर्मेट में मिलेगी जिसमें उसने खनन के लिए 971.515 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्सन की बात कही है. इसमें आसपास के 12 गावों का विस्थापन भी शामिल है. पढ़ेंगे तो उसमें वन विभाग की टिपण्णी भी है जिसमे कहा गया है की ये क्षेत्र वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है और इसमें चौसिंघा, तेंदुआ, चीतल, चिंकारा, मोर आदि जानवरों का निवास है और टाइगर के लिए भी माइग्रेटरी कॉरिडोर है.
2019 में आदित्य बिरला ग्रुप की Essel Mining कंपनी को यहां पर हीरे के उत्खनन का प्रोजेक्ट 364 हेक्टेयर भूमि के लिए मिला है. हमें सोचना होगा कि पूरे वनक्षेत्र के इस हिस्से में क्या जानवर विचरण नहीं करते होंगे? यहाँ पर खनन क्या बाकि के वनक्षेत्र को प्रभावित नहीं करेगी? 2015 में टाइगर मूवमेंट रहा है. क्या खनन इसे प्रभावित नहीं करेगा?
कुछ और प्रश्न भी हैं जो ऑफिसियल वेबसाइट पर खंगाल कर पढ़ने के बाद समझ आती है:-
1. जिन 6 गांवों के आसपास प्रस्तावित खनन क्षेत्र (proposed mining area) है उनमें से 2 गाँव खनन एरिया के बहुत पास हैं, 1km से कम दूरी पर हैं.
2. क्षेत्र का सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) नहीं हुआ है. अगर हुआ भी है तो Detail Data Analysis पब्लिक में नहीं है.
ध्यान रखें, सोशल Social Impact Assessment के 6 उपभाग होते हैं-
a. Hazard Assessment
b. Risk Assessment
c. Economic assessment
d. Project program and policy evaluation
e. Cultural Impact
f. Environmental Impact Assessment
3. जो भी आकलन (Assessment) पब्लिक में है वो एकतरफा (Onesided) है, प्रोजेक्ट पाने वाली कंपनी द्वारा बनाया गया है.
4. चौथा प्रश्न मेरा Environmental Impact Assessment ( पर्यावरण प्रभाव आकलन), Economic Value of Forests (वनों का आर्थिक मूल्य) और Cost Benefit Analysis (लागत लाभ विश्लेषण) पर है.
हालाँकि इसमें राष्ट्र स्तर के नियम होते हैं. अत: इसपर अगली कड़ी में विस्तार से बात करनी होगी.

Tuesday, May 18, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

"क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।"
यही वो पंक्तियां हैं जो 1973 के चिपको आंदोलन में व्यापक रूप से बोली जाती हैं, आंदोलन की घोष वाक्य थीं।
लेकिन 1972-73 में जंगल बचाने और भी नई बातें हुईं प्रोजेक्ट टाइगर और वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम।
ये अधिनियम कैसे बने इसकी भी एक कहानी है, वो कभी बाद में। लेकिन कठोर कानूनों ने राष्ट्रीय उद्यानों और वन्य प्राणी अभ्यारणों को लगभग अनटचेबल बना दिया। मतलब ये जंगल लगभग पूर्णत: सुरक्षित हो गए। लेकिन ये प्रोटेक्टेड एरिया कुल वन क्षेत्र का मात्र 5% ही हैं। उसपर भी इनकी भूमि ग्रेटर नेशनल इंटरेस्ट में अन्य कामों के उपयोग में लाई जा सकती है। जैसे कि पन्ना टाइगर रिजर्व की 10% भूमि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के लिए लिया गया है, जिसमें 46 लाख पेड़ों की आहुति चढ़ेगी।^
दो गर्मियों में सूखने वाली नदियों (Non perennial rivers) का लिंक होना बुंदेलखंड का हित कितना कर पाएगा और लिंक प्रोजेक्ट का जलीय जीवों (Aquatic Life) और पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) पर क्या असर पड़ेगा ये तो बाद में पता चलेगा किंतु अभी ये तय है कि लाखों पेड़ों की लाशें तो गिरेगी हीं।
वनों के पेड़ों को काटना/जलाना वनोन्मूलन कहलाता है और वनोन्मूलन के क्या नुकसान हैं ये एक 7वीं का बच्चा भी बता सकता है। यहां नोट करूं तो:
1. विलोपन (extinction of species)
2. जलवायु में परिवर्तन
3. मरुस्थलीकरण (desertification)
4. स्वदेशी लोगों के विस्थापन
5. वनोन्मूलन जलवायु (climate) और भूगोलमें परिवर्तन ला रहा है।
6. वनोन्मूलन ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती है और हरित गृह प्रभाव Green House Effect को बढ़ावा देने के लिए एक मुख्य कारक है।
7. वनोन्मूलन कुल एंथ्रोतपोजेनिक (anthropogenic)कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के एक तिहाई के लिए उत्तरदायी है।
8. जल चक्र भी वनोन्मूलन से प्रभावित होता है। पेड़ अपनी जड़ों के माध्यम से भूजल अवशोषित करते हैं और वातावरण में मुक्त कर देते हैं। जब जंगल का एक हिस्सा निकाल दिया जाता है तो पेड़ इस पानी को वाष्पीकृत नहीं करते और इसके परिणाम स्वरुप वातावरण शुष्क हो जाता है।
9. वनोन्मूलन आमतौर पर मृदा अपरदन (erosion) की दर को बढा देती है, क्योंकि प्रवाह (runoff) की मात्रा बढ़ जाती है और पेडों के व्यर्थ पदार्थों से मृदा का संरक्षण कम हो जाता है।
10. वनोन्मूलन अनुत्क्रमणीय रूप से आनुवंशिक भिन्नताओं (जैसे फसल की प्रतिरोधी क्षमता) को नष्ट कर देती है।
वनोन्मूलन 1972 के कठोर कानूनों के बाद भी रुका नहीं है यह हम पन्ना टाइगर रिजर्व और बक्सवाहा फॉरेस्ट की स्थिति से देख सकते हैं।
लेकिन क्या इसके खिलाफ़ 1973 के बाद आवाजें नहीं उठीं? बिलकुल उठीं। जैसे, देश के सबसे सुंदर जंगल को बचाने वाला 1973 का साइलेंट वैली मूवमेंट, कर्नाटक का एप्पिको मूवमेंट 1983, जंगल बचाओ आंदोलन 1983, नियमगिरि मूवमेंट 2013 और इनमें सबसे सफलतम साइलेंट वैली प्रोजेक्ट की कहानी:
"साइलेंट घाटी केरला में स्थित है। यह एक विशाल जंगल है जो केरला के पालघाट जिले में स्थित है। इस जंगल में कुंथीपुज्हा नदी मुख्य रूप से बहती है।
1970 में केरला राज्य विद्युत बोर्ड ने इस स्थान पर जल विद्युत् बांध (हाइड्रो इलेक्ट्रिक डैम) बनाने का प्रस्ताव रखा जिससे 8.9 किलोमीटर का क्षेत्र पानी में डूब जाता। योजना आयोग ने इस बांध को बनाने के लिए 25 करोड़ की धनराशि स्वीकृत कर दी।
साइलेंटघाटी आंदोलन की शुरूआत:
जैसे ही बांध बनने की घोषणा हुई लोगों ने उसका विरोध शुरू कर दिया। शांति घाटी (साइलेंट वैली) अपने हरियाली पेड़ पौधों और जंगल के लिए जानी जाती है। यह क्षेत्र जैव विविधता से संपन्न है, इसलिए लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। शांति घाटी में लंबी पूंछ वाले मकाक बंदर भी पाए जाते हैं जिनको दुर्लभ प्रजाति समझा जाता है।
रोमुलस वीटाकर जिन्होंने मद्रास सर्प उद्यान की स्थापना की थी, उन्होंने सबसे पहले बांध योजना का विरोध करना शुरू किया। 1977 में केरला वन रिसर्च संस्थान ने सर्वे करना शुरु किया कि बांध बनने के बाद पर्यावरण को कितना नुकसान होगा।
शांति घाटी को बचाने के लिए “केरला शस्त्र साहित्य परिषद” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पब्लिक मीटिंग की, इसमें लोगों को बांध बनने के बाद पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से जानकारी दी। सुगाथाकुमारी जो केरला की विख्यात कवित्री थी, वह भी इस आंदोलन में जुड़ गई। उन्होंने “शांति घाटी बचाओ” (सेव साइलेंट वैली Save Silent Valley) का नारा दिया। शांति घाटी को बचाने के लिए उन्होंने कई कविताएं भी लिखी जिन्होंने जिन्होंने आंदोलन में लोगो को जागरूक बनाया।
डॉक्टर सलीम अली जो एक प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी थे और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सदस्य थे उन्होंने इस जलविद्युत बांध परियोजना को बंद करने की अपील की।
डॉ एम एस स्वामीनाथन जो एक जाने-माने कृषि वैज्ञानिक हैं और कृषि विभाग के सचिव थे उन्होंने शांति घाटी को एक आरक्षित पर्यावरण पार्क बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि शांति घाटी के 8.9 किलोमीटर वर्ग क्षेत्र और इससे लगे हुए अमाराबालम (80 वर्ग किमी), अट्टापड्डी (120 वर्ग किमी), जैसे क्षेत्रों को मिलाकर एक प्राकृतिक पार्क बनाने की बात कही।
1982 में एक कमेटी बनाई गई जिसका चेयरमैन एन जी के मेनन को बनाया गया। 1983 में मेनन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट को अच्छी तरह पढ़ने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने शांति घाटी में बनने वाले जल विद्युत बांध परियोजना को बंद करने का आदेश दे दिया। 15 नवंबर 1984 को इसे एक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दे दिया गया और इसे संरक्षित पार्क बना दिया गया।"*
तो साइलेंट वैली मूवमेंट जीता क्योंकि:
स्थानीय लोगों की जागरूकता, आंदोलन को राष्ट्रीय मंच का मिलना, लोकतांत्रिक सरकार, सतत संघर्ष, आंदोलनकारियों और सरकार के मध्य सफल संवाद, सरकार की अच्छी मंशा
ये सब वहां मौजूद था।
मतलब अगर चिपको आंदोलन और साइलेंट वैली मूवमेंट से समझें तो वन और पर्यावरण बचाने को जो सफल आंदोलन रहे हैं उनमें निम्न मुख्य प्रभावी बातें रही हैं:
1. स्थानीय लोगों की इच्छा.
2. स्थानीय लोगों की जागरूकता.
3. आंदोलन को राष्ट्रीय मंच का मिलना
4. लोकतांत्रिक सरकार.
5. कुशल नेतृत्व.
6. सतत अहिंसक संघर्ष.
7. आंदोलनकारियों और सरकार के मध्य सफल संवाद.
8. सरकार की अच्छी मंशा.
9. जनसंवाद
और to #save_buxwaha_forest हमें इन्हीं चीजों की जरूरत होगी।
(तस्वीरें: बक्सवाहा के हरे-भरे जंगल की, जिसे उजाड़ हीरे निकाले जाएंगे.)

Wednesday, May 12, 2021

जंगल की कहानियां : #buxwahaforestmovement

 #savebuxwahaforest #buxwahaforestmovement

कहानी ऐतिहासिक है. अंग्रेज़ों ने दो सौ साल हमपर राज़ किया. हमारे सारे संसाधन लूटे. हमारे जंगलों से 1000 -1000 साल पुराने पेड़ काट के ले गए. उनको ढोने के लिए हाथियों को पीट-पीट कर पालतू बनाया गया. अगर वहां आदिवासी या जनजातियां थीं तो उन्हें बन्दूक की दम पर, उलटे सीधे नए कानून बनाकर खदेड़ा गया. फिर साफ़ हुए जंगल से खनिज सम्पदा (mineral wealth) का दोहन किया गया, और ऐसी कंपनी चलाने की परमिशन सिर्फ अंग्रेज़ों को हुआ करती थी. हुआ ये कि कई आदिवासी आंदोलन उठ खड़े हुए- भील विद्रोह, संथाल विद्रोह, कोल विद्रोह, मुंडा विद्रोह, छोटा नागपुर विद्रोह जैसे विद्रोह (Revolts) हुए. हालाँकि अंग्रेजी राज़ था, राजतंत्र था. मामला सिफर रहा. लोग मरते रहे, दोहन होता रहा. जंगल कटते रहे. ज़मीन बंजर होती रही. अकाल पड़ते रहे. भारतीय सेकंड क्लास सिटीजन (दोयम दर्जे के नागरिक) और यूँ कहें तो लगभग गुलामों की तरह जीते रहे. मनमाने, अपने तरीके की रिपोर्ट्स, अपने तरीके के लॉ आते रहे.
बात 1947 के बाद की है हम स्वतंत्र हो चुके थे. इतना सबकुछ उजड़ जाने के बाद भी वन सम्पदा में हम समृद्ध थे. 1970 के दशक शुरुआत में उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के एक हिस्से में जंगलों की कटाई व्यापक रूप से हो रही थी. वहां के किसानों ने इसका विरोध किया....जमकर विरोध किया. रेणी में वन विभाग और ठेकेदारों को 2400 पेड़ काटने थे तो गौरादेवी जी के नेतृत्व में 27 महिलाओं ने मात्र वहां खड़े होकर, प्राणों की बाजी लगाकर पेड़ो का कटना रुकवा दिया. आज़ादी मिले मात्र पच्चीस साल हुए थे. गांधी जी के मूल्य और उनके कुछ शिष्य अभी भी ज़िंदा थे. देखते देखते एक आंदोलन खड़ा हो गया, जिसने पेड़ और हिमालय दोनों बचा लिए. आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा, गोविन्द सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरादेवी जी ने जिस अहिंसक आंदोलन को खड़ा किया था उसे हम 'चिपको आंदोलन' कहते हैं.
आज़ादी के पहले और बाद के दोनों सन्दर्भों को देखें तो आपको समझ आएगा कि क्यों आज़ादी के पहले विद्रोहों बाद भी जंगल बचा पाना संभव नहीं हुआ और क्यों बाद में चिपको आंदोलन का इतना व्यापक असर रहा.
लोकतंत्र. अहिंसा. आज़ादी. गांधीजी के मूल्य. कुशल नेतृत्व. इन सबसे ऊपर स्थानीय लोगों की इच्छा. इतना कुछ था जिसने जंगल बचाया.
लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ब्रिटिश राज़ हो या लोकतान्त्रिक सरकार. दोनों के लिए जंगल बस राजस्व (revenue generation) का जरिया थे. जंगल, जैव विविधता और भूमिगत जल संरक्षण (ground water conservation) पर किसी को कुछ सोचना ही नहीं था.
तब भी नहीं था, अब भी नहीं है. तात्कालिक उदाहरण बक्सवाहा फारेस्ट है ही. परतंत्र भारत के नागरिकों की तरह ही जंगल भी सरकारों के लिए दोयम दर्ज़े पर ही रहे हैं. अगर राजस्व मिल रहा है तो जंगल को काटो, उजाड़ो, खोदो और मिनरल्स निकालो, पेड़ बेचो, कंपनियों को टेंडर दो और जरुरत पड़े तो वहां के स्थानीय निवासियों, आदिवासियों को धकेलो, खदेड़ो, बाहर फेंक दो. बिना चिंता किये कि जंगल क्यों आवश्यक है. और क्यों आवश्यक हैं, ये तो 7वीं का बच्चा भी एक अच्छे निबंध से बता सकता है. और क्यों न बता पाए! इसपर सरकारें 22 मई को जैव विविधता दिवस पर या 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर बच्चों से ही तो निबंध लेखन कराती हैं, अच्छा लिखने वालों को इनाम भी देती हैं.
'वनों का महत्व' विषय पर लिखे एक बच्चे निबंध को टीप कर लिखूं तो. वन आवश्यक हैं:-
1. वायुमंडल की शुद्धि के लिए
2. जैव विविधता के लिए
3. जीवों के आवास के लिए
4. प्राकृतिक वाटरशेड हैं
5. आजीविका का साधन हैं
6. मिट्टी के निर्माण के लिए
7.भूमि कटाओ, बाढ़ को रोकने के लिए
8. मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए
9. मिट्टी की उर्वरकता के लिए, ह्यूमस के लिए
10. ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए
11. वर्षा के लिए
12. प्राणवायु ऑक्सीजन के लिए
13. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए
13 बिंदु सातवीं का बच्चा लिख सकता है वनों के महत्त्व पर.* फिर भी सरकारें चाहती हैं कि धन और राजस्व के लिए जंगल उजाड़े जाएँ. शायद पास के फायदे के लिए भविष्य तबाह करते जा रहे हैं.
(तस्वीरें: बक्सवाहा के हरे-भरे जंगल की, जिसे उजाड़ हीरे निकाले जाएंगे.)