Friday, February 8, 2013

...... कि जिंदा लम्हों की आवाज़ सुन सकूँ






                  माज़े से काट लाया हूँ ढेरों फुरसतें, जिससे कि जिंदा लम्हों की आवाज़ सुन सकूँ....बतिया लेता हूँ अपने से यूँ ही बैठे-बैठे, कि अबोला न हो जाये खुद से कहीं.....वैसे भी, तू ही रहती है मेरे भीतर, और बतियाता हमेशा मैं तुझसे ही हूँ! चल ख़त्म करता हूँ बात, ये खामखाँ ख्याल तो बुलबुलों कि तरह फूटते ही रहते हैं.



नियति ने माथे पे
उगा दी हैं कुछ झाड़ियाँ
और उनमें उगी हैं तेरी यादें!

टपक के गिरती है रोज़
तेरी इक याद,
....और चुभन से भर जाता हूँ मैं!



जब पतझड़ आखिरी बार पर फैलाएगा,
आखिरी सांस ले रही होगी धरती!

गुज़ारिश है,
तब भी न मिलना तुम मुझसे!



रूह से निकाल कुछ टुकड़े,
पन्ने कर देता हूँ लाल!

....और लोग अक्सर पूछ जाते हैं
'ऎसा अच्छा कंटेंट कहाँ से लाये?'



रात भर
जिस्म से खरोंचता रहा,
तेरे हर लम्स के धब्बे.

सुबह तक फिर भी
बची रही तू!
हर कोशिका छू के बैठी हो तुम.
खुद को खरोंचूं भी तो कितना!

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Happy Birthday Jagjit Singh.....

तुम्हारी आवाज़ से,
लफ़्ज़ों में भर जाते थे एहसास.

कितनी ही रातें,
तुम्हारे भरोसे तन्हा काटी हैं हमने!


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Pic: Mahabaleshwar

Wednesday, February 6, 2013

I Love You!


               
     
                    देखो, 'अहा! ज़िन्दगी' एक शब्द लिखने की एक अठन्नी देती है......तुमसे तो खामखाँ 'आई लव यू' बोल दिया....लिखता तो कम से कम डेढ़ रुपये तो कमाता.....अब देखो कल तक खुश था जिसके लिए, वो भी गम बन के आ गया सामने. वक़्त के साथ कब सही गलत, और कब गलत सही हो जाये, पता ही नहीं चलता!
                     अब ये मत कहना, तुम्हें समझ नहीं आया....ये साहित्यिक नहीं है. सीधे सीधे कहा है....बस.


Sunday, February 3, 2013

Nadiya Anjuman and her 'Light Blue Memories'


                   

             एक 25 बरस की लड़की जो तालिबानी शासन में भी हाई स्कूल तक पढ़ी और छुप छुप के साहित्य भी. जिसने लिखना चाहा और क्या खूब लिखा कि पहचानी गयी सारी दुनिया में. सिर्फ एक संग्रह जिसमें कुछ गज़लें थी और कुछ ताज़ा नज्में उसे शोहरत दे गया....और शायद साथ में ले के आया मौत भी......क्यूंकि उसने लिखने कि गुश्ताखी की थी, इसलिए पीट पीटकर मार दी गई. अफगानिस्तान में जन्मी 'नादिया अंजुमन' की शायद सबसे बड़ी गलती अफगानिस्तान में जन्म और तालीबान के साये में पलना था. तमाम मुश्किलों के बाद भी पढने बाली, और सार्थक नज्में लिखने बाली इस लड़की को उसके पति के परिवार बालों ने 2005 में पीट पीटकर मार दिया क्यूंकि उसने शायरी करने गुस्ताखी की थी.

अफगानिस्तान के दमनकारी समाज में जिस तरह की कविता लिखने का दुस्साहस अंजुमन ने किया उसके लिए इस्पाती हौसलों और यक़ीन की बुनियाद ज़रूरी थी. अफगानी स्त्रियों की सामाजिक परिस्थितियों को दुनिया के सम्मुख लाने वाली एक ख्यात पत्रकार क्रिस्टीना लैम्ब ने अपनी एक किताब में अंजुमन का ज़िक्र करते हुए लिखा है - "दोस्त बताते हैं की उसका (अंजुमन का) परिवार बेहद गुस्से में था की एक प्रेम और सौन्दर्य के बारे में लिखी एक औरत की कवितायेँ खौफ़नाक पशेमानी की वजह बनने जा रही थीं."

उनकी एक नज़्म का अंश--

"अगर मेरी किताब की आँखों में तुम पढ़ पाते हो सितारों को
 तो फ़क़त एक दास्तान है वो मेरे अनंत सपनों की ...  "


One Blog to Share-- 'Her Blue Print' 


'Light Blue Memories' is her very famous poem written after fall of Taliban. You can read its English translation  Here.

Saturday, February 2, 2013

banning of a film



           
                   किसी कंट्रोवर्सिअल सब्जेक्ट पर लिखना समझदारी नहीं होती, क्योंकि अनजाने में ही आप कई लोगों की भावनाएं आहत कर देते हैं, लेकिन इरादतन लोग कंट्रोवर्सी क्रिएट करें तो मेरा  और आपका गुस्सा वाजिब है. 'विश्वरूपम' देखिये शायद आप दूसरी बार भी देखना चाहें और इस देश की गंगा-जमुना संस्कृति (मिक्स कल्चर) पर गर्व भी महसूस करें.....और उनपर गुस्सा भी, जिन्होंने बेवजह इस फिल्म को हाशिये पे लाया है.
               ये पोस्ट आपके लिए है, और ये पोएम 'तमिल नाडू मुस्लिम मुन्नेत्र कज़ग्हम (TMMK) के लीडर 'जवाहिरुल्लाह' के लिए है जिन्होंने मज़हब की बिसात पे सियासी गोटियाँ बिछा इस फिल्म को रिलीज़ नहीं होने दिया. फिल्म देखिये, शायद आपको भी उसकी इस हरकत पे गुस्सा आये.


जब तुम्हारे बच्चे भी
बस्तों में
किताबों की जगह
ले जाने लगेंगे भर के बारूद.

जब तुम्हारी औरतों का भी
मज़हब नहीं रहेगा कोई,
सरे-आम पत्थरों से पीट-पीटकर
मार दी जाएँगी.
...और तुम्हारी बेटियों के
पढ़ने पे होगे सर कलम!

मज़हब की बिसात पे
सियासत की गोटियाँ बिछा
फिर क्या चिल्लापोगे तुम,
'बैन विश्वरूपम, 'बैन विश्वरूपम'??


Sunday, January 27, 2013

रंग


           
                         
                                 इंसान को पहना दो कपड़े, कभी भगवा कि जिससे बन जाये वो हिन्दू, तो कभी पहना दो हरे कि दिखने लगे मुस्लमान. दे दो कोई सा भी नाम, कभी कह दो उसे राम तो कभी कह दो अल्लाह.....और दे दो इन नामों की दुहाई....कभी दो चार 'अशोक सिंघल' हो जाते हैं यहाँ पैदा, तो कभी कुछ 'अकबरुद्दीन ओवैसी'...जो सरे बाज़ार दे देते हैं दुहाई, और मचा देते हैं शोर....विघटन कर देते हैं समाज का और इंसान, इंसान न हो, हो जाता है किसी एक मजहब का. मजहब, सुना था बचपन में, कि भाई-चारा फैलाता है.....अब लगता है, कत्लेआम करने का सबसे 'इजी' तरीका है ये.


                           सियासत ने कर दिए भाग, अब आतंक के भी हो गये दो-दो रंग, भगवा और हरा....और इस मुल्क के 'गृह मंत्री' चिल्लाने लगे नाम.....भूल गये कि, अगर मुल्क में आतंक है तो उससे निपटना है, सियासी ज़ामा पहना मतलब नहीं साधने हैं.....मुल्क के Z+ सुरक्षा में बैठे लोग नहीं मरेंगे.....मरेंगे हम....आम आदमी. 'पुअर मेंगो पीपल'.

Saturday, January 26, 2013

नक्सली

                 

                       
                              एक गाँव जहां से न तो गुजरतें हैं ज़िन्दगी के काफिले, न आपकी चकाचौंध, न ही तरक्की, न ही बिजली के खम्भे....या हैं भी तो बस खम्भे, बिजली नहीं....जहां तक नहीं पहुँचते 'क', ख' 'ग'....और न ही पढ़ाने बाले.....जहां के स्कूल उजड़े हैं और जहां के लोग भूखे-नंगे. एक अदब से पेट पर हाथ फेर अम्मा बोलती है 'बेटा पेट भरा है मेरा, आज तू खाले पेट भर.' तो चीख निकलती है आत्मा से. इसी गाँव के बारे में दो शब्द लिख दूं मैं तो आप क्या कहेंगे मुझे? नक्सली?? चलिए मैं नक्सली सही ....हमें नक्सली बनाने के बाद, अगर आपकी खुद्दारी जाग जाये तो 'मैन स्ट्रीम' में पंहुचा दो इन्हें ....फिर किसी भी पैमाने से सजायाफ्ता ठहरा दो हमें, हम तैयार हैं. 

Friday, January 25, 2013

इक नुक्कड़ : सफ़दर हाशमी




डर गयी सरकार कि, कोई जा रहा है भूखों नंगों के बीच, उन्हें समझाने हक की बात कर रहा है नुक्कड़ ( street play )....कहीं बहक न जाये लोग, मांग न ले अपना हक...कहीं भूखे-नंगों को भी न हो जाये एहसास हक का....तो भेज दिए कुछ लाठी लिए तामीलदार, और हुक्मरानों के तामीलदार गुलामों ने सरे बाज़ार कर दिया क़त्ल 'सफ़दर हाशमी' का. गिर पड़ी एक लाश, और गिर पड़ा एक जूनून. हुक्मरान खुश, मूक तमाशा देखते सरकार बहादुर खुश.....क्यूंकि जो आवाज़ उठी थी गिरा दी गयी....एक पेड़ जो सींचने चला था कई लोग, उखाड़ दिया गया!
              मैं नहीं हूँ सैफ़्रोन, न ही हरा और न ही लाल....फिर भी सफ़दर हाशमी पर पड़ा हर डंडा मुझे उन सभी के सीने पे पड़ता लगता है, जो चाहते हैं कुछ बदलना, चाहते है मुल्क की सलामियत और जो चाहते हैं, कि समाज में हो सके समरसता. आ सके लोग एक ही दर्जे तक. सफ़दर हाशमी का क़त्ल, सफ़दर का नहीं, इरादों का क़त्ल था. कोशिशों का क़त्ल था. ये हार थी हुक्मरानों की.....
            सत्ता को शायद नहीं पता, कि इरादे मरते नहीं हैं हैं और ना ही राहनुमा भी. कोई न कोई फिर कहेगा 'हल्ला बोल'.

'मुल्क कि बर्बर सत्ता,
ऑंखें घुमा के देख लो,
 इक सफ़दर मरा था जहां,
बीसियों सफ़दर खड़े हैं.'


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सैफ़्रोन, हरा, लाल- क्रमश: हिन्दू, मुस्लिम, कम्युनिज्म प्रतीक.



Thursday, January 24, 2013

तसकीर


तसकीर का क्या है.

ये तो तब भी नहीं होती,
जब तुम पास होते हो....
और तब भी नहीं,
जब दूरियां बेहद हों!



तसकीर-Satisfaction

Sunday, January 20, 2013

...On Kobad Ghandy


                         

                       लोगों ने छोड़ दिए रूरल मैनेजमेंट कॉलेज....उन्हें नहीं जाना गाँव वापिस, जहां की जमीन से वो निकले थे, धूल में खेले थे. उन्हें नहीं लौटना वहीं पर. उन्हें नहीं करनी समाज सेवा...उन्हें चाहिए है पैसा, ढेर सारा पैसा, जिससे गुजर कर सके वो एक शहजादे की तरह....रह सकें बंगलों में, वातानुकूलित घर, गाड़ी और ऑफिस में....नहीं चाहते वो कि कीचड़ और धूल उन्हें छू भी पाए....लेकिन कब तक भागोगे धूल से? एक न एक दिन मिलना ही है उसमें.
                         कोबाद घांदी, अक्सर सड़कों पे तन्हा जब में निकलता हूँ, तुम्हें याद करता हूँ. मुझे पता है मैं नहीं बन पाउँगा तुम्हारे जैसा, सिर्फ कुछ ही लोग पैदा होते हैं तुम्हारे जैसे....लेकिन कोशिशें जारी हैं...जब जीत जाऊंगा खुद से तो निकल पडूंगा तुम्हारी राह....राह जो धूल तक जाती है. मिट्टी में मिलने से पहले में मिट्टी तपाना चाहता हूँ....जिससे वो सोना बन सके.


Pic- A protest in New Zealand against Operation Green Hunt and the detention of Kobad Ghandy.

Friday, January 18, 2013

अमृता मत बनना 'शोना'....


             
               
                   देखो मैं इमरोज़ तो नहीं, कि अमृता (प्रीतम) के कहने अपनी पीठ पर गुदवा लूँगा साहिर (लुधियानवी) का नाम, जताने इश्क की रूहानियत....न कि साहिर हूँ, एक सारी  ज़िन्दगी रह लूँगा अकेला, तन्हा, इश्क की याद में, जो कभी न हुआ मेरा! जानता हूँ, तुम भी अमृता नहीं, की ताउम्र लिखते रहो, कहते रहो, उस इश्क के बारे में जो तुम्हारा न हो सका, लेकिन गुज़ार दो सारी उम्र किसी और के साथ एक घर में रहते हुए.....लेकिन जोड़ लो उपनाम (प्रीतम) अपने पहले पति का, और ता उम्रभर जानी जाओ उसी नाम से.
                  मुझे पता है, हम-तुम इनमें से कुछ भी नहीं, लेकिन फिर भी यहाँ दुहरा रहा हूँ साठ  साल पुरानी एक प्रेम कहानी, जिसमे इमरोज़ का इश्क रूहानियत है, साहिर का इश्क तनहा, और अमृता कभी कभी बेवसा लगती है मुझे, तो कभी कभी मतलबी, जो छोड़ आई अपना पहला पति दूसरे के खातिर, और हो भी न पाई दूजे की भी.... शायद, कहीं न कहीं महसूस होता है मुझे, कि मैं हूँ थोडा सा साहिर,  जो ताउम्र तुम्हारी याद में बिताएगा, तन्हा-तन्हा.....या शायद वो रूहानी आशिक इमरोज़ हूँ, जिसे इश्क सिर्फ पाना नहीं, जैसा है वैसे अपनाना भी था....या कि वो प्रीतम, जिसे इश्क न था किसी से, लेकिन समाज ने बना दिए कुछ कायदे और उसे चुकानी पड़ी उसकी कीमत....देखो मैं भी तो चुकाऊंगा कीमत समाज के बनाये बेहुदा उसूलों की.
                 लेकिन तुम क्या हो? अमृता?? नहीं, नहीं अमृता मत बनना 'शोना'....उम्र भर बेवसी में ज़िन्दगी तुमसे काटी न जाएगी!! ....और न ही मैं चाहता हूँ, कि तुम ठुकरा आओ किसी और को सिर्फ मेरे लिए.

Pic: Amrita-Imroz, 2004