Sunday, January 20, 2013

...On Kobad Ghandy


                         

                       लोगों ने छोड़ दिए रूरल मैनेजमेंट कॉलेज....उन्हें नहीं जाना गाँव वापिस, जहां की जमीन से वो निकले थे, धूल में खेले थे. उन्हें नहीं लौटना वहीं पर. उन्हें नहीं करनी समाज सेवा...उन्हें चाहिए है पैसा, ढेर सारा पैसा, जिससे गुजर कर सके वो एक शहजादे की तरह....रह सकें बंगलों में, वातानुकूलित घर, गाड़ी और ऑफिस में....नहीं चाहते वो कि कीचड़ और धूल उन्हें छू भी पाए....लेकिन कब तक भागोगे धूल से? एक न एक दिन मिलना ही है उसमें.
                         कोबाद घांदी, अक्सर सड़कों पे तन्हा जब में निकलता हूँ, तुम्हें याद करता हूँ. मुझे पता है मैं नहीं बन पाउँगा तुम्हारे जैसा, सिर्फ कुछ ही लोग पैदा होते हैं तुम्हारे जैसे....लेकिन कोशिशें जारी हैं...जब जीत जाऊंगा खुद से तो निकल पडूंगा तुम्हारी राह....राह जो धूल तक जाती है. मिट्टी में मिलने से पहले में मिट्टी तपाना चाहता हूँ....जिससे वो सोना बन सके.


Pic- A protest in New Zealand against Operation Green Hunt and the detention of Kobad Ghandy.

Friday, January 18, 2013

अमृता मत बनना 'शोना'....


             
               
                   देखो मैं इमरोज़ तो नहीं, कि अमृता (प्रीतम) के कहने अपनी पीठ पर गुदवा लूँगा साहिर (लुधियानवी) का नाम, जताने इश्क की रूहानियत....न कि साहिर हूँ, एक सारी  ज़िन्दगी रह लूँगा अकेला, तन्हा, इश्क की याद में, जो कभी न हुआ मेरा! जानता हूँ, तुम भी अमृता नहीं, की ताउम्र लिखते रहो, कहते रहो, उस इश्क के बारे में जो तुम्हारा न हो सका, लेकिन गुज़ार दो सारी उम्र किसी और के साथ एक घर में रहते हुए.....लेकिन जोड़ लो उपनाम (प्रीतम) अपने पहले पति का, और ता उम्रभर जानी जाओ उसी नाम से.
                  मुझे पता है, हम-तुम इनमें से कुछ भी नहीं, लेकिन फिर भी यहाँ दुहरा रहा हूँ साठ  साल पुरानी एक प्रेम कहानी, जिसमे इमरोज़ का इश्क रूहानियत है, साहिर का इश्क तनहा, और अमृता कभी कभी बेवसा लगती है मुझे, तो कभी कभी मतलबी, जो छोड़ आई अपना पहला पति दूसरे के खातिर, और हो भी न पाई दूजे की भी.... शायद, कहीं न कहीं महसूस होता है मुझे, कि मैं हूँ थोडा सा साहिर,  जो ताउम्र तुम्हारी याद में बिताएगा, तन्हा-तन्हा.....या शायद वो रूहानी आशिक इमरोज़ हूँ, जिसे इश्क सिर्फ पाना नहीं, जैसा है वैसे अपनाना भी था....या कि वो प्रीतम, जिसे इश्क न था किसी से, लेकिन समाज ने बना दिए कुछ कायदे और उसे चुकानी पड़ी उसकी कीमत....देखो मैं भी तो चुकाऊंगा कीमत समाज के बनाये बेहुदा उसूलों की.
                 लेकिन तुम क्या हो? अमृता?? नहीं, नहीं अमृता मत बनना 'शोना'....उम्र भर बेवसी में ज़िन्दगी तुमसे काटी न जाएगी!! ....और न ही मैं चाहता हूँ, कि तुम ठुकरा आओ किसी और को सिर्फ मेरे लिए.

Pic: Amrita-Imroz, 2004

Sunday, January 13, 2013

कपड़े पहिन लेने से बन्दर इन्सान थोड़ी न बन जाता है!


             कि उठा ली गयी बंदूकें, सत्ता के खिलाफ लड़ने के लिए...क्यूंकि सत्ता को फ़िक्र नहीं भूखों-नंगों की, सत्ता ने दिया है उन्हें एक नाम 'शेडूल ट्राइब्स', जिनके पास थे जंगल....फिर धीरे धीरे किया उनका विकास....जिसमें वो रहे तो भूखे और  नंगे ही लेकिन जंगल में न रहे...क्यूंकि रहने को बचने न दिए गये जंगल. फिर हुआ एक शोर, हाथों में थम गयी बंदूकें, लड़ गये लोग....दबाने आवाजें आ गयी सरकार....जंग जारी है, देखते हैं जीतता कौन है. भूखे-नंगे लोग या चमकती सरकार....या इन दोनों के बीच पिस रही आम अवाम, जिसे पीस जाती है कभी सरकार तो कभी लाल सलाम!!
                      तमाशा नहीं है ये कोई, फिर भी चल रहा है 45 बरस से.....और चलने दे रही है सरकार.



             कुछ बा-अक्ल बंदरों ने कर ली तरक्की, पहिन लिए कपड़े, बना लिए घर, फिर समाज और फिर मुल्क....बाँट ली ज़र-जमीन और फिर सकेरने बना दी सरहदें....बंदरों ने सरहदें बचाने रख दिए पहरेदार! अब कुछ बन्दर करते हैं सियासी हरकतें, समेटने ज़र-जमीन  और सरहदों पे मरते हैं पहरेदार.
          लोग कहते हैं बंदरों ने कर ली तरक्की....लेकिन चन्द कपड़े पहिन लेने से बन्दर इन्सान थोड़ी न बन जाता है!



            'तुम्हें पता है, एक रात में नहीं बदलता सब कुछ, न ही उगते हैं पेड़ पर पैसे'.....तुम्हारी बात मान कर लिया इंतज़ार, कुल 65 साल करवटें बदल-बदल निकाल दी रातें, कि कहीं न कहीं से बदलेगा कुछ और लगा दिया जिस्म, खरोच दी रूह, क्यूंकि पैसा पेड़ पे नहीं उगता. पूरे 65 साल बाद भी मेरा वजूद वहीँ हैं....अब मत कहो. 'थोडा इंतज़ार और करो.'  हड्डियों से खड्ग बना उखाड़ फेंकूंगा एक दिन.


खामखाँ ख्याल


               सुना है, सिर्फ पानी पे ग्यारह दिन रह सकता है आदमी जिंदा, लेकिन बिन सोये छ: दिन भी नहीं....खुदा, या तो तू दुनिया की हालत देख कई रात नहीं सोया होगा....तो अब तक तो मर गया है....या कर कोशिशें पूरी, बदतर हालात नहीं सुधरेंगे सोचकर, सो रहा है चैन की नींद!


             ट्रैफिक जाम में कांदिवली से ट्रेन पकड़ने जब मैं उस दिन गुजरा महानगर की संकरी गलियों से पैदल, जहां संकरी सड़क पे नंगे बच्चे खेल रहे थे कोई सा खेल, जहां घर के नाम पे पड़े थे चार पत्थर, लिपटे थे पोलिथिन की 'छत' से, तंग गली से गुजर न पा रही थी छोटी साइकिल....तो फिर चौड़ी सड़क पर कार में घूमना बेमानी लगता रहा कई दिन! मैं नहीं कहता खुदा, तूने 'सोशल डिसकिर्पेंसी' क्यूँ  बनाई, लेकिन इतनी ज्यादा भी क्यों?


            बचपन में एरोप्लेन देख बजाते थे तालियाँ, भागते थे भीतर से बाहर तक, देखने एरोप्लेन....अब उसमें बैठना भी नहीं लगता अचम्भा. ऐसा नहीं है, सारे गाँव के हालात सुधर गये हैं, उन्हें भी नहीं लगता अचम्भा. हालात मेरे सुधरे हैं, अभी 5000 लोगो के सुधारना बाकी हैं. दिल्ली के कानों में कहो कोई, कि तरक्की करना अभी बाकी है.



             तुम्हें कभी समझ नहीं आयेगा की रात रात भर जागना क्या होता है....वो भी बिना किसी वजह के. 'इश्क में लिप्त तुम्हें कहीं दिखता तो होगा मेरा मासूम सा चेहरा...जो बिना कुछ कहे-सुने ही चुपचाप निकल जाता होगा आँखों के सामने से....और एक पल पलक झपकाना भूल जाते होगे तुम'.....यही, यही सोचना होती है, मेरे रात भर जागने की वजह...लोग कहते हैं, ये भी कोई वजह है!?!


          क्यों कर इंसान सरे बाज़ार चिल्लाता  है मज़हबी बकवास, और क्यूँ कर लोग तालियाँ पीट पीटकर उसकी करते हैं तरफदारी....क्यों कर सरे आम लोग हो जाते है उद्वेलित, फिर क्यों कर हो जाते हैं दंगे.....कल शाम दंगे के बाद एक लाश से पूछा था मैंने....'मुझे क्या पता, मरने के बाद इंसान का मज़हब नहीं होता.' .....ये बड़ा अजीब सा जबाब दिया उसने!


           कुछ लोग कर लेते हैं बेअक्ल बातें, कुछ अनपढ़ उन्हें ठहरा देते हैं संत...फिर वो देश को समझ लेते हैं अपनी जागीर.....और सरे आम खोलते हैं जुबां....जिसका कोई सरोकार नहीं.
                       कब तक तुम मोक्ष पाने की आशा में 'आशाराम' बनाते रहोगे? लगता है 'जागो, ग्राहक जागो' की तरह, एक इश्तिहार 'जागो, अवाम जागो' का भी देना पड़ेगा.  
                      क्या तुम जागोगे अवाम? 

Wednesday, January 2, 2013

'चल रंग भर दूं!' Happy New Year :)




वक़्त के तागे
काट दे माज़े से.
कुछ चुरा ले रंग
देख बिखरे पड़े हैं,
जैसे किसी ने अँधेरी रात में हज़ार तारे बिखेरे हों
अँधेरा मिटाने!

देख ये लम्हा भी फिसल गया
रूखा रूखा सा.
चल ज़रा मुस्कुरा दे.
मातम को जुराबों संग
पहन लेते हैं...
घिसता रहेगा, चलते रहेंगे हम.

चल तेरी आँखों से
गम की फसल काट
भर देते हैं कुछ खुशियाँ.
फिर तू ताकना,
दुनिया रंगीन दिखेगी.

देख तुझे समझाते समझाते
लिख दी
ये ऊट-पटांग सी नज़्म!
अब तो मुस्कुरा दे....
चल, ये नज़्म भी तुझे  दी!


*
तागे- धागे

Pic: New year, New Rays @Mahabaleshwar

Monday, December 24, 2012

इश्क के दो रंग





पहला रंग इश्क का--- नीला-नीला......

वो सर्दी की इक शाम थी. वो ट्रेन से उतरता है,  टैक्सी लेकर सीधे बताये पते पर. 

' आ गये तुम?' वो देखकर उससे पूछती है.
'चैम्प, मैं तुझे एक घंटे से ढूंढ रहा हूँ.'
'अरे शादी बाले घर में आया है, लड़की इतनी जल्दी थोड़ी न दिखेगी.'
'पगली तुझे इतनी ठंड में शादी करने की क्या ज़रूरत थी, देख कुल्फी जम रही है.'
'हा हा हा, साल्ले शादी का मुहूर्त ठण्ड देखकर नहीं निकलता... वाय द वे थैंक्स, दो दिन पहले आने के लिए.'
'हाँ, अब थैंक्स भी बोल ले, दोस्ती तेरे पापा निभाएंगे. कंपनी छुट्टी कहाँ दे रही थी, जैसे-तैसे लेकर आया हूँ.'
'हाँ, तेरी सीनियर थी मैं, मुझे पढ़ा रहा है, 21 छुट्टी पढ़ी थी अकाउंट में, क्यूँ नहीं मिलती.'
'चल छोड़, जल्दी आने का एहसान तो मान नहीं रही है, ऊपर से अंकल ने आते ही काम पे लगा दिया.'
'हा हा हा, अब मेरी शादी में तुझे ही तो सब करना है.'

वो उसकी आँखों में देखता है....ज़रा गहराई से...छत पर उनके अलावा कोई नहीं है. 
'तू खुश तो है न चैम्प?'
'हाँ न रे, देख लड़का MNC में है, पैकेज मस्त है, और फिर पुणे में ही है. वीकेंड पे तू भी मेरे घर आ जाना, हम तीनों खूब मस्ती करेंगे.'
'मैंने ने हैदराबाद ट्रान्सफर के लिए अप्लाई किया है.' वो धीरे से बोलता है.
'क्यूँ?'
'तुम नहीं समझोगी दिशा.'
'मैं समझती हूँ विशु.'
'तो तुमने कभी बोला क्यूँ नहीं?'
'देख लड़के बोलते हैं लडकियां नहीं....और वैसे भी तेरी वो इश्क की केमिकल लोचे बाली थ्योरी, टेस्तेरोन-एस्ट्रोजन और पता नहीं जाने क्या-क्या...फिर तू हमेशा ही तो अपनी एक्स के बारे में बोलता रहता था...मैं क्या बोलती. तू बोल सकता था, वैसे भी लड़के ही हमेशा बोलते हैं.'
'चैम्प, नालायक, कोई रूल है क्या, की लड़के ही हमेशा बोलेंगे...और वैसे भी तू कौन सा कम थी, तू भी अपनी थ्योरी देती थी, कि लड़के को लड़की से ज्यादा कमाना चाहिए, अच्छा पैकेज, अच्छी  फॅमिली, गुड लाइफ स्टाइल और जाने क्या क्या....और फिर मैं तेरे से दो साल छोटा भी तो हूँ, ऊपर से ऑफिस में भी तू मेरी सीनियर. तू वैसे भी बहुत मटेरियालिस्टिक है.'
'हाँ और तू सबसे बड़ा चैम्प, साल्ले गाड़ी तो चला नहीं पता, मम्मा'स बॉय...और ऊपर से तेरी एक्स की कहानियां सुनते सुनते पक गयी थी. एक बार भी तू उससे बाहर निकला होता तो सोचती भी.'
'अरे तो मुझे सच में उससे प्यार था, और वैसे भी तुझे कम्फर्ट बनाने के लिए उसकी कहानी सुनाया करता था, नहीं तो तुझे लगता मैं भी औरों की तरह लाइन मारने लगा हूँ.'
'रहने दे, अब क्या मिल गया तुझे, साले मेरी शादी है 48 घंटे में...और कोई फिल्म तो चल नहीं रही है की मैं मंडप से भाग जाउंगी.'
'हाँ तो मैं बोल भी नहीं रहा हूँ.' 
वो उसे हग करती है....वो निःशब्द है.....शायद थोडा खुश भी, अपने दिल की बात कह ली.
'तू बाइक भी नहीं चला पाता.'
'और तू वोमिट करने तक पीती है.'
हा हा हा.........दोनों जोर से हँसते हैं. वो बेहद ठंडी शाम में भी गर्मी महसूस करता है....
कुछ लव स्टोरीज अधूरी ही ज्यादा अच्छी लगती हैं. 


            ----*****----


दूसरा रंग इश्क का--हरा-हरा........

'तुम अजीब हो यार, तुम्हें ये सब करने की क्या ज़रूरत है....वो जैसे भाग गया है, तुम भी भाग जाओ. मुझे किसी के एहसान की कोई ज़रूरत नहीं है.'
'मैं तुमपे कोई एहसान नहीं कर रहा हूँ, बस मुझे जो सही लग रहा है वही कर रहा हूँ.'
'तुम्हें पता है न,मैं अवोर्शन चाहती हूँ, फिर तुम क्यूँ मुझे और इस बच्चे को अपनाना चाहते हो? यार मैं मरना चाहती हूँ.'
'हाँ, वो तो तूने कोशिश कर ही ली, अब पड़ी हो न बेड पे और बाहर तेरे पापा मम्मी परेशान खड़े हैं. बेवकूफ हो तुम...क्या मिल गया ये सब करके?'
'मैं उससे प्यार करती थी, अब किसके लिए जियूं?'
'बचपन से अबतक किसके लिए जी रही थी? कमीनी है तू, सच में, तुझे वही दिखा, आज तक मैं नहीं दिखा? अपने माँ-बाप नहीं दिखे ?' वो गुस्से से बोलता है.
'मैं उससे प्यार किया था, आशु.'
'और मैंने तुमसे दिव्या...आज तक तुम्हे समझ नहीं आया? अपने लिए न सही इस बार मेरे लिए जी लो.'
वो उसके सर पे धीरे धीरे हाथ फेर रहा है...दिव्या की आँखों में आंसू हैं.
मौसम में नमीं बढ़ गयी है, और सूरज ज़रा तेज़ चमकने लगा है.

'हम इस बच्चे का नाम दिव्यात्री रखेंगे.' वो धीरे से बोलता है.

Friday, December 21, 2012

.....खुदा कहीं गुम सा हो गया है!



                             
                                          "यार क्या पढ़ रहे हो?" वो पीछे से पूछती है...."इंडियन इकॉनमी"...."ह्म्म्म मुझे भी पढाओ."...मैं चुपचाप उसे पढ़ाने लगता हूँ. ये किताबों  से मम्मी ने बचपन में दोस्ती क्या कराई...अब लत सी हो गयी है. ऑफिस में खाली टाइम में कुछ न कुछ पढ़ता रहता हूँ. कभी इकॉनमी से वास्ता होता है तो कभी 'पाउलो काल्हो' से तो कभी 'हथकड़' बाले किशोर भाईसाब 'चौराहे पर सीढियां' लेकर पीछे पड़  जाते हैं. खैर, मैं शुरू हो जाता हूँ...."मैं पूछना चाहती हूँ...यार जब WTO ने तक रिव्यू दिया की हम 10 की 'ग्रोथ' कभी 'रीच' नही कर पाएंगे तो हमने ऐसा ऐम ही क्यों रखा? अवर PM इज़ एन इकोनॉमिस्ट ना?"....मैं कुछ नहीं बोलता हूँ........साल्ला फेंकने में क्या जाता है....सरकार कुछ भी फेंक दे...कौन सा सल्ला साफ़ पानी 65 साल में घर तक पहुंचा है जो सब कुछ उनके बोलने से ठीक होना है....वैसे भी आपका CV आपके समझदार होने की निशानी नहीं है.....कैम्ब्रिज, हॉवर्ड ने देश को बहुत से मुर्ख दिए हैं..... खैर उसे बहुत सी चीज़े समझ नहीं आती, कि क्यूँ  68% लोग 2 डॉलर से कम कमा रहे हैं फिर भी हमारी इकॉनमी इतनी तेजी से कैसे बढ़ रही है....40% बेरोजगारी है फिर भी हम कुछ कर क्यूँ नहीं रहे हैं.....और भी जाने क्या-क्या. वैसे समझ तो मुझे भी नहीं आया....और आप नार्मल हैं तो आप को भी नहीं आयेगा...कि देश किसके भरोसे चल रहा है.

                     वो 'ऑफिस कम्यूनिकेटर' पे चैट करता है....."यार तीन दिन से सो नहीं पा रहा हूँ.... दिमाग में वही देल्ही-रेप केस चल रहा ही....उस बंदी की क्या गलती थी....हमारी उम्र की ही है यार!''.....खुदा कहीं गुम सा हो गया है....ना तो हँसता है ना तो रोता है....'हैती' के लोगों के भूख से मरने से देल्ही में रेप तक उसे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता....जैसे साल्ला एक प्रोगाम हैंग हो के बैठ गया हो......"यार विव, तंग आ गया हूँ मैं, एक पॉएम लिखी है इस पे....सुनेगा? यार यहाँ बैठे बैठे तो मैं बस यही कर सकता हूँ."......मुझे 'रंग दे बसंती' के 'डायलाग' याद आते हैं.....'कॉलेज के इस तरफ तुम ज़िन्दगी नचाते हो, उस तरफ ज़िन्दगी तुम्हें......' कभी कभी हम कितना बेवस महसूस करते हैं...."एक इन्सान जानवर बन सकता है लेकिन 6 -6 लोग एक साथ जानवर कैसे बन जाते हैं...समझ नहीं आता." हमारी चैट पढ़ रही वो पीछे से बोलती है. मेरे पास जवाब नहीं है.

--***--


लगता है
जिस्म से रूह निकाल
भर दूं कुछ 'प्रोग्राम'.
कुछ इश्क,
कुछ आदमियत,
कुछ नियत.

ख़ुदा के 'प्रोग्राम' में
'वायरस' है कोई.
उम्र के साथ रूह
बेईमान बहुत हो जाती है!

                                   ~V!Vs


                   

Sunday, December 16, 2012

Poetry of a Software Engineer :-)


 औंधी पड़ी हसरतों को
समेटता हूँ
तो लगता है
एक 'प्रोग्राम' इन्हें पूरा करने भी
बना पाता.

पूछता हूँ,
ख़ुदा को कहीं
हसरतें बनाने बाले 'सॉफ्टवेर इंजीनियर' की
ज़रुरत तो नहीं!


--***--

लगता है
जिस्म से रूह निकाल
भर दूं कुछ 'प्रोग्राम'.
कुछ इश्क,
कुछ आदमियत,
कुछ नियत.

ख़ुदा के 'प्रोग्राम' में
'वायरस' है कोई.
उम्र के साथ रूह
बेईमान बहुत हो जाती है!


Saturday, December 15, 2012

इस बार लिफ़ाफ़े में..........



हर शब जब कोई करीब नहीं रहता तो कुछ सबब रहते हैं पास....कुछ ख्याल और इक मिरी परछाई....खोजते खोजते उससे ही बतिया लेता हूँ....कितने लोग शैतान से लड़े और याद बन गये....कभी खुद से भी लड़े होते तो शायद शैतान से न लड़ना पड़ता. अपने से बतियाना बड़ा मुश्किल है....अपने से लड़ना उससे भी ज्यादा.

--***--


ज़िन्दगी 'इकॉनोमी' है तो

कुल सत्तर लोग कमाए हैं
मैंने कब्र तक चलने बाले.

देखो, कुछ कम तो नहीं!


--***--


देखो हर दरख़्त के 
पीछे 
एक नज़्म टिका के
रखी है मैंने.
रास्ता भूल जाओ तो
थाम के आ जाना.

--***--


इस बार लिफ़ाफ़े में

रूह ही रख भेजी है.
अब मत कहना
मैं 'लेटर' नहीं लिखता.

पढ़ लो, जितना पढ़ पाओ.


--***--


रात बड़ी काली सी है,

मेरा चाँद मुआं जाने कहाँ छुपा है.

तू आ जा,

बड़े दिन हुए यहाँ चांदनी नही खिली.

--***--


अलमारी पे चिपका रखी थी

तेरी 'फोटू',
आज लौटा तो फर्श पे मिली पड़ी.

कुछ हुआ क्या?

तेरे अरमां भी जमीदोंज हुए क्या?

--***--


ये नज़्म, ये शायरी, तेरा क्या?

लहू बहा मेरा, तेरा क्या?

अपने से मत पूछना ये सब.

तेरी नम आँखें अच्छी नहीं लगती.

--***--


अक्सर ये हो जाता है,

तू साथ नहीं होती तो
मेरा वजूद,
मुझसे अपनी पहचान पूछ जाता है.

--***--


शैतानियत बनाई थी ख़ुदा ने,

अब उलझा है
शैतान नर्क में धकेलने.

कुछ तो अपने कामों में

'परफेक्शन' ला खुदा!

--***--


देश मुझे लगे अबला,

जिसपर
रातभर मनमानी किया,
सुबह नेता चिल्लाता उठा-
जम्हूरियत है, जम्हूरियत है, जम्हूरियत है!!

Friday, December 7, 2012

रूह को किनारे रख....




बड़ी बड़ी साफ़ चौड़ी सड़के, गार्डन्स, हर कोने पे डस्टबिन, टेनिस कोर्ट, क्रिकेट ग्राउंड ....यहाँ* आकर लगता है जैसे किसी नई सी दुनिया में अ गये हों, जो शायद 'भारत' नहीं 'इंडिया' है.....लेकिन एक उदासी खाकसार सी फिर भी चिपक जाती है......कभी कभी ही सही. लेकिन ये कभी-कभी भी महीने में दो-चार रोज़ ज़रूर होता है. शायद इस जानिब आकर भी उस जानिब की किस्सागोई याद रह ही जाती है.

--***--

हर शब
ख्याल जब
दिन का सफ़र कर,
कागज पे उतरने बैचैनी से
छटपटाते हैं.
नंगे बदन कोई
रोटी जुगाड़ता है कहीं.

रूह को किनारे रख,
इस हालत से इश्क
ज्यादा नहीं होगा.....
उस जानिब से जब
'रिफ्लेक्ट' कर आएगा सच
तुम भी देखना
इस उदासी को कितना धकेलते हैं हम.

तुमही तो कहते थे खुदा
'बड़ी खूबसूरत बना दी दुनिया मैंने.'
'रेड लाइट' पे भीख मांगते
मासूम देख लगता है
अभी कुछ बाकी रह गया.

हर शब
कागज़ पे उतरता हूँ ख्याल
तो लगता है-
मैं 'परफेक्ट' नहीं.
खुदा तू भी तो 'परफेक्ट' नहीं!!


चल इस आड़ी-टेड़ी दुनिया को
मिलकर ठीक  करते हैं.


                                     ~V!Vs
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Pic- Painting by  Francoise Nielly
Infosys Campus, Pune