सावन
सावन क्या है?
बूँदें बरसें तो
लहराते पेड़, उमड़ती खुशियाँ.
ना बरसें तो
ठूंठ और शोक की कविता.
कविता
कविता क्या है?
बस वो शब्द नहीं,
जो कह दिए गये.
कविता है,
शब्दों से निकले कुछ मौन अर्थ भी.
...और कुछ अनकहे शब्द भी.
अनकहे शब्द
अनकहे शब्द,
अभिव्यक्त से अधिक कठोर हैं.
एक मौन में कथनों से ज्यादा शोर है!
शोर
शोर क्या है?
किसी सत्य पर हा-हाकार
या मौन सत्य की चीत्कार?
सड़कों पर चक्केजाम, नारेबाजी शोर है
तो अस्मिता लुटने के बाद की चुप्पी क्या है?
सत्य/ख्वाव
सत्य क्या है?
सपनों का धरातल पर उतरना
या कुछ ख्वावों का कभी पूरा ना होना?
ख्वाब सभी को प्यारे हैं,
पूरे कितने ख्वाब तुम्हारे हैं....?
मेरे तो कई अधूरे हैं......
जैसे तुम!!
~V!Vs ***
प्यार करना बहुत ही सहज है, जैसे कि ज़ुल्म को झेलते हुए ख़ुद को लड़ाई के लिए तैयार करना. -पाश
Wednesday, August 18, 2010
Saturday, August 14, 2010
Monday, August 2, 2010
Ishq
(Few words are enough to describe feelings, LOVE or ink from whole world is unable to describe; both things are true.
I hope these few three liners are capable to show feelings, thats why im writing. I hope you will like these 'TRIVENIs')
.......
.......
लड़की, लड़की कह चिड़ाने लगे हैं लोग.
लगता है मेरे जिस्म से भी अब तेरी खुशबू आती है.
.......
मैं खुश हूँ कलम तो साथ है मेरे.
शुक्र है नज्में ख़ूनी नहीं होती.
.......
तेरे दिए ज़ख्म इतने बुरे भी नहीं,
चलो अच्छा है दूर से पहचान लेंगे लोग.
सुना है लाल रंग बड़ी दूर से दिखता है.
........
टपकती छट ने सारा बिस्तर भिगो दिया,
फिर भी ये मौसम सुहाना लगता है.
मेरे आँसू कोई नहीं पहचान पाता बारिश में!
........
पहाड़ दूर से देखा, बहुत सुन्दर था,
पास गये, पैरों में फफोले पड़ गये.
तू दूर है तो अच्छा है!!
.......
यूँ ना गम के आँसू बहाव आशिक,
कलम में डुबा कुछ उकेर दो इनसे.
सुना है दर्द में नज्में खूबसूरत बनती हैं.
~V!Vs **
Friday, July 30, 2010
Saturday, July 17, 2010
घर
बड़ी टीस से चुभते हैं ये नींव के पत्थर,
न मोटी दीवारें फांद सका है कोई और.
तुमने दिल में पक्का घर क्यों बनाया था?
Monday, July 12, 2010
Tuesday, July 6, 2010
सावन
चलो इस सावन में सभी भीग लो.
अच्छा है वह अल्लाह-राम का नाम ले
नहीं बरसता.
गिरने से पहले बूँदें
हमारी जात नहीं पूंछती.
होली के रंग जैसे
उसके छींटे सिर्फ चंद लोगों पे नहीं पड़ते.
ना ही वह रंग-भेद करता है.
चलो अच्छा है,
पानी तो हमें एक कर देता है.
तुम्हारे शरीर से बह बूंदें,
दुसरे को छूती हैं
तो जात नहीं पूंछती.
चलो अच्छा है,
हम सावन में तो साथ भीग सकते हैं.
बिना जात-पात के,
बिना रंग-भेद के,
बिना अमीरी के,
गरीबी के.
चलो इस सावन में सभी भीग लो,
क्या पता अगला जात पूंछ कर आये.
क्या पता,
सरकारें उसे भी सरहद की तरह बाँट दें.
जात-पात समझने लगे सावन,
उससे पहले ही
इस बार भीग लो.
अगली बारिश शायद तुम्हारी जात बालों को ना हुई तो!!!
अच्छा है वह अल्लाह-राम का नाम ले
नहीं बरसता.
गिरने से पहले बूँदें
हमारी जात नहीं पूंछती.
होली के रंग जैसे
उसके छींटे सिर्फ चंद लोगों पे नहीं पड़ते.
ना ही वह रंग-भेद करता है.
चलो अच्छा है,
पानी तो हमें एक कर देता है.
तुम्हारे शरीर से बह बूंदें,
दुसरे को छूती हैं
तो जात नहीं पूंछती.
चलो अच्छा है,
हम सावन में तो साथ भीग सकते हैं.
बिना जात-पात के,
बिना रंग-भेद के,
बिना अमीरी के,
गरीबी के.
चलो इस सावन में सभी भीग लो,
क्या पता अगला जात पूंछ कर आये.
क्या पता,
सरकारें उसे भी सरहद की तरह बाँट दें.
जात-पात समझने लगे सावन,
उससे पहले ही
इस बार भीग लो.
अगली बारिश शायद तुम्हारी जात बालों को ना हुई तो!!!
Sunday, June 20, 2010
Happy Father's Day.......:))
मैं और मेरे पिता
पिता की आँखें,
वो दीर्घ में देखती आँखें.
आँखों में पलता सपना-
की पाऊं में सफलता.
उन्होंने जो किया संघर्ष,
वो न करना पड़े मुझे!
लड़ना न पड़े मुझे.
मैं-नालायक
संघर्ष नीयति मान करता हूँ.
अपना सपना पाल
खुद के लिए लड़ता हूँ.
अब,
हमारे सपने टकरा गये.
उनका सपना दीर्घ, मेरा सपना शुन्य,
उनकी नज़र में यह बूँद!!
मैं जीते या वो, नहीं पता.
पर मैं सफलता पा गया,
पा के इठला गया.
मैं सोचता हूँ,
वो देखते-मैं कितना खुश हूँ,
अपना सपना साकार कर,
पा सफलता अपने आधार पर.
वो सोचते हैं,
काश! बेटा देखे,
वो खुश हैं, उसकी लगन से,
उसने पाया, जो चाहा मन से.
लेकिन,
मैं दुखी हूँ, उनका सपना न साकार कर,
वो दुखी हैं, सपने थोपने के आधार पर.
हम,
खुश हैं,भीतर से,
दुखी, बाहर से.
मैं, पिता और ये अटूट बंधन,
हँसता, इठलाता ये जीवन.
Tuesday, June 8, 2010
क्यों.... क्यों गये हो इतने दूर?
कानों में,
आज भी गूंजती है
तुम्हारी आवाज़.
फेफड़ों को छलनी कर जाती है,
हवा संग बह
तुम्हारी खुशबू.
इतनी दूर क्यों गये मुझसे,
कि जेहन में भी
धुंधला गये हो तुम.
आज भी,
सांझ ढले लगता है
जैसे तुम,
जला जाओगे बत्तियां.
कर जाओगे रोशन
हमारा घर,
सपनों का घर.
आज,
हर सपना, हर महल
खंडहर सा लगता है,
तुम्हारे बिना.
खुद में जकड़ा सा,
दर्द में बुझा-बुझा
महसूस करता हूँ.
मैं नहीं करता रोशन
अपना घर,
इतनी हिम्मत ही नही होती मेरी.
तन्हाई में
रोता हूँ मैं,
चंद नवेली साँसों के लिए.
तब लगता है
वैसे ही,
पीछे से आ
तुम थाम लोगे मेरे कंधे.
फिर हाथों में हाथ ले
दिखा दोगे मुझे राह,
बना दोगे सड़कें,
या खुद ही बन जाओगे मंजिल.
क्यों....
क्यों गये हो इतने दूर?
कि पथरा गईं हैं मेरी आँखें,
तुम्हारी बाट जोहते-जोहते.
वो सड़क,
जहाँ हर सुबह
हम उन्मुक्त घुमा करते थे,
वर्षों से वैसे पड़ी है.
अब तो पत्तों ने भी,
झड़-झड़ कर
उसपर मोटी परत बना ली है.
कूड़े का,
लम्बा ढेर लगती है दूर से.
क्यों,
क्यों चले गये इतने दूर?
कि वापसी की
हर राह तुम्हें बिसर गई?
तुम्हें लौटता ना देख,
भूलना चाहता हूँ मैं.
पर उन्मुक्त आस बन,
फिर-फिर आ जाते हो,
मेरे पास.
इतने दूर गये हो तुम,
कि शायद ना आ सको लौटकर.
फिर भी मेरा दिल
यह मानने तैयार नहीं.
तुम जिंदा रहोगे,
हमेशा मेरे मन में,
जेहन में.
Friday, May 28, 2010
बुढ़ापा
तब.....
मैं उसे,
कभी बेटू, कभी छोटू,
कभी चिल्ड, कभी शैतान,
कभी प्यारे, कभी दुलारे,
कह के बुलाता था,
और वो दौड़ा चला आता था.
अब....
वो मुझे,
कभी बुड्ढ़े, कभी ओल्डी,
कभी बापू, कभी दद्दू,
कभी निकम्मे,कभी पागल,
बुलाता है,
और मैं दौड़ा चला आता हूँ ,
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