Saturday, April 4, 2015

हिन्दी-नाटक | नाट्य-भाषा

नाटक या नाट्य में प्रयुक्त भाषा को नाट्यभाषा कहते हैं। भरत के अनुसार नाट्य या नाटक वह है जो लोकस्वभाव को अंगादि के अभिनय की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है। अभिनवगुप्त के अनुसार नाट्य नटनीय नर्तन है। इससे स्पष्ट है कि भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नाट्य और नृत्य में अभिनय की आवश्यकता है। दोनों की अपनी मुखोच्चरित भाषा होती है। नृत्य में गीतों की प्रमुखता रहती है तो नाटक में गद्य और पद्य की सहायता से (आधुनिक संदर्भ में) भावाभिव्यक्ति की जाती है। मूल रूप से दोनों सुंदर कला रूप हैं। नर्तक या नर्तकी नृत्य में नृत्यभाषा का इस्तेमाल करते तो नाटक में नट या नटी नाट्यभाषा से अपनी विचाराभिव्यक्ति करते हैं। इन दोनों की शारीरिक भाषा लगभग एक ही है यद्यपि नृत्य की शरीरभाषा में संकीर्णता है। यह सुव्यक्त है कि नृत्य और नाट्य का अर्थ शास्त्र द्वारा पूर्वनिर्धारित होने से अत्यधिक संकेतित है। इस प्रकारछोटे-मोटे भेदों के होने पर भी नृत्य और नाट्य परस्पर बहुत अधिक संबंध रखते हैं।
आचार्य भरत और अभिनवगुप्त के मंतव्यों को और स्पष्ट करते हुए वेदबन्धुताण्डवलक्षणमें नृत्य को नाट्य से अलग नहीं मानते। उन्होंने कहा कि भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नृत्यनाट्य का एक अंग है। भरत के व्याख्याताओं ने नाट्य और नृत्य को एक ही कलारूप बताया है। भरत के व्याख्याता हर्ष ने बताया कि रसों और भावों को व्यंजित आँखोंकपोलोंओष्ठों और अन्य अंगों का पूर्ण या अपूर्ण अनुकरण ही नाट्य तथा नृत्य में होता है। इसलिए नाट्य एवं नृत्य को परस्पर कैसे अलग कर सकते हैं ‘ भट्टतौत और भट्टलोलट ने भी कहा है कि नाट्य ही नृत्य है। तात्पर्य यह है कि नृत्य एक प्रकार का नाट्य ही है।” यदि आचार्यों के द्वारा नाट्य और नृत्य अलग-अलग कलारूप नहीं माने जाते तो उनकी भाषा भी अलग-अलग नहीं हो सकती। अतः नाट्यभाषा के संबंध में कहते वक्त भाषा की संरचनात्मक विशेषताओं के साथ-साथ आंगिकसात्विक आदि अभिनय को सूचित करने के लिए रचनाकारों की ओर से स्वीकृत एवं प्रयुक्त भाषेतर पद्धतियों पर भी ध्यान देना चाहिए। नाट्य रूपों में कृतिकार के मानसिक व्यापारोंउद्देश्यों एवं विचारों को दर्शकों तथा पाठकों तक पहुँचाने का श्लाघनीय कार्य प्रमुख रूप से नाट्यभाषा के माध्यम से किया जाता है।
अन्य काव्य रूपों जैसे कविताउपन्यासकहानी आदि साहित्यिक विधाओं की भाषा की संरचना की तुलना में नाटक की भाषा याने नाट्यभाषा नाटकीय परिवेश के कारण अलग रहती है। नाट्यभाषा का स्वरूपसंरचनाआकार तथा उसका महत्त्व अन्य विधाओं की भाषिक संरचना पद्धति से बहुत अधिक भिन्न है। नाटक को छोडकर अन्य सभी साहित्यिक विधायें केवल पढने के लिए रची जाती हैं। अतः उनकी वाचन शैली सीधी और सरल है। लेकिन नाटक नट और नटी द्वारा मंच पर जीवन्त कार्यव्यापार के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से संरचित वाचन शैली अभिनयोन्मुख है और उसका महत्त्व उत्तरोत्तर बढता रहा है। साधारणतया नाट्यभाषा के प्रमुख दो रूप माने जाते हैं। ये दो रूप हैं- हमारे जीवन-व्यवहार की ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा और अंगाश्रित शरीर भाषा। इनके अलावा रंग-प्रकाशध्वनिचित्ररंगमंचीय वस्तुयें आदि नाट्यभाषा रूपी विशिष्ट भाषा की इकाइयाँ हैं। इन इकाइयों को मंचीय भाषा कह सकते हैं। ये तीनों- ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषाअंगाश्रित शरीर भाषा तथा उपकरणाश्रित मंचीय भाषा-मिलकर नाट्यभाषा बनती है।

ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा

नाटक की भाषा का सहजसंप्रेषणीय होना अनिवार्य है। यह संवाद के रूप में अभिनेताओं के लिए लिखी जाती है। यह एकाधिक अभिनेताओं के बीच बातचीत या एक ही अभिनेता के आत्मालाप के रूप में हो सकती है। कभी-कभी अनेक अभिनेताओं के द्वारा कोरस‘ के रूप में प्रस्तुत होती है। इसके द्वारा अभिनेता दर्शकों के सामने जीवन की भिन्न-भिन्न झाँकियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुति निश्चित समय के अंदर दर्शकों के सामने मंच पर होती है। यद्यपि रंगालय में उपस्थित लोगों की भूमिकादर्शक‘ के रूप में एक हैफिर भी भावों की अभिव्यक्ति के लिए स्वीकृत ध्वन्याश्रित भाषा को आत्मसात करने की क्षमता में अंतर है। दर्शकों को शैक्षणिक स्तरभाषा ग्रहण की शक्तिस्वीकृत बिम्बों और प्रतीकों को समझने की क्षमता समान नहीं रहती। अतः रचनाकार को अपने नाटक में ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो सरलता,सहजता तथा स्वाभाविकता के कारण सभी स्तर के लोगों के लिए स्वीकार्य हो। नाटक की ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा के लिए यह भी अभीष्ट और अनिवार्य है कि नाटक में और जीवन में प्रयुक्त होने वाली भाषा में अधिक अंतर न हो। गोविंद चातक जी ने बताया कि नाटक की भाषा यथार्थ के आग्रह के कारण एक ओर वह सामान्य बोलचाल के निकट होती हैदूसरी ओर संरचितसंस्कारित होने के कारण अपने सर्जनात्मक प्रयोग में सामान्य से विशिष्ट हो जाती है।” उसमें रोचकता एवं प्रसंगानुकूलता की आवश्यकता भी है। साथ-ही-साथ भाषा को प्रवाहमयी भी होनी चाहिए। इसमें व्यंग्यविनोदात्मकताचुस्तीचुटीलापनकहावतों और मुहावरों आदि का प्रयोग अति आवश्यक एवं अनिवार्य हैं। नाटक की भावस्थिति की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के संबंध में नेमीचंद जैन जी ने कहा है कि ऐसे प्रभावपूर्ण संप्रेषण के लिए यह भी जरूरी है कि नाटक की भाषा यथासंभव पात्रानुकूल होने के साथ-साथ सुबोध और एकाग्र तो हो हीसूक्ष्म और व्यंजनापूर्ण भी होजो बोली जाने पर लयों और स्वरों का अपना विशिष्टआकर्षक संगीत रच सके। ऐसी भाषा के बिना कोई श्रेष्ठ तथा महत्त्वपूर्ण नाटक लिखा जाना संभव नहीं और संसार की सभी भाषाओं के श्रेष्ठ और उल्लेखनीय नाटककार अपने-अपने ढंग से अपने लिए अपनी भाषा का ऐसा विशेष आविष्कार करते आये हैं।” यह विशेष आविष्कार संवादों की संरचना में दर्शनीय है जो नाट्यभाषा के स्वरूप को व्यक्त करता है।

संवाद योजना

संवाद योजना को कथोपकथन या बातचीत भी कहते हैं। संवादों की सहायता से नाटक का कलेवर निर्मित होता है। इसके माध्यम से ही नाटक की कथा का विकास होता है। एक दृष्टि से कथा का कथन ही संवाद के द्वारा संपन्न है। यह नाटक के आधारभूत प्राण तत्त्व हैं और नाटक की नाटकीयता उसके संवादों से ही विकसित होती है।
संवादनाटककार द्वारा निर्मित काल्पनिक संसार के पात्रों की बातचीत है और कम-से-कम दो पात्रों की आवश्यकता है। पात्रों के आत्मकथन भी इसके अंतर्गत आता है। नाटक के संवादों की भाषिक इकाइयों पर विचार करें तो उसमें तीनों पुरुषों की प्रधानता रहती है। इनमें से उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष बातचीत के सिलसिले में अपनी भूमिका बदलते रहते हैं। अन्य साहित्यिक विधाओं की तुलना मेंजिनमें अन्य पुरुष की प्रधानता रहती हैनाटक की भाषिक इकाइयाँ भिन्न हैं। यह नाट्यभाषा की संरचनात्मक विशेषता को प्रकट करती है। नाट्य संवाद नाटक में अनेक संदर्भ पैदा करता है। यह पात्रों का बोलना मात्र नहीं है लेकिन वह कुछ ऐसे विचारणीय भाषिक तथा नाटकीय तत्त्वों की संरचना है जो नाटक की अभिव्यक्तिपरक प्रकार्य और शब्दों के व्याकरणिक संबंधों से उत्पन्न नाट्यार्थ सूचक तत्त्व है। नाटक की प्रत्येक स्थिति कार्य को उत्पन्न करती है। कार्य संवाद निर्माण के लिए उचित भूमिका तैयार करता है। इस प्रकार निर्मित संवाद पुनः नई स्थिति विशेष को जन्म देता है। अतः ये तीनों अन्योन्याश्रित एवं एक-दूसरे को उत्पन्न करने वाले भी हैं। यह निम्न आरेख से व्यक्त हो जायेगा। 
इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति और कार्य के आधार पर नाट्यभाषा की संरचना की जाती है। उसका ध्वनि संयोजनशब्दनिर्माणरूपगठन तथा वाक्य संरचना,नाट्यस्थिति एवं कार्य पर निर्भर है। ये दोनों नाट्य कथा पर आधारित एवं विकसित हैं। संवाद की भाषा प्रत्येक पात्र की आत्मा की भाषा भी है। इसलिए पात्र का आत्मतत्त्व उसमें आना स्वाभाविक है। यह आत्मप्रकाशन का सशक्त माध्यम होने के कारण पात्रों के चरित्र को भी द्योतित करता है।
इस प्रकार निर्मित लिखित-भाषा के रूप गठन का अध्ययन-विश्लेषण तथा सोच-विचार करने के लिए पाठकों के पास अवसर है। सामान्यतः लिखित भाषा संरचना संबंधी व्याकरणिक इकाइयों से तथा वाक्य संबंधी परिकल्पनाओं से युक्त रहती हैरंगमंच पर खेले जाने के कारणपात्रों के द्वारा उच्चरित संवाद दर्शक सुना करते हैं। लिखित संवाद के उच्चरित रूप को वाक‘ कहना समीचीन है। वाक‘ को भाषण भी कह सकते हैं। द्विवेदी जी ने ठीक कहा है- वागिन्दि्रय द्वारा उच्चरित और श्रवणेन्दि्रय द्वारा गृहीत भाषा का रूप वाक की कोटि में आता है।” वाक या भाषण-नाटक में संवादमात्रा,बलाघात्सुरसंगम आदि ध्वनि गुणों से युक्त रहता है। यह केवल सुनने से ही अनुभूत होता है न कि पढने से। अतः ध्वन्यात्मक शब्दिक भाषा में मौखिक एवं लिखित भाषा रूपों की सभी विशेषतायें निहित हैं।

अंगाश्रित शरीर भाषा

इस संदर्भ में यह स्मरणीय है कि नाटक सबसे पहले नाटककार की काल्पनिक दुनिया में काल्पनिक रंगमंच परकाल्पनिक पात्रों द्वारा असंख्य बार खेला जा चुका है। इसी कल्पना को वह ध्वन्यात्मक भाषा एवं भाषेतर माध्यमों से अभिव्यक्ति करता है। नाटक की पांडुलिपि की हर एक इकाई नाटक के क्रियांश से जुडी रहती है। एक सूक्ष्मदर्शी अपने दीक्षण से इन भाषिक इकाइयों में छिपे क्रियांशों को कुशल अभिनेताओं के इंगितों की सहायता सेजो नाट्यभाषा रूपांश शरीरभाषा हैदर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है।
नाट्याभिनय के संबंध में कहते वक्त नाट्याचार्य ने वाचिकआंगिक और सात्विक आदि अभिनय को सामान्याभिनय कहा है। यदि किसी नाट्य में सात्विकाभिनय की प्रधानता होती है तो वह उत्कृष्ट नाट्य बताया गया। ये सात्विक एवं आंगिक अभिनय मनोभावों पर आश्रित हैं और अध्वन्यात्मक भाषा से संबंधित हैं। ये अध्वन्यात्मक भावव्यंजित अभिनयअभिनेताओं के नयनोंकपोलोंदाँतोंओष्ठों से तथा अन्य अवयवों के संचालन से प्रकट किया जाता है। इस अध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति में भीभाषिक संरचना के समान एक प्रकार की स्थिरता अथवा व्यवस्था है। यह व्यवस्थित अंगसंचालन ही आंगिक भाषा यानी शरीरभाषा है। पात्रों के अंग-संचालन (आंगिक-अभिनय) व्यवस्थित एवं पूर्व निर्धारित होने से ही दूसरे अभिनेताओं के इंगितों को तथा तद्जनित भावों को समझ लेते हैं। आहार्याभिनय से भी यही कार्य संपन्न होता है। एक अभिनेता जब फटी-पुरानी धोती पहनकर रंगमंच पर प्रवेश करता है तब उसका आहार्य निशब्द भाषा‘ की सहायता से यह स्पष्ट बताता है कि प्रस्तुत पात्र की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति क्या होती है। यह अर्थबोध ध्वन्यात्मकभाषा (वाचिकाभिनय) के जैसे-सभी दर्शकों को समान रूप से होता है। इसका कारण यह है कि आहार्य के माध्यम से भी निशब्द-भाषा‘ की सहायता से भावाभिव्यक्ति की जाती है। इस प्रकार की अभिव्यक्ति शरीरभाषा से संपन्न होने से यह भी नाट्यभाषा का अंग है।
इसके साथ-साथ नाट्यार्थ की अभिव्यक्ति करने के लिए अभिनेताओं का मौन‘, जो शरीरभाषा से जुडा हुआ हैबडी सहायता करता है। इसका भीभावाभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता है। जिस प्रकार नाटककार ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचाराभिव्यक्ति करता है उसी प्रकार वह मौन संकेत से पात्रों के विचारों और भावों को प्रस्तुत करता है। पात्रों की बातचीत के सिलसिले में किसी एक पात्र का अचानक मौनसंवाद के बीच सोच-समझकर आयोजित खामोशीदर्शकों के मन को आकर्षित करने वाली नाटकीयता मात्र नहींउसकी खामोशी में अन्तर्निहित कारणों को ढूँढने की जिज्ञासा भी दर्शकों के मन में उत्पन्न करती है। दर्शक पात्र की खामोशी में निहितगुंफित अर्थ को समझ भी लेता है जिसको नाटककार अभिव्यक्त करना चाहता है। नाटक में आयोजित आर्थगर्भित मौन के बारे में डॉ. शमीम अलियार जी ने यों कहा है कि- नाट्य भाषा की खामोशी में एक खास तरह की खूबसूरती हैमौन में एक मनोहारिता है। और एक नकारात्मक स्थिति नहीं। उससे पहले और बाद में प्रयुक्त शब्दों के बीच वह एक सेतु का काम ही नहीं करता वरन् उनके आधार पर एक अर्थ की सृष्टि भी करता है। शब्दों के बीच की निस्तब्धता अपने में नाटकीय तनाव को वहन करने के कारण बहुत सार्थक हो सकती है। यों नाट्यभाषा मौनहरकतसंवाद,गतिशीलता एवं स्थिरता का समन्वय करके अपना एक स्वतंत्र ढाँचा रचती है।” इस प्रकार देखें तो आहार्य और मौन आदि अंगाश्रित शरीरभाषा से जुडे रहते हैं और नाट्यभाषा के अंश हैं।

उपकरणाश्रित मंचीय भाषा

वर्तमान युग की नाट्यभाषा का प्रमुख अंग हैउपकरणाश्रित मंचीय भाषा। नाटककार अपने मन में उद्बुद्ध विचारों और भावों की अभिव्यक्ति देने में ध्वन्यात्मक एवं अंगाश्रित भाषा के साथ-साथ इस विधा का भी इस्तेमाल करता है। यद्यपि यह नाटक के मंचन से संबंधित कार्य होने से निर्देशक पर निर्भर हैफिर भी वर्तमान नाटककार नाट्यभाषा के इस अंग पर ध्यान दे रहा है। क्योंकि नाटककार को कभी-कभी अपनी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अनुभूति की अभिव्यक्ति करने में ध्वन्यात्मक भाषा असफल प्रतीत होती है तब वह रंगमंचीय भाषा तत्त्वों की सहायता लेने में विवश हो जाता है। दृष्टा की अनुभूतियाँ तथा उनको प्रस्तुत करने वाले निर्देशकों के दृष्टिकोण अलग-अलग हो तो दृष्टा की अनुभूतियों का साक्षात्कार पूर्ण नहीं होगा। नाटककारनिर्देशक की अपेक्षा दृश्यकाव्य नाटक के दृश्यतत्त्वों की संप्रेषणीयताभावव्यंजना और आकर्षणीयता से भलीभाँति परिचित एवं अनुभूत है और इसलिए ही इन तत्त्वों का प्रयोग करता है। अतः इस अध्वन्यात्मक भाषिक रूप के बिना नाटक और नाट्यार्थ अधूरा रहेंगे।
वर्तमान नाटक में रंगसज्जा का महत्त्व है। यह रंगसज्जा नाटक में चित्रित दृश्य एवं वातावरण के अनुसार होती है। नाटक के प्रस्तुतीकरण के समय निर्देशक अपनी ओर से या नाटककार के निर्देशानुसार कई वस्तुओं का मंच पर उपयोग करता है। इन वस्तुओं का उपयोग दो कार्यों के लिए होता है। कई वस्तुएँ नाटक के वातावरण की सृष्टि के निमित्त इस्तेमाल की जाती हैं तो अन्य ऐसी होती हैं जिनका उपयोग नट या नटी अभिनय के बीच करते हैं। इन वस्तुओं का उपयोग करने के पहले नाटक केसंकलनत्रय‘ संबंधी तत्त्वों को मन में रखना चाहिए। रंगमंचीय वस्तुओं से तैयार किये गये वातावरण के साथ कथावस्तु को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है। रंगसज्जा,नाटकों में यथार्थ का भ्रम उत्पन्न करती है और साथ-ही-साथ पात्रों के स्तरजीवनादर्श आदि को व्यक्त करती है। मंच पर उपयुक्त एक-एक चीज अपनी मौन भाषा‘ से दर्शकों से संवदन करती है।
रंगसज्जा के समान रंगदीपन दर्शकों से संवदन‘ करता है। यह केवल एक यांत्रिक वृत्ति नहीं कह सकते। यह विशिष्ट प्रकार की भावाभिव्यक्ति है क्योंकि इसके माध्यम से नाटककार एवं नाटक-व्याख्याता निर्देशक बहुत कुछ बातें दर्शकों को बताते हैं। रंगमंच पर तथा अभिनेताओं परनाट्यार्थानुसार भिन्न-भिन्न रंग के प्रकाश पडते समय अभिनेताओंमंचीय-वस्तुओं से युक्त रंगमंच एक सुंदर चित्र जैसा बन जाता है। इसके साथ अभिनेताओं के आंतरिक द्वंद्व के अनुसार उत्पन्न हावभावादि प्रत्येक-प्रत्येक रंगीले-प्रकाशों के माध्यम से प्रदीप्त किये जाते हैं। अतः रंगदीपन कला ऐसी माँग थी जो कलाकार के अंतर्भावों को उभारने में सहायक सिद्ध हो और कुछ नवीन रूप प्रस्तुत कर सके।
उनके अलावा नाटक में ध्वनि‘ का प्रयोग दर्शकों के मन में विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से किया जाता है। यह भी एक विशिष्ट मंचीय साधन है। नाटक के प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में उत्पादित ध्वनि‘ घटना के वातावरण की सृष्टि करती है। इसके साथ प्रत्येक घटना या नाट्यगति की ओर दर्शकों का ध्यान सामूहिक रूप से आकर्षित करके उनके मन में रसोद्रेक की सहायता भी करती है। अतः नाट्य प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में उत्पादित ध्वनि दर्शकों से कुछ-न-कुछ अवश्य बताती है जिसको समझकर उनके मन में उसके प्रति प्रतिक्रिया होती हैउनके संवेग जागृत होते हैं तथा वे तीव्र नाटकीय अनुभूति को प्राप्त करते हैं। नाटक में भावाभिव्यक्ति एवं विचार संप्रेषण के लिए उपयुक्त साधनों को रेखाचित्र के द्वारा यों व्यक्त कर सकते हैं। उपर्युक्त रेखाचित्र से नाट्यभाषा का स्वरूप अधिक-स्पष्ट होगा कि नाटककार के द्वारा नाट्यार्थ की प्रस्तुति करने के लिए प्रयुक्त एक विशिष्ट अभिव्यक्ति के माध्यम को नाट्यभाषा‘ की संज्ञा से अभिषित है।

समीक्षा की उत्पत्ति के लिए मानुषी वृत्ति (अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहना) इसकी धरातल कही जा सकती है। यह वृत्ति समाजराजनीतिव्यवहारआपसी सम्बन्धखेलकूद और प्रदर्शन आदि सब जगह प्रदर्शित होती है। वस्तुतः इसे बुराई,भर्त्सनाआलोचनासमालोचनाकटु आलोचना समीक्षा जैसे सम्बोधन भी दिए गए। इसे आदिकाल से किसी न किसी रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। फलतः मानव विकास के साथ इसका क्षेत्र भी बढता गया और नाट्याचार्य भरत काल में इसके क्षेत्र विशेष में एक अलग ही पहचान सामने आई जो नाट्य समीक्षा‘ कहलायी। धीरे- धीरे तब से लेकर आज तक इसके कई रूप बनते गए अर्थात् रंग समीक्षाव्यक्ति समीक्षापुस्तक समीक्षाफिल्म समीक्षापत्र समीक्षा और सम्पादकीय समीक्षा आदि। इन समीक्षाओं ने जन्म दिया
समीक्षा का स्वरूप निरूपण ही हमारा विवेच्य है विशेषतः नाट्य क्षेत्र में नाट्य प्रस्तुतियों काकृतियों का और लेखों का। समीक्षा की टिप्पणियों से सुधार सम्भव है वह भी उसकी पुनः प्रस्तुति के समय परन्तु पुस्तक और फिल्म समीक्षा में इसका कोई विकल्प नहीं है। इसलिए नाट्य समीक्षा उपयोगी भी है और आवश्यक भी। दरअसल सत्य का बोध कराना ही समीक्षा का धर्म होना चाहिए। वही समीक्षा सही होती है जो पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो। विद्वानों ने भी आलोचना का प्रमुखतम गुण उसका निष्पक्ष होना ही बताया है अन्यथा समीक्ष्य के गौरव की हानि का संशय सदैव बना रहता है।

समीक्षा के स्वरूप का निरूपण

वैदिक और पूर्व वैदिक काल की नाट्य झाँकियों का अथवा प्रहसन प्रयोगों का अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि यज्ञों के मध्य प्रहसनों की प्रस्तुति अथवा प्रयोजन मात्र मनोरंजन हेतु किया जाता था। प्रबुद्ध दर्शक समूह को याज्ञिक कर्मकाण्ड के बीच लघु नाटकीय दृश्य बतला कर बिठाए रखना संयोजक की कार्यकुशलता का प्रतीक था। वैदिक संवाद सूक्तों में यम-यमीपुरूर्वा-उर्वशीइन्द्र-वामदेव सोम-विक्रय प्रसंग आदि ऐसी ही प्रस्तुतियों के उदाहरण हैं। यज्ञ में सम्मिलित अतिथिगण यजमान आदि उसके दर्शक होते थे। इसलिए यह भी सम्भव है कि वे सभी प्रस्तुत किए जाने वाले रूपों की आपस में चर्चा अवश्य करते होंगे – किसी कार्यक्रम को सुन्दरमनोरंजक तो किसी को हल्काघटिया अथवा निम्न-स्तरीय भी कहा जाता होगायह अवश्यंभावी है। रंगशाला में अभिनय की सफलता और असफलता पर हर्ष और विषाद् सूचक ध्वनियों को मौखिक समीक्षा ही माना है। व्यावहारिक समीक्षा का मार्ग प्रशस्त नहीं था। गुण-दोष विवेचन के ही रूप में व्यावहारिक आलोचना दिखाई पडी थी। प्रमाणों के अभाव में यह सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है कि उस समय नाट्य समीक्षा होती थी अथवा नहीं परन्तु यह कहना असत्य नहीं होगा कि उस समय मौखिक नाट्य समीक्षा का प्रादुर्भाव अवश्य हो चुका था परन्तु उसका रूप निश्चित नहीं हुआ था।

भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र काल

यदि नाट्य समीक्षा के लिखित आदि रूप को आधार बनाया जाय तो भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र से बढकर अन्य कोई ग्रन्थ प्रतीत नहीं होता। भारतीय रंग परम्परा भरतमुनि से भी बहुत पहले की है जिसका समृद्ध रूप हमें भरत काल में दिखाई देता है। भरत मुनि ने जैसा देखा वैसा चित्रित किया अतः वे ही नाट्य समीक्षा क्षेत्र में प्रथम नाट्य समीक्षक कहें जाएँ तो मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भरत मुनि को रंगमंच की सम्पूर्ण विधाओं का ज्ञान था। उन्होंने तात्कालिक सम्पूर्ण नाट्य रूपों का विस्तार से विवेचन किया है – विशेषतः मंचों के आकार-प्रकारमंच सम्बन्धी शब्दों जैसे रंगशीर्षरंगपीठदर्शकों हेतु वर्णानुकूल स्थानवाद्ययंत्रसूत्रधार (तौरिय)अधिपति,वेषकरमांल्यकृतचित्रज्ञरजकप्रकाशदीप दर्शक (प्रार्थिक एवं प्रार्थक) अर्थात् आमंत्रित किए जाने वाले प्रार्थित और स्वयं आने वाले प्रार्थक दर्शक कहलाते थे। भरत के अनुसार स्वाभाविकता का अधिकाधिक ध्यान केवल उपकरणों में ही नहींअपितु आंगिक अभिनय में भी अभीष्ट था। उसमें बहु अंग-लीला (ओवर एक्टिंग) वर्जित थी।
भरत ने ना.शा. में रंगसज्जा का विस्तार से वर्णन किया है। रंगलेपन पात्रानुकूल बतलाया है। नाट्य समीक्षक को नाटक सम्बन्धी अथाह ज्ञान होना भी आवश्यक माना जाता होगा और भरत मुनि इसमें सिद्धहस्त प्रतीत होते हैं इसलिए रंगचर्चाओं के साथ-साथ नाट्याचार्यों को भी उनके कर्त्तव्य के प्रति सजग करते हुए दिखाई देते हैं। इन सभी तथ्यों के बावजूद पूर्व भरत और भरतकाल में न तो उन नाटकों का नामांकन हुआ है और न कहीं किसी नाट्यशाला का चित्रण अथवा चर्चा मिलती है जहाँ नाटक खेले जाते थे परन्तु इस अभाव की पूर्ति हमें संस्कृतकाल में अवश्य होती दिखाई देती है।

संस्कृतकाल

ईसा से पूर्व द्वितीय शताब्दी के मध्य से संस्कृत काल में भी नाट्य प्रदर्शन मात्र मनोरंजनार्थ बतलाया गया है। संस्कृतकाल के नाट्य समीक्षकों में पतंजलि का नाम प्रमुख है जिन्होंने अपने महाकाव्य में दो प्रकार के अभिनयों का उल्लेख किया है। काले और लाल रंगों से कंस और कृष्ण के पक्ष के अभिनेताओं को मंच पर बतलाया जाता था। भाष्य के अनुसार स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही करते थे जिन्हें भूकंस कहते थे। भूकंस अर्थात् स्त्री की भूमिका में आया हुआ पुरुष। पतंजलि ने लिखा है कि समाज में अभिनेताओं को विशेष सम्मान नहीं था क्योंकि उन्हें नैतिक दृष्टि से भ्रष्ट बतलाया गया है। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि अश्वर्जित और पुनर्वसु नामक दो भिक्षुओं को कीटगिरी की रंगशाला में अभिनय देखनेनर्तकी से बात करने के दोष में विहार से बाहर निकाल दिया गया था।
उस समय प्रस्तुतियों पर राजकर लगता था। सभी ललित कलाओं को राज्य की ओर से प्रोत्साहन भी मिलता था। नाट्य प्रदर्शन और दर्शकवृंद को उस समय समाज कहा जाता था। यहाँ समीक्षात्मक विवेचन का अभाव प्रतीत होता है। कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीयअभिज्ञान शाकुन्तलम्महाराज विक्रमादित्य की सभा में अभिनीत हुए बतलाए गए हैं। श्ूाद्रक का मृच्छकटिक नाटक उज्जयिनी में अभिनीत हुआ था। इस काल में भी वेदकालीन प्रस्तुति शैली का रूप कहीं-कहीं दिखाई देता है। भवभूति का उत्तररामचरित नाटक भगवान कालप्रिय महादेव की यात्रा के भाव पर श्रेष्ठ सामाजिकों के समक्ष अभिनीत हुआ था और मुद्राराक्षस तथा सम्राट हर्ष के प्रियदर्शिकारत्नावली तथा नागानन्द नाटकों का प्रदर्शन विश्व के प्रतिष्ठित व्यक्तियों का परिषद् के समक्ष हुआ था। इस काल में रंगमंचीय कृतियों का अभाव प्रतीत नहीं होता। विद्वानों की मान्यता है कि संस्कृत नाटकों में दृश्यात्मक विधान उतना नहीं हुआ करता था,रंगमंचीय योग कम से कम था। संभवतः इसीलिए संस्कृत नाट्य समीक्षा के सूत्र कहीं दृष्टिगत नहीं होते।
हाँआज के युग में ऐसे समीक्षक हैं जिन्होंने संस्कृत नाटकों का रंगमंचीय दृष्टि से मूल्यांकन किया है जैसे डॉ. वी. राघवनडॉ. सूर्यकान्तश्री रमाशंकर तिवाडीडॉ. कुंवरचन्द्र प्रकाशसिंहडॉ. रघुवंशश्री कृष्णदासकान्तिकिशोर भरतियाडॉ. रामविलास शर्माबलवन्त गार्गी आदि। इनमें से किसी ने कथ्य की उपादेयता पर टीका-टिप्पणी की तो किसी ने प्रयोगात्मक स्वरूप का विवेचन किया जैसे संस्कृत नाटकों का प्रदर्शन सोद्देश्य होता थाउनमें जनहित समाहित थाइसी दृष्टिकोण को लेकर वे जनता के समक्ष अभिनीत किए जाते थे।
कहीं-कहीं समीक्षक अपना स्पष्ट मत भी पाठक के सामने रख देता है यथा – मंच पर दुर्योधन की मृत्यु दिखाकर भास ने परिपाटी का उल्लंघन किया है लेकिन इन्होंने नाट्य प्रस्तुतियों को देखा नहीं और केवल नाटक पढकर अपनी विचारधारा (समीक्षा) प्रस्तुत की है जो पुस्तकीय समीक्षा के सदृश्य है परन्तु यह सब उस युग से चली आ रही नाट्य समीक्षा की कडी में जोड देना एक अनायास प्रयास होगा क्योंकि संस्कृत काल में नाट्य समीक्षा नाम से जानकारी अप्राप्य है। यत्र-तत्र कुछ ऐसे संकेत भी प्राप्त नहीं होते हैं जहाँ पर तत्कालीन लेखकों ने नाट्य प्रस्तुतियों पर अथवा उनके किसी पक्ष विशेष पर कुछ कहा हो जैसा पतंजलि ने रंगमंच के कई पक्षों पर कुछ न कुछ टिप्पणी अवश्य की है परन्तु कालिदास के काल में समीक्षा का कुछ भी अंकुर दिखाई नहीं देता।

लोकनाटक और समीक्षा

लोकमंच आदि और अनंत हैसर्वव्याप्त रहता आया है। नश्वर नहीं है। समय-समय पर बदलती संस्कृति का उस पर भी प्रभाव पडता है परन्तु फिर भी उसका अपना मूल रूप होता है जिसे समय-समय पर भाषायी नाट्य समारोह अपनाते रहते हैं इसलिए लोकमंच का गहरा प्रभाव हिन्दी नाट्य प्रस्तुतियों पर देखा जाने लगा है।
हिन्दी रंगमंच ने तो लोक शैली (विशेषतः सूत्रधार) पर आधारित नाट्य-प्रस्तुतियाँ देना आरम्भ कर दिया है। इसका रूप हमें कई नाटकों में साफ दिखाई देता है। १९७० के बाद ही ऐसे एक लहर-सी चल पडी है। लोक नाटक तो मूलतः मनोरंजनार्थ प्रस्तुत होते आए हैं और उनकी निजी शैली और विशेषता होती है। अतः समीक्षा के लिए आवश्यकता नहीं होती परन्तु यदि इस युग में लोकनाट्य समारोह हो तो अवश्य उनके स्तर और प्रभाव को दर्शाने के लिए कोई समीक्षक अपनी लेखनी उठा सकता है। हाँ,आज का लेखक यदि लोकनाट्यों का ज्ञाता है तो उन प्रस्तुतियों की सही एवं तुलनात्मक समीक्षा दृष्टि रख सकता है परन्तु ऐसा बहुत कम होता है।

ऐसा समीक्षक तो हिन्दीमराठीबंगला प्रस्तुतियों में प्रयुक्त लोक शैली के प्रयोग का सही मूल्यांकन करने में भी समर्थ हो सकता है इसलिए यहाँ से सीधा भारतेन्दु काल पर दृष्टिपात करना श्रेयस्कर हो गया है जहाँ से हिन्दी रंग- आन्दोलन का बीजारोपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया जिसे हिन्दी का पारसी रंगमंच कहा गया है।

भारतेन्दुकाल और नाट्य समीक्षा

हिन्दी समीक्षा के आरम्भ की चर्चा करते हुए डॉ. रामदरश मिश्र ने भारतेन्दुकाल से आलोचना का आरंभ स्वीकार किया है और लिखा है कि अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव से गद्य में निबन्धों तथा सम्पादकीय टिप्पणियों के रूप में आलोचना होने लगी थी। उन्होंने माना है कि इस काल की व्याख्या परक आलोचनाओं में गुण और दोष दर्शन प्रवृत्ति का प्राधान्य रहा। यहाँ तक कि स्वयं भारतेन्दु ने नाटक‘ नामक लेख में यह दर्शाया है कि हमारे पुराने सिद्धान्त आज कितने उपयोगी हैं और कितने अनुपयोगी तथा पाश्चात्य सिद्धान्तों में किन-किन का ग्रहण श्रेयस्कर होगा। इस प्रकार नाटकलेख को प्रथम सैद्धान्तिक समीक्षात्मक कृति तथा भारतेन्दु को प्रथम समीक्षक माना गया है परन्तु यह युग नाट्य प्रस्तुतियों की दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण है। पारसी रंगकर्मियों ने सभी भाषाओं के रूपान्तरित नाटक प्रस्तुत कर अर्थप्राप्ति को अपना ध्येय बनाया था और उनमें चमत्कार के साथ कुछ निम्न स्तर (पभद्देपन) को भी महत्त्व दिया जाने लगा था। इस प्रकार दर्शकवृंद को शिक्षित करने के बजाय भारतीय संस्कृति के आदर्श रूपों को खेमटिये वालों की तरह मंच पर प्रस्तुत किया जाने लगा। पारसियों को आदर्श से कोई मतलब नहीं था। वे तो व्यापारी थे नाटक के व्यापारी। बस इसी विरोधाभास ने भारतेन्दु के हृदय में भारतीय आदर्श को ललकारा और जागृत किया तत्पश्चात् पारसी प्रस्तुतियों का घोर विरोध किया जाने लगा। बस यहीं (१९वीं शताब्दी) से सही समीक्षा का उदय हुआ।
नारायण प्रसाद बेताब‘ ने पारसियों की भाषा शैली के लिए अपनी समीक्षात्मक दृष्टिन खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी” बतलाकर रखी है। हाँगिरीश रस्तोगी ने चुटीले संवाद बोलते-बोलते पद्य में बोल जानाहल्की किस्म के शेर अपनाए जाना” कहकर साहित्य और शैलीगत अपने विचार रखे हैं। १९०३ में भट्ट जी ने एक लेख में लिखा था –हिन्दू जाति तथा हिन्दुस्तान को जल्द गिरा देने का सुगम से सुगम लटका यह पारसी थियेटर हैं जो दर्शकों को आशिकीमाशूकी का लुत्फ हासिल करने का बडा उम्दा जरिया हैक्या मजाल जो तमाशबीनों को कहीं से किसी बात में पुरानी हिन्दुस्तानी की झलक मन में आने पाये।” श्री जयशंकर प्रसाद ने भी इनकी प्रस्तुतियों को एक असम्बन्ध फूहड भडैती‘ लिखकर कटु भर्त्सना की है। इस प्रकार इन समीक्षाओं से कुछ पारिसयों की बाह्य प्रस्तुतियों में सुधार भी हुआ जिनमें श्री सूर विजयव्याकुल भारत,रासमहल नाटक मंडली आदि के नाम गणनीय हैं। सुधार का दूसरा कारण यह भी था कि भारतेन्दु नाटक मंडली के प्रसिद्ध अभिनेता डॉ. वीरेन्द्रनाथ दासकृष्ण कौल,केशवदास टंडन आदि भी इसमें सक्रिय भाग लेने लगे थे। माधव शुक्ल ने भी पारसी रंगमंच के फूहडपन को समाप्त करने में अपना पूर्ण सहयोग दिया था। फलस्वरूप पारसी फूहडपन के साथ-साथ पारसी कम्पनियों का भी पतन हो गया और १८५७ से हिन्दी रंगमंच ने अपनी जडें जमाना आरम्भ कर दिया।
इस प्रकार इस काल में समीक्षा के नाम पर केवल एक ही तत्त्व हमारे सामने उभर कर आता है वह है हीन प्रदर्शनों का घोर विरोध।” इन सुधारवादी समीक्षकों में श्री विश्वम्भर सहाय व्याकुल और जनेश्वर प्रसाद भायल का इसमें विशेष योगदान रहा। पं. बालकृष्ण भट्ट की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी प्रेरणा से पं. माधव शुक्लप्रताप नारायण मिश्रमहादेव भट्टपं. गोपालदत्तरास बिहारी शुक्लदेवेन्द्रनाथ बेनर्जीमुद्रिका प्रसाद आदि के नाम गणनीय हैं। इन्होंने हिन्दी रंग आन्दोलन से हिन्दी रंगमंच को विकसित करने में अत्यधिक सहयोग दिया। इस काल में नाट्य प्रतिस्पर्द्धा के तो अनेक उद्धरण मिलते हैं परन्तु किसी भी प्रकार की सीधी समीक्षात्मक अभिव्यक्ति अप्राप्य है। इस युग की सबसे बडी विशेषता यही है कि हिन्दी रंगकर्मियों ने दर्शक रुचि को बदल दिया। चमत्कार प्रयोग और शेर ओ शायरी से प्रभावित दर्शक रुचि को परिष्कृत कर शुद्ध साहित्यिक एवं राष्ट्रीय प्रेरणायुक्त परिस्थितियों की ओर खींच लाना कोई सहज कार्य नहीं कहा जा सकता।
केवल ब्राह्मण‘ नामक पत्र में श्री रामनारायण त्रिपाठी और प्रताप नारायण मिश्र द्वारा लिखित कुछ नाट्यालोचनाएंँ प्राप्त होती हैं तथा मौखिक समीक्षा का एक उदाहरण भी मिलता है कि एक मजिस्टट ने भारतेन्दु के नाटकों को देखकर उन्हें कवि शिरोमणि शेक्सपियर से भी उत्तम बताया और भट्ट जी ने १९०३ में अपने लेख में पारसियों की प्रस्तुतियों को हीन बतलाया और भारतेन्दु ने नाटक नामक लेख में पारसियों के कुछ कुरुचिपूर्ण प्रदर्शन का चित्रण भी किया। समाज सुधार और जनजागृति की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के उद्देश्य से भारतेन्दु ने व्यावसायिक नाटक मण्डलियों की पद्धति का भी खण्डन किया। भारतेन्दु स्वयं एक अच्छे नाटककारअभिनेतानिदेशक और व्यवस्थापक भी थे इसलिए रंगमंच के हर अच्छे – बुरे पहलू को अच्छी तरह पहचानते थे। उनकी कलम में जो समीक्षा रूप हमें दिखाई देता हैउसी आधार पर उन्हें ही हिन्दी रंग आन्दोलन का सर्वप्रथम नाट्य-समीक्षक मानना समीचीन प्रतीत होता है।
भारतेन्दुकाल की नाट्यकृतियों से समीक्षात्मक दृष्टि का पता चलता है कि अभिनय में अतिनाटकीयता थीउच्च स्वरसंगीतपूर्ण वाणीसुन्दर आकर-प्रकारअनूदित नाटकों का प्रचलनमंगलाचरणसूत्रधारनेपथ्य और आकाशभाषित आदि का प्रयोग संस्कृत के अनुरूपगीत मौन झाँकीरामलीला-सी चित्र सज्जापद्यात्मक संवादनाट्यधर्मी मंच सज्जाप्रत्येक नाटक का मौन झाँकियों पर समाप्त होनालम्बे संवादजनोपयोगी कथोपकथनलोकप्रिय गीत ध्वनियाँपात्रानुकूल भाषादेशभक्ति और देशोद्धार पूर्ण कथानक ब्रज और खडी बोली मिश्रित संवाद मेलोंबाजारों आदि में नाटक प्रस्तुत करना आदि-आदि।
स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष ही करते थे परन्तु उनमें इतनी स्वाभाविकता थी कि दर्शक रो पडते थेभारतेन्दु के द्वारा हरिश्चन्द्र‘ और माणक जी के द्वारा शैव्या की भूमिकाएँ ऐसे ही उदाहरण हैं।
उस समय के दर्शकों को गुणग्य एवं रसिक भी बतलाया गया है। डॉ. गोविन्द चातक ने भारतेन्दुकालीन नाट्य रचना की समीक्षा की है। इन समीक्षकों के द्वारा तत्कालीन वेशभूषाप्रकाश योजना तथा नेपथ्य संगीत की ओर ध्यान दिया गया है। डॉ. गिरीश रस्तोगी आदि ने भी भारतेन्दुकाल के रंगबोध को अपनी समीक्षात्मक दृष्टि से उभारा है।
श्रीकृष्णदास ने भारतेन्दु की नाटक रचना और गठन में कुछ ढीलापन बतलाया है साथ ही उसे सही भी कह दिया गया क्योंकि उसमें समीक्षक को लेखक के द्वारा एक नई दिशा की खोज का संकेत मिला।
डॉ. बच्चनसिंह ने भारतेन्दु के नाटकों को एक क्रांतिकारी कदम‘ बताया। डॉ. सी.पी. सिंह ने सैद्धान्तिक समीक्षा करते हुए लिखा है कि भारतेन्दु जी का प्रधान तथा धीरोदात्त और धीर ललित पर ही विशेष अनुराग लक्षित होता हैउनके पास सभी कवि उच्च कोटि के हैं।

द्विवेदी एवं प्रसादयुगीन समीक्षा

उत्तर भारतेन्दुकाल में खेले जाने वाले नाटकों का कथ्य प्रायः पौराणिक सामाजिक विषयों से सम्बद्ध था परन्तु कई स्थानों पर राजनीतिक समस्याओं की ओर भी संकेत कर दिया जाता था जैसे सीता स्वयंवर” नाटक में ब्रिटिश कूटनीति के समान कठोर शिवधनुष को टस से मस नहीं किया जा सकता” कहा गया। इस प्रकार संवादों के माध्यम से ही जन-जागृति उत्पन्न करने का उपक्रम किया जाता था। ऐसे आयोजन कहीं-कहीं प्रतिबन्धित भी कर दिये जाते थे। इस प्रकार इस युग में राजनैतिक संकेत प्रतीकात्मक रूप में प्रेषित किए जाने लगे।
सार्वजनिक स्थल पर मंच-निर्माणघरों में नाट्य प्रदर्शननाट्य पुनरावृत्तिपूर्वाभ्यास,भडकीली पोशाकेंट्रान्सफर सीनदर्शक श्रेणियाँकुलीन वर्ग आदि का कला प्रेमआमंत्रण पत्रों का चलनचमत्कार प्रयोग आदि के संकेत मिलते हैं। द्विवेदीयुगीन अभिनय कला आदि अतिनाटकीयता से प्रेरित कही गई है परन्तु इन सबसे बडी बात तो यह है कि इस युग में रंगमंचीय समीक्षाओं का भी प्रचलन हो चुका था।
समीक्षाओं का रूप कैसा थायह बतलाना कठिन है। १९२०-१९३० तक साहित्यिक नाटकों के साथ-साथ पारसी रंगमंचीय नाटकों की धारा चलती रही थी। सभी नाटकों में अतिनाटकीयता प्रसंगोंदैवीशक्तिकौतुहल चमत्कारशोखी और छेडछाड प्रेम सम्बन्धी सस्ते गानेरोमांचकारी घटनाओंकुरुचिपूर्ण हास्य आदि की प्रधानता थी। इन व्यावसायिक रंगमंचीय नाटकों ने जनरुचि को इतना विकृत कर दिया कि आधुनिक काल में भी नाटककारों को साहित्यिक नाटकों के अनुसारगीतगजल का प्रयोग अनिवार्य करना पडा। इसलिए जयशंकर प्रसाद पर भी रचनागत शिथिलताअराजकता,बहुउद्देशीयताघटना प्रधानता का दोषारोपण किया गया है परन्तु ऐसा लगता है कि उस युग में कुछ लेखकों ने कटु आलोचना करना ही अपना ध्येय बना लिया था। चाहे वे सही हो या गलत लेकिन आलोचक को अध्येता होने के साथ-साथ प्रस्तुति के काल,पात्र और वस्तुस्थिति से भी पूर्ण परिचित होना चाहिए अन्यथा किसी के दोषी ठहराने के पूर्वाग्रह के आक्षेप से वह स्वयं को बचा नहीं सकेगा क्योंकि समीक्षा के दौरान कभी-कभी भारी भूलें रह जाती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम प्रसाद जी की इस उक्ति की ओर ध्यान दें – मैंने उन कम्पनियों के लिए नाटक नहीं लिखे हैं जो चार चलते अभिनेताओं को एकत्र कर कुछ पैसा जुटाकर चार पर्दे मँगनी माँग लेती हैं और दुअन्नी-अठन्नी के टिकिट पर इक्केवालोखोमचेवालो और दुकानदारों को बटोर कर जगह-जगह प्रहसन करती फिरती हैं। उत्तर रामचरितशकुन्तला और मुद्राराक्षस कभी न ऐसे अभिनेताओं द्वारा अभिनीत हो सकते हैं और न जन साधारण में वे रसोद्रेक का कारण बन सकते हैं ….।” तो प्रसाद जी पर किया गया दोषारोपण विद्वजनों के प्रति ईर्ष्या का द्योतक लगने लगता है।
प्रसाद काल में कुछ नए रूप सामने आए वे हैं – नेपथ्य में गानकोलाहल और रणवाद्य आदि। बहुत कम अवसर ऐसे होते हैं जब लेखक स्वयं पूर्वाभ्यास के समय कलाकारों के मध्य बैठकर अपनी लिखित भावधारा के मूर्त रूप का रसास्वादन करता है और उसमें कहीं अर्थ का अनर्थ हो रहा हो तो सुधार भी करवा देता है। काशी में प्रसाद जी पूर्वाभ्यास के समय कलाकारों के मध्य बैठा करते थे। भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग के कलाकारों द्वारा मंचित उदयपुर में १२१३१४ जुलाई १९८८ को मंचित मेरे एक नाटक मेरा देश मेरे सपने” के पूर्वाभ्यास के दौरान मुझे भी उन कलाकारों के मध्य बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
समीक्षाएँ नाटक क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं – वे नाट्य जगत् की अथवा साहित्य के विविध विधाओं की प्रस्तुति का बोध कराती हैं जिससे कला का और विकास होता है और युग का बोध। प्रसाद युग में समीक्षात्मक माध्यम का पूर्ण अभाव प्रतीत होता है यही कारण है कि रंगमंच की दृष्टि से इस युग को मात्र एक कडी समझा गया हैयद्यपि समीक्षाओं का अपेक्षाकृत रूप तात्कालिक जागरण‘, ‘इन्दु‘, ‘सरस्वती‘, ‘माधुरी‘, ‘प्रभा‘, ‘आज‘ आदि पत्र-पत्रिकाओं में द्रष्टव्य बतलाया गया है पर यह सब अप्राप्य होने के कारण ही इस युग के समीक्षात्मक रूप को उभारने में असमर्थता प्रतीत होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि समीक्षा का आदिकाल कुछ बिखरे-बिखरे सूत्रों में दिखाई देता है।

समीक्षा युग

प्रसादोत्तर युग में रंगमंचीय गतिविधियों की एक जबरदस्त हलचल दिखाई देने लगी। अनेक प्रकार के प्रयोग और परीक्षण यहीं से विकसित होने लगे। इस युग में अनेक कलाकारों एवं उनकी नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षात्मक चर्चा मिलती है। इस युग के लोक विख्यात पृथ्वीराज कपूर के लिए लिखा गया है कि इनके प्रस्तुत नाटकों के कथा शिल्प में एक स्वाभाविक विकासक्रम है। इनमें न अतिमानवीय तत्त्व है और न कोई कृत्रिम अप्राकृतिक नाटकीय चमत्कार। पृथ्वीराज कपूर के समय से ही प्रकाश उपकरणों का प्रयोग आरम्भ हो चुका था। इनके नाटकों में देशभक्ति एवं साम्प्रदायिक एकता की कलात्मक अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है। नाटकों के कथोपकथन स्वाभाविक एवं व्यंग्यपूर्ण होने के कारण मर्म पर सीधी चोट करते हैं। इनके नाटकों द्वारा साम्प्रदायिक एकता का शंखनाद फूँका जाना आर्यावृत्त की बहुत बडी सेवा थी। श्री पृथ्वीराज कपूर द्वारा बार-बार ड्राप गिराकर ३०-३० या ४०-४० सीन दिखाने की परम्परा भी समाप्त कर दी गई। मंच सज्जा की ओर श्री पृथ्वीराज विशेष ध्यान रखते थे। उन्होंने बडे-बडे खम्भों,छत्रधारी सिंहासनों और चित्रांकित दीवारों तक को भव्य रूप में प्रस्तुत किया। उस समय के आलोचकों ने अभिनेतानिदेशक और व्यवस्थापक पृथ्वीराज कपूर के व्यक्तिगत प्रभाव तक की ओर भी दृष्टिपात किया। दरअसल इस युग का समीक्षक नाटक देखने वाले दर्शकअभिनेतावेषकाररंगलेपनध्वनिसंगीत तथा प्रकाश प्रयोग आदि सभी पहलुओं की ओर बडे एकाग्रचित्त से ध्यान देकर उनकी अच्छाई-बुराई को कलमबद्ध करता है। इतना ही नहींसमीक्षक स्वयं निदेशक और व्यवस्थापकों से व्यक्तिगत भेंटवार्ता कर अपनी शंकाओं का समाधान भी कर लेता है ताकि वह प्रस्तोताओं के उस संदेश का भी मूल्यांकन कर लेता है कि प्रस्तोता अमुक प्रस्तुति के द्वारा अपना संदेश पहुँचाने में कहाँ तक सफल हुआ है।
इस युग में नाट्य कला का सरकारीगैर सरकारी स्तर पर नाट्य प्रशिक्षण भी आरम्भ हो गया जिससे सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ अच्छे दर्शकपरिष्कृत समीक्षक और नए-नए आयाम दिखाई देने लगे। इस चहुँमुखी प्रगति से हिन्दी रंग आन्दोलन ने नाटक जगत् में अपनी अभूतपूर्व सम्पदा से विशिष्ट ख्याति प्राप्त की। नाट्य समीक्षा के लिए यथोचित व्यवस्था भी धर्मयुग‘, साप्ताहिक हिन्दुस्तानदिनमान तथा कई दैनिक पत्रों में पाई जाने लगी। यहाँ तक कि नियमित स्तम्भ आने लगे। इसलिए यदि इस काल को पूर्णरूपेण समीक्षा-युग के नाम से सम्बोधित किया जाय तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

समीक्षा युग की देन

इस युग के पत्र-पत्रिकाओं को श्रेय है कि जिनके सहयोग से समीक्षा ने अपना अलग स्थान बनाया है। बडी उपलब्धि यह हुई कि नाट्य जगत् के वैविध्य को इसने उभारा जिससे हिन्दी रंगमंच के विकसित परम्परा की अनेक विधाओं को अपनाया जाने लगा। एब्सर्ड नाटकों की प्रस्तुतियों ने कई लेखकों और प्रस्तोताओं को बहुत प्रभावित किया। मोहन राकेश के बीज‘ और आधे अधूरे‘ नाटक इसी परम्परा के द्योतक हैं। लेखन में नयापन होगा तो निःसंदेह समीक्षा भी अपना रूप बदलेगी।
नाट्य अध्येताओंसमीक्षकों और लेखकों ने सम्प्रति नाटकों की कथावस्तु को केवलमूड‘ और तर्क‘ का स्वरूप माना है। डॉ. लाल की भी यही मान्यता है। बिम्बवादी और अमूर्त कथा वस्तुपूर्ण नाटक भी मंच पर प्रस्तुत हुए हैं। राजनैतिक अव्यवस्था और अत्याचारों की कटु आलोचना भी आज के नाटक की विषय वस्तु है। मनोवैज्ञानिक कथावस्तुप्रकृति प्रकोपयुक्त लघुकथानक भी इस युग की विशेष देन है। इस प्रकार इस युग ने पुरानी शैली को छोड सर्वथा नवीन शैली को जन्म दिया है।

Source: https://vimisahitya.wordpress.com/

Friday, April 3, 2015

7 Wants

'Want' means 'desire for something' and Vedas says-


"आशायाः ये दासाः ते दासाः सर्वलोकस्य ।

  आशा येषां दासी तेषां दासायते लोकः ॥"

Means those who are slaves of desire are slaves of entire world. They may be true but I still want many things in my life, still want to do/visit/buy/purchase things, and here is my list-

1. Dream: I have and I want it. Actually its more than a Want.

2. A Royal Enfield: My friend have one and  after sitting as pillion for many times, now feeling like I have desire for my own.

3. A home with self-designed interior, coloured theme, lawn, a big library and reading room.

4. To Publish My Book.

5. To Learn Guitar: New in the list.

6. Listen to good music from around the world

7. Learn Painting and paint something big.