Sunday, August 5, 2012

Triveni:दोस्ती!


बड़ी चालाकी से किसी को भी बना लेती है अपना,
नशा है, जुनूं है, ज़िन्दगी है,बे-मज़हब पर दुरुस्त है.

शराब सी ज्यादा, जरा शातिर कम है ये दोस्ती!

Saturday, August 4, 2012

9 Brilliant Print-Ads.....So Creative, just say WOW!!

Hi after sharing Best print ads of India I am sharing 9 really Brilliant Ads.....Hope You will like all.


1.Extra....for healthy teeth. A simple but brilliant ad conveying full message.






2. Nerolac Paint ....Quick Dry.  Don't u think, this is a very beautiful ad?



3.Sia Huai... for the sharpest Knives! Even with knives u can Draw, Design!!



4. U r gonna love this! Ad of a KARATE SCHOOL!!


5. Its not a parody of Johnie Walker.... Its an Ad of TRAFFIC POLICE.....Simple, Superb..
now onward do not mix DRINKING AND DRIVING......We CAReful :)


6. Want Thick Hairs?? Use PARACHUTE. A simple picture can convey a BIG MESSAGE. Here is the  example.....

7. FEVICOL a brand can get position with such Creative Ideas.... just say WOW!! for this picture.


8. Prasoon Joshi made the punchline 'Thanda Mtlab COCACOLA' but his creativity in this 12 years old ad made Him.

 

9. It happens with most of the posters.....but creative people can give meaning for garbage...
This ARIEL ad is superb example of Extra-Ordinary IDEAS. HATS OFF!!

Thursday, August 2, 2012

कभी कभी...















कभी कभी लगता है
मांग लूं वो दिन,
वो घंटे,
और कह दूं,
इनका इससे बेहतर इस्तेमाल भी हो सकता था.

कभी कभी लगता है

मांग लूं ज़िन्दगी,
चुरा के ले गये थे तुम.
और कह दूं ,
ये तो मेरी है, मेरा हक है इसपर!

कभी कभी लगता है

रूह से
खरोंच दूं तेरे निशां.
और कह दूं,
तुम्हें हक नहीं है
ता उम्र यहाँ बैठे रहने का.

कभी कभी लगता है,

तेरा लम्स, तेरी खुशबुयें
निकाल फेंकूं.
....लेकिन खुद को खुद से निकालना
इतना आसान तो नहीं!

फिर कभी कभी लगता है,

फिर खेलते हैं,
ये 'गेम'
जब तक कि मैं थकता नहीं,
तुझे अन्दर से दुखता नहीं.

Wednesday, August 1, 2012

Triveni: हिस्सा


दिन सारा आफताब खा गया,
तेरी रात चाँदनी ने चुरा ली.

मैं ज़िन्दगी का हिस्सा नहीं रहा अब!

Saturday, July 28, 2012

Zindagi: A Song



लिहाजों
लिवासों
लफासों
सवालों से
भरी ये ज़िन्दगी...

थमी सी
रुकी सी
चली सी
उड़ी सी
बढ़ी ये ज़िन्दगी...

तुममें भी
हममें भी
खुशियों में
गम में भी
थोड़े उजाले में
तम में भी
दौड़ी चली ये ज़िन्दगी...

ये ज़िन्दगी...
ये ज़िन्दगी.......

इकरारों में
इन्कारों में
इशरारों में
इशारों में
कुछ कहती
कुछ सुनती
ख्वाब नये बुनती
चल पड़ी ज़िन्दगी....

ये ज़िन्दगी...
ये ज़िन्दगी.......

बेनामी में
सुनामी में
सूखे में
अकाली में
दो दानों में
खाली थाली  में
डगमगायी, सम्हली ज़िन्दगी....

ये ज़िन्दगी....
ये ज़िन्दगी.........
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी, ज़िन्दगी.......

खुशनसीब ज़िन्दगी,
हर दिल अज़ीज़ ज़िन्दगी...
ये ज़िन्दगी...
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी............ज़िन्दगी.

Friday, July 27, 2012

ज़िन्दगी



 नज़्म सी सुन्दर
चाय कि प्याली सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

अभी चुप चुप सी

अभी सयानी सी
पंख ले उडी
कोई कहानी सी.
थोड़ी थोड़ी मासूम,
थोड़ी दीवानी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

कभी सतरंगी हो बरसे,

कभी श्यामल ही हरसे,
दूर कही पोखर से
तारे चुन चुन निकाले.
सपने खुद ही बुन ले,
खुद ही उनको ढाले.
नाजुक है,
नजाकत से संवारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

खुद का आसमां बुना,

खुद की ज़मीन चुनी.
शीशे में खुद ढला,
रूनी खुद ही धुनी.
लफ्ज़-लफ्ज़ में फिदरत,
अल्फ़-अल्फ़ अदा.
पतंगों से उड़ती,
मजिल चूमे सदा.
कभी आस, कभी प्यास,
कभी बेकरारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

एक रात शबनमी

उस रात बहकी.
एक रात चुचाप
खुद ही सम्हली.
थामे सारे रिश्ते-नाते,
थामे कच्ची-पक्की बातें,
कच्चा सा फूल,
पक्के संस्कारों की क्यारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

कभी थोड़ी थोड़ी खफा,

कभी लगे दुआ.
कभी जुदा जुदा,
कभी खुद खुदा.
बचपन की कहानी सी,
मीठी शैतानी सी,
कोई नादानी सी,
बेफिक्र जवानी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

भूलने की कवायत,

नया करने की तैयारी सी.
ज़िन्दगी लगे प्यारी सी.

Tuesday, July 24, 2012

सिगरेट





कुछ टुकड़े रह गये हैं और कुछ कशों की याद
बाकी जो खर्चा था सब ट्रे में पड़ी राख है!

जिंदगी साल्ली सिगरेट सी जली है!

Friday, July 20, 2012

फिर मैं खुद से मिला नहीं!


तुमसे बिछड़े तो क्या बिछड़े
फिर मैं खुद से मिला नहीं.
खुद से कितने शिकवे है
पर तुमसे कोई गिला नही.


दिल को काँटा-छांटा,
खुद को टुकडो में बांटा,
दिन अँधेरे कर डाले
तू मुझसे निकला नहीं.


पहले सपने बन बैठा था,
अब आंसू बन हँसता है,
तेरी भी क्या गलती है,
आँखों का कोई सिला नहीं!


मेरे चेहरे में लिपटा,
तेरा अक्स रह गया था.
हर बारिश में भीगे जमकर
फिर भी अब तक धुला नहीं.


आधी रात तुम्हारी थी,
आधी रात मैं भूल गया,
दूर अँधेरे ताका जगकर
ख्वाब पुराना मिला नहीं!


कतरा-कतरा याद भी
हंस-हंस कर आ जाती है,
वक़्त पड़े सब ढलते हैं,
पर  इसका रंग पीला नहीं!


पतझड़ में कुछ फूल झडे
बारिश में कुछ खिला नहीं,
तुमसे बिछड़े तो क्या बिछड़े
फिर मैं खुद से मिला नहीं.

Saturday, June 30, 2012

सूरज की उम्र कम है.....

       
                          
                        तुम्हें याद है वो हैंगिंग ब्रिज....जब हाथ पकड़ हम वहां खड़े थे....और वो सूरज, लालिमा लिए ढल रहा था.....तुम्हें याद है ना!!! ढलते सूरज ने उस दिन कुछ लालिमा दी थी मुझे.....यूँ ही उधार. वक़्त  बहुत हुआ वो लेने फिर नहीं आया....शायद उसी ब्रिज पर इंतज़ार का रहा है. उसे क्या पता अकेले मैं वहाँ नहीं जाऊंगा कभी......और तुम साथ होगे नहीं कभी......वो उधार, उधार ही रहेगा!

        चुकाने का कोई और उपाए हो तो बता दो!!

   **
               अलसाई शाम जब एक तरफ सूरज ढलता है और दूसरी तरफ बसें निकलती हैं तो हमेशा सड़क के बीचों बीच खड़ा मैं सोचता हूँ.....हर बार एक शाम ऐसी क्यूँ होती है जब तुम्हें कहीं और जाना होता है और मुझे कहीं और.....ऐसा क्यूँ है सड़क के दो किनारों कि तरह हमने भी हमारे ऊपर से गुज़र जाने के लिए खाली जगह छोड़ रखी है...जहां से गुजर जाती हैं किसी की इच्छाएं.......तो किसी की उम्मीदें.....

            ऐसा कब होगा जब हमारे अपने मन का भी कुछ होगा...........शायद कभी नहीं......सड़क के किनारे कभी नहीं मिलते, सड़क ख़त्म होने पर भी नहीं!

  ***
               यहाँ पुणे की सुबह भागम भाग में जब मैं भी रेस का हिस्सा बन भागता हूँ तो तुम्हारा चेहरा याद आता है.....ये भाग-दौड़  किसलिए? दो रोटियों, एक घर और कुछ मतलब-हीन लोग तो वहां थे..... तुम्हें पता है अस्तित्व की आग जब भड़कती है तो बड़ी दीर्घ तक जाती है......अस्तित्व की आग छोड़ कर भी में हसरतें पूरी करना चाहता था..... लेकिन ये तो आकाश हैं ना, पार करते चलो, बढती चलेगी.

          सच तो ये है, मेरी हसरत कोई आकाश तो नहीं थी....देखो मेरी हसरत मुझे अब भी तेरा चेहरा याद आ रहा है!

  ****
              तुमने मिल्की-वे तो देखी है ना! देखो उसमें जो सबसे ज्यादा नीला तारा है वो मैं हूँ....देखो बिल्कुल नया है वो, बस कुछ लाख साल पुराना. उसकी भी उम्र है अभी कुछ पढने की, कुछ सिखाया, फिर मेरे जैसे ही सिखाया जायेगा उसे.....हमने समाज बनाया था, और उसे अच्छे से चलाने के लिए कुछ रूल्स. देखो फिर हम अपने ही बनाए रूल्स में उलझ गये ना.....हमें अब समाज चलाने चलना पड़ता है.......और फिर वो भी धीमे-धीमे बड़ा होगा और सीखेगा....समाज के भी कुछ कायदे हैं, नियम हैं, इनके अनुसार चलो. कुछ हज़ार साल बाद देखना वो तारा नहीं रहेगा! अब बस वो समाज का हिस्सा है!

          कल फिर कोई तारा उगने दो...वो नहीं रहेगा जकड़ा. सूरज की उम्र कम है, बस कुछ हज़ार साल...मैं उसे इससे भी लम्बी उम्र दूंगा!!

--
                                                             V!Vs***

Tuesday, June 26, 2012

हर रोज


                 




                          हर रात तू मुझमें जवां होती है, हर रात मैं  जिबह होता हूँ....तेरी जंजीरों में बंधा उलझन में जीता हूँ जैसे जीना भी एक येसी सज़ा है जो हर रात बढेगी, हर दिन उगेगी! एक सुबह काश! दिन ना उगे मेरा.....स्याह होते लफ़्ज़ों कि तरह, मैं भी मुकम्मल याद बन जाऊं. तल्खियों कि सजा यही तो होती है!


हर रोज़


हर रोज़
आखिरी नज़्म की तरह
लिखता हूँ तुझको!

हर रोज़
शाम से माँगता हूँ,
कि रात तेरी याद में ना कटे!

हर रोज़
जाता हूँ तुझसे दूर!
इतने कोस कि,
मुड़के इरादों में भी 
न छू सके तुझे.

हर रोज़
ख़त्म करता हूँ तुझे
जिस्म से, जेहन से,
लफ्जों-लुआब से.

दुश्बारी ये है,
यह हर रोज़ ही होता है.
.....और तू माहरू बन
आ जाती है हर रोज़.

                          
                          ~V!Vs***