Wednesday, December 23, 2015

रमाशंकर यादव 'विद्रोही'




परिभाषा 

कविता क्या है
खेती है,
कवि के बेटा-बेटी है,
बाप का सूद है, मां की रोटी है।

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कविता और लाठी 

तुम मुझसे
हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त!
तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो।
और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि
मौत के मुंह में लाठी ढकेल दूं,
या चींटी के मुह में आंटा गेर दूं।
और आप- आपका मुंह,
क्या चाहता है आली जनाब!
जाहिर है कि आप भूखे नहीं हैं,
आपको लाठी ही चाहिए,
तो क्या
आप मेरी कविता को सोंटा समझते है?
मेरी कविता वस्तुतः
लाठी ही है,
इसे लो और भांजो!
मगर ठहरो!
ये वो लाठी नहीं है जो
हर तरफ भंज जाती है,
ये सिर्फ उस तरफ भंजती है
जिधर मैं इसे प्रेरित करता हूं।
मसलन तुम इसे बड़ों के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
छोटों के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
तुम इसे भगवान के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
लेकिन तुम इसे इंसान के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
कविता और लाठी में यही अंतर है।

पुरखे :: रमाशंकर यादव 'विद्रोही'


नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।
सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।
ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।
कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।
वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।
कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।
पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।
विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।
डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।
धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।
खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।
जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

Tuesday, October 20, 2015

किसान


तुम स्लीपर बोगी में
बीच की बर्थ हो
न ऊपर के हो, न नीचे के.
न सरकार तुम्हारे साथ, ना भगवान.


तुम

तुम-1
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तुम रात की ख़ब्त हो
दिन का सबेरा
मोहब्बत हो मेरी
या दिमाग का दही.

***

तुम-2
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मैं अँधेरे में पैदल चल सकता हूँ
आँख बंद कर
...रास्ता गर तुम तक जाता हो.




रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद

स्वामी विवेकानंद     :  मैं समय नहीं निकाल पाता. जीवन आप-धापी से भर गया है.

रामकृष्ण परमहंस   :  गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं. लेकिन उत्पादकता आजाद करती है.

स्वामी विवेकानंद     :  आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?    
      
रामकृष्ण परमहंस   :  जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो. यह इसे जटिल बना देता है. जीवन को सिर्फ जिओ.

स्वामी विवेकानंद     :  फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हैं?    
    
रामकृष्ण परमहंस   :  परेशान होना तुम्हारी आदत बन गयी है. इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते.

स्वामी विवेकानंद     :  अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं?

रामकृष्ण परमहंस   :  हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है. सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है. अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं. इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता हैबेकार नहीं होता.

स्वामी विवेकानंद     :  आपका मतलब है कि ऐसा अनुभव उपयोगी होता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हां. हर लिहाज से अनुभव एक कठोर शिक्षक की तरह है. पहले वह परीक्षा लेता है और फिर सीख देता है.

स्वामी विवेकानंद     :  समस्याओं से घिरे रहने के कारणहम जान ही नहीं पाते कि किधर जा रहे हैं...

रामकृष्ण परमहंस   :  अगर तुम अपने बाहर झांकोगे तो जान नहीं पाओगे कि कहां जा रहे हो. अपने भीतर झांको. आखें दृष्टि देती हैं. हृदय राह दिखाता है.

स्वामी विवेकानंद     :  क्या असफलता सही राह पर चलने से ज्यादा कष्टकारी है?

रामकृष्ण परमहंस   :  सफलता वह पैमाना है जो दूसरे लोग तय करते हैं. संतुष्टि का पैमाना तुम खुद तय करते हो.

स्वामी विवेकानंद     :  कठिन समय में कोई अपना उत्साह कैसे बनाए रख सकता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हमेशा इस बात पर ध्यान दो कि तुम अब तक कितना चल पाएबजाय इसके कि अभी और कितना चलना बाकी है. जो कुछ पाया हैहमेशा उसे गिनोजो हासिल न हो सका उसे नहीं.

स्वामी विवेकानंद     :  लोगों की कौन सी बात आपको हैरान करती है?

रामकृष्ण परमहंस   :  जब भी वे कष्ट में होते हैं तो पूछते हैं, "मैं ही क्यों?" जब वे खुशियों में डूबे रहते हैं तो कभी नहीं सोचते, "मैं ही क्यों?"

स्वामी विवेकानंद     :  मैं अपने जीवन से सर्वोत्तम कैसे हासिल कर सकता हूँ?

रामकृष्ण परमहंस   :  बिना किसी अफ़सोस के अपने अतीत का सामना करो. पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने वर्तमान को संभालो. निडर होकर अपने भविष्य की तैयारी करो.

स्वामी विवेकानंद     :  एक आखिरी सवाल. कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी प्रार्थनाएं बेकार जा रही हैं.

रामकृष्ण परमहंस   :  कोई भी प्रार्थना बेकार नहीं जाती. अपनी आस्था बनाए रखो और डर को परे रखो. जीवन एक रहस्य है जिसे तुम्हें खोजना है. यह कोई समस्या नहीं जिसे तुम्हें सुलझाना है. मेरा विश्वास करो- अगर तुम यह जान जाओ कि जीना कैसे है तो जीवन सचमुच बेहद आश्चर्यजनक है.
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

Thursday, October 15, 2015

बेरोज़गार कवितायेँ


कितनी बैचेनी,
साल भर की
मेहनत के बाद,
एग्जाम.

खोजा गया रोल नंबर.
लिस्ट में कहीं भी नहीं,
ऊपर से निचले सिरे तक.
दो बार फिर और दो बार चेक किया गया,
नहीं मिला.

तुम्हारा बॉयफ्रेंड
इस साल भी बेरोज़गार रह गया.
तुम्हारी शादी अब किससे होगी शोना?

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तुम्हारी आँखों में ऐसा क्या है जो मैं देखूं?
वही काली की काली हैं,
वही निचुड़े से ख्वाब हैं,
वही बेरोज़गारी है,
वही बेचारगी है.

लड़की ने ऑरेंज जूस के पैसे टेबल पे पटके
और चली गई.
लड़का फटी जेब और बेचारी आँखों से
जाते देख रहा था.

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तुम्हारा पिता
मेरे पिता के पिता का भी पिता था.
तो उनके बेटी के बेटे का बेटा
तुम्हारा क्या हुआ?

लड़का उलझा रहा ऐसे ही
सवालों में साल भर.
लड़की को डोली में उठा
ले गया कोई हमसफ़र.

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मेरे घर में
रहता हूँ मैं,
चंद किताबें
एक देश और एक विश्व का नक्शा
कुछ धूल
और चार कॉकरोच.

कभी कभी चार बातें भी रहती हैं
दीवारों में गूंजती.
जो गर्लफ्रेंड सुना के जाती.
दो पैसे भी रहते हैं,
जो गर्लफ्रेंड दे के जाती है.


Monday, October 12, 2015

नेचर फ्रेंडली पोएम्स


कवितायेँ लिखना एक बकवास काम है
प्रेमिकाओं पे लिखना उससे भी बकवास.
प्रेमिकाएं जाने के लिए पैदा हुई हैं,
और तुम लिखी कविताओं के पन्ने फाड़ने.
बेवकूफ!! पेपर बनाने को पेड़ खर्च होते हैं,
इको-सिस्टम की माँ-बहन एक मत करो,
रुको! प्रेमिकाओं पे कवितायेँ मत लिखो.

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मैंने एटीएम से पैसे निकाले
लेकिन पर्ची न निकाली,
कागज़ का एक टुकड़ा बचाया,
कोई पेड़ थोड़ा कम काटा गया होगा.
(कागज़ पेड़ से बनता है.)
इस इको-फ्रेंडली काम के बाद,
पैसों की सिगरेट खरीदी
बीच सड़क फूंकी
चे-ग्वेरा वाली टी-शर्ट से हाथ पोंछे.
आँखों में क्रांति की चमक आ गई.

 तुमने भी साहित्य अकादमी लौटाया क्या?

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तुम्हारे कार्बन फुट-प्रिंट ,
करते तुम कुछ नहीं,
बोझ हो,
मर ही जाओ

रुको! रुको!
मरने पे ज्यादा कार्बन
उत्सर्जन करोगे.
चलो! बाद में मरना.

वैसे भी धरती आदमी के बोझ तले
कहाँ ज्यादा दिन ज़िंदा रहने वाली है.

Sunday, October 11, 2015

पांच कवितायें


मोबाइल फ़ोन पे तुम्हारी मासूम शक्ल 
बन जाती है.
और जब तुम बोलते हो
तो आँखों में तुम्हारा मासूम अक्स उभर आता है.

तुमसे बात करना जैसे
पागलों को मनाना है.

तुम पैदा नहीं हुई होगी,
तुम्हें तुम्हारे माता-पिता ने
बेवकूफ़लड़की.कॉम से डाउनलोड किया होगा.

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तुम्हारा लगाना किसी को गले,
तुम्हारे अंदर बवाल कर देता है,
तुम्हारी आँखें तुम्हें धिक्कारने लगती हैं.

बीसवीं सदी में जब
देविका रानी ने भी नहीं दिया होगा
बॉलीवुड का पहला चुम्बन.
उसके पहले शायद बूढी हो चुकी थी
तू, पच्चीस बरस की वालिग लड़की!

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वैसे कुछ खास नहीं लगता तुम्हें पढ़ना,
वही सब है
जो कहा गया पहले,
बेवकूफ पोएट्स ने लिखा पहले.

खास लगता है
तुम्हें पढ़ के सोचना
कि किस गधे को अपने दिमाग में रख
इमेजिन किया होगा सबकुछ.
उफ़! तुम्हारी फैंटेसीज़.

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तुमसे बात न कर के
बस उतना सा ही दुःखी हूँ
जितना सुबह की कॉफी न मिलने पे होता हूँ.

सुबह से शाम पढ़ने में मन नहीं लगता 
और अजीब सी बैचेनी होती है.
कोशिशें होती हैं कि 
किसी तरह मिल जाये बस, एक कॉफ़ी.

मरिजुआना से ज्यादा नशा होता है
कैफीन का.
विज्ञान की कोई किताब उठा के पढ़ लो.

तुम कैफीन हो शोना.

Saturday, October 10, 2015

बेरोज़गार की किताब से


रोटियों के पैसे किसने चुकाए तुम्हारे
कॉफ़ी की ये आदत
दिन में दो दफे चाहिए तुम्हें.
पांच रूपये की पड़ती है घर बनाओ तो,
पचास की बाहर.
शुक्र है सिगरेट नहीं पीते.

तुम्हारे कपडे हैं न, ठाठ वाले,
अठरह सौ की वो शर्ट
अच्छे घर में जन्मने का फल है.
साठ प्रतिशत आबादी नहीं तो
रोटी जुगाड़ रही है,
सुबह से शाम.


तुम्हें अपने बाप से शिकायतें हैं,
जिसकी नौकरी से
बिल भरे जाते हैं तुम्हारे.
टाटा तो वो भी पैदा नहीं हुआ था.
उसने मत्था फोड़ा, हाथ-पांव-दिमाग खपाये
तब तुम पढ़ पाये.

रोटियों की दूकान पे उधारी नहीं चलती,
दोस्त बस भरम हैं,
फ़ोन कर लें एक दफ़े महीने में,
बस बहुत है.

देह वाली भी कुछ कमाती तो है.

सड़क पे पड़े पत्थर तुम,
हटो!!!

भोंदू जी की सर्दियाँ / वीरेन डंगवाल

आ गई हरी सब्जियों की बहार 
पराठे मूली के, मिर्च, नीबू का अचार 

मुलायम आवाज में गाने लगे मुंह-अंधेरे 
कउए सुबह का राग शीतल कठोर 
धूल और ओस से लथपथ बेर के बूढ़े पेड़ में 
पक रहे चुपके से विचित्र सुगन्‍धवाले फल 
फेरे लगाने लगी गिलहरी चोर 

बहुत दिनों बाद कटा कोहरा खिला घाम 
कलियुग में ऐसे ही आते हैं सियाराम 

नया सूट पहन बाबू साहब ने 
नई घरवाली को दिखलाया बांका ठाठ 
अचार से परांठे खाये सर पर हेल्‍मेट पहना 
फिर दहेज की मोटर साइकिल पर इतराते 
ठिठुरते हुए दफ्तर को चले 

भोंदू की तरह