Tuesday, October 7, 2014

Street Children



मैंने सूट पहना
टाई बांधी
चमचमाते जूते पहने,
कार की चाबी उठाई
और आईने में निहारा.
न आईना मुस्कुराया न मैं.

अक्सर सिग्नल पे
हँसते बच्चे देख सोचता हूँ-
'कचरे में ख़ुशी पलती कैसे है?'

हम पा कर भी 
बहुत कुछ खो देते हैं.
न पा कर भी
वे बहुत कुछ पा लेते हैं.

Friday, October 3, 2014

आज़ादी




               तुम्हें पता है, ख़ुदा बहुत प्यारा लिखता है. लेकिन बहुत हुनरमंद है वो, अपने लिखे हर अफ़साने को सच में बदल देता है. काश! मेरे में भी कोई ऐसा हुनर आ जाये तो मैं पहले ही अफ़साने में ख़ुदा का क़त्ल करा दूँ. ....और दुनिया को अपना नसीब खुद बुनने की आज़ादी दे दूँ. अफ़सोस मैं इतना अच्छा नहीं लिखता कि ये हुनर मुझे मिल पाये. सोचता हूँ कोई तो ऐसा लेखक पैदा होगा जो ख़ुदा से इंसान का नसीब लिखने का हक़ छीन पाये. लेकिन यकीनन उसे मुझसे अलग होना होगा. पाक-साफ़ होना होगा. ख़ुदा का हक़ छीन ख़ुदा को मारने वाले कभी ख़ुदा नहीं बन पाएंगे, कायनात इसकी इज़ाज़त नहीं देती. इंसान का हक़ छीन, इंसान को मारने वाले भी कभी इंसानियत कायम नहीं कर पाएंगे. न तो इंसानियत इसकी इज़ाज़त देती है न कायनात.
             अमन बस अहिंसा से आ सकता है. बारूद से बस ज़िंदगियाँ ली जा सकती हैं, इंतकाम लिया जा सकता है.... इंसानियत नहीं, अमन नहीं, चैन नहीं.... और आज़ादी तो बिलकुल नहीं.

Thursday, October 2, 2014

हम हैं या हम नहीं




हम हैं या हम नहीं
जहाँ पैर पड़े धुंए उठे
धुंआ रास्ता है,
मंज़िल, मंज़िल कहता जिसको 
वो मंज़िल लापता है.
मंज़िल क्या मंज़िल है?
पाने खून बहे वो क्या मंज़िल 
जो खुद खून हों तो क्या मंज़िल
हम हैं पर हम नहीं
तुम हो पर तुम नहीं
मंज़िल वो मंज़िल तो नहीं

तुम हो या तुम नहीं,
हम हैं या हम नहीं,
ऐसा कुछ हमें कबूल नहीं.
जहां तुम,
जहां हम हैं,
सुकूं है,
कल है,
मंज़िल वही.
बस मुझे कबूल यही.



Wednesday, October 1, 2014

जी पी भगत का भाव

( कभी कभी आप लिखना चाहते हो... लेकिन कुछ पढ़के लगता है... 'बस इससे अच्छा और कुछ नहीं लिखा जा सकता था.'  रवीश कुमार ऐसा ही कुछ लिख देते हैं....अक्सर ही. ...उधार लेकर उनका लिखा दूसरी बार अपने ब्लॉग पे चस्पा रहा हूँ... पढ़िये. शायद आप की ऑंखें भी गहराई में खो जायें ).

सुबह सुबह ही दफ्तर पहुंच गया। कहीं से कोई धुन सवार हो गया था कि इस स्टोरी को आज ही करनी है। दिल्ली फरीदाबाद सीमा पर मज़दूरों की विशालकाय बस्तियां बसी हैं। हम जल्दी पहुंचना चाहते थे ताकि हम उन्हें कैमरे से अचेत अवस्था में पकड़ सके। अखबारों में कोई विशेष खबरें नहीं थीं कि आज वृद्धोंं के लिए कोई दिन तय है। टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर दिखी जिसे कार में जल्दी जल्दी पढ़ने लगा। इतने प्रतिशत वृद्ध हैं। उतने प्रतिशत अकेले रहते हैं तो फलाने प्रतिशत गांव में रहते हैं तो चिलाने प्रतिशत शहर में। अपोलो अस्पताल से आगे धूल धूसरित मोहल्ले की तरफ कार मुड़ गई। वृद्ध आश्रम का बोर्ड दिखने लगा। शूटिंग ठीक से हो इसलिए पहले ही मोबाइल फोन बंद कर दिया। कभी करता नहीं पर पता नहीं आज क्यों बंद कर दिया।
सड़े गले शौचालय के पीछे का वृद्ध आश्रम। निम्नतम मध्यमवर्गीय इलाका। नियो मिडल क्लास नामकरण गरीबों के साथ धोखा है। जिसके पास किसी तरह से स्कूटर या कूलर आ जाए और उसके पास कच्चा पक्का सा मकान हो हमने उसे गरीब कहना छोड़ दिया है। नियो मिडिल क्लास हते हैं ताकि लगे कि गरीबी खत्म हो गई है। मगर इनकी गरीबी उन पैमानों से भी खूब झांकती है। खैर मैं आश्रम के  बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए अंदर आता हूं। जो देखा ठिठक गया। बहुत सारे वृद्ध। बेहतरीन साफ सफाई। डिमेंशिया और अलज़ाइमर के शिकार वृद्धों को नहलाया जा रहा था। फर्श की चमाचम सफाई हो चुकी थी। सबको कुर्सी पर बिठाया गया था। इज्जत और प्यार के साथ। कैमरा लगातार रिकार्ड किये जा रहा था।  है।
इस संस्था के संस्थापक जी पी भगत कुछ दिन पहले दफ्तर आए थे। कहा कि आपको सम्मानित करना चाहते हैं। मैंने यूं ही पूछ लिया कि काम क्या करते हैं। सुना तो कहा सम्मान छोड़िये। बहुत मिल चुका सम्मान, अब उस तरफ देखने का मन भी नहीं करता। आपका काम अच्छा है तो कभी आऊंगा मगर बताकर आऊंगा। मैं गया बिना बताये। शायद यही वजह है कि उस जगह की कुछ गहरी छाप पड़ गई। तिरासी के साल में जे एन यू से कंप्यूटर साइंस में एम फिल करने वाले जी पी भगत ने अपनी जिंदगी बुजुर्गों के लिए लगा दी है। वो उनका पखाना और पेशाब अपने हाथों से साफ करते हैं। उनके साथ काम करने वाले भी हाथ से साफ करते हैं। भगत ने बताया कि कई बुजुर्ग तो ऐसी अवस्था में दिल्ली की सड़कों से मिले कि उनमें कीड़े पड़े हुए थे। उन्हें उठाकर लाना, नहाना, साफकर दवायें लगाना ये सब करते करते एक बुजुर्ग के पीछे साल गुज़र जाते हैं तब वे कुछ सम्मान जनक स्थिति में पहुंच पाते हैं। फिर तो उसके बाद अनुभवों का जो पन्ना खुलते गया मैं सुन सुनकर नया होने लगा। जो कुछ भी भीतर बना था वो सब धाराशाही हो गया।
भगत बताये जा रहे थे। जितिन भुटानी का कैमरा रोल था। हमारे सहयोगी सुशील महापात्रा की आंखें भर आ रही थीं। मैं खुद हिल गया। फर्श की सफाई किसी अच्छे अस्पताल से भी बेहतर की गई थी. सबको प्यार से डायपर पहनाकर कुर्सी पर बिठा दिया गया था।  दो चार लोग दिल्ली के घरों से फेंक दिये गए, कुछ बुजुर्ग भटक कर लापता हो गए।  मैंने त्याग और करुणा का सर्वोच्च रूप देखा। भगत ने कहा कि लोगों को घिन आती है। पखाना पेशाब साफ करने में। इसलिए सड़कों पर छोड़ देते हैं। अस्पताल के बाहर छोड़ देते हैं। कई बुजुर्ग तो इस अवस्था में भी मिले कि उनके अंगूठों पर नीली स्याही के निशान ताज़े थे। ऐसा कई केस आ चुका है। संपत्ति के दस्तावेज़ पर अंगूठा लगवाकर इन बुजुर्गों को लोग फेंक देते हैं। स्याही सूखने का इंतज़ार भी नहीं किया।  कई लोग तो फोन कर छोड़ देते हैं कि दस बारह हज़ार का महीना ले लो लेकिन अपने पास रख लो। भगत ने कहा कि मैं काफी समझाता हूं कि अपने पास रखिये फिर उनके सामने कड़ी शर्तें रखता हूं कि मिलने नहीं दूंगा मगर कोई यह नहीं कहता कि दूर से भी देख लेने देना। मां बाप को छोड़ कर जाते हैं तो दोबारा नहीं आते। एक बेटी से कहा कि फिर नहीं आओगी तो उसने कहा मंज़ूर है। फिर कहा कि देखो अगर तुम्हारी मां गुज़र गईं तो अंतिम संस्कार भी नहीं करने दूंगा तो उस पर भी वो मान गई। ऐसे तमाम बेटों की कहानी है कि पता चल गया कि मां बाप यहां हैं। कोई लंदन है कोई लुधियाना तो कोई अफसर मगर कोई लेने नहीं आता।
भगत के पास समाज की जो हकीकत है वो न तो ओबामा के पास है न मोदी के पास न किसी पत्रकार के पास। उनका अनुभव बोले जा रहा था। बुजुर्ग औरतें और पुरुष भगत और उनके सहयोगियों को बहुत प्यार करते हैं। सोहन सिंह को हिन्दू महिला सोहन कहती है तो मुस्लिम हैदर। सोहन ने बताया कि जो नाम याद आता है इन्हें बुला लेती हैं। भगत ने कुर्सी पर कोने में दुबके पांडे जी से कहा कि ये सिर्फ केला खाते हैं। मैंने कहा कि ये कैसे पता चला। तो कहने लगे कि महीनों तजुर्बा करते करते समझ आ गया। जो डिमेंशिया या अलज़ाइमर  के मरीज होते हैं  उन्हें अपने बच्चों के नाम याद रह जाते हैं। पोते पोतियों के नाम याद रह जाते हैं। जाति याद नहीं रहती मगर धर्म याद रहता है और हां स्वाद याद रहता है। इसलिए बाकी लोग स्वादिष्ट दलिया और हार्लिक्स पी रहे हैं मगर पांडे जी केला खा रहे हैं। आश्रम के सेवक कुछ औरतों को खैनी खिला रहे थे। कहा कि इसकी आदत है नहीं दो तो रोने लगती हैं।
भगत ने अमीरी गरीबी का भी भेद खोल दिया। कहा कि कई अमीर हैं जो अपने मां बाप की खूब सेवा करते हैं। तब पता चलता है जब वे उनके गुजरने के बाद महंगी मशीने और डायपर लेकर आते हैं। दाने देने के लिए। मगर अमीर ही अपने मां बाप को सड़कों पर छोड़ देते हैं। हां लेकिन गरीब अपने मां बाप को नहीं फेंकता है। वो सेवा कर लेता है। कहा कि दान मांग कर और खुलकर मांग कर इनकी सेवा करता हूं। ऐसा हिसाब लगा रखा है कि पैसा बचेगा ही नहीं। बचने से समस्या पैदा होती है। मैंने खुद देखा। बेहतरीन साफ सफाई के साथ खाना बन रहा था। सबको अच्छे कपड़े दिये गए थे। हैदर ने बताया कि एक बार  घिन आ गई तो किसी बुजुर्ग के पखाने को ब्रश से साफ कर दिया। भगत जी तो भगाने लगे कि भागो यहां से। ब्रश से जख्म हो जाएगा। हाथ से साफ करो। अब सामान्य ही लगता है सबकुछ।
उस आश्रम में अनगिनत किस्से हैं। हर किस्सा आपको गिरा कर नए सिरे से खड़ा कर देता है। भगत जी ने कहा कि हम सबका धर्म के हिसाब से संस्कार करते हैं। हज़ार लोगों का अंतिम संस्कार कर चुका हूं। अब तो मेरे पास चार आदमी हैं मगर जब यह काम शुरू किया था तब अपने हाथ से उठाकर मृत शरीर को गली के बाहर तक ले जाता था। मुझे तो हिन्दू मां भी बेटा कहती है तो मैं हिन्दू हो गया, मुस्लिम मां भी बेटा कहती है तो मुसलमान हुआ जब मां मुसलमान है तो बेटा भी मुसलमान हुआ, ईसाई मां ने बेटा कहा तो ईसाई हो गया। उनकी इस बात ने छलका दिया मुझे। हम किन वहशी लोगों के गिरफ्त में आ जाते हैं। धर्म पहचान कर अलग कर देते हैं। आश्रम की तख्ती पर कुरान की आयतें, गुरु नानक देवजी, ईसा मसीह के बगल में दुर्गी जी, कबीर,रविदास जी।  सब एक साथ। ये होती है इंसानियत की इबादत। इंसानों को भगवान मानकर सेवा की तब भगवान एक से लगने लगे।
जो देखा खुद को काफी भरोसा देने वाला था। भगत ने कर के दिखाया है। उनके नब्बे साल के पिता ने कहा कि मैं नहीं भी रहा तो भगत के मां बाप हमेशा दुनिया में रहेंगे। इतने लोग  इसे बेटा बेटा कहते हैं तो कभी होगा ही नहीं कि इसकी कोई मां नहीं होगी, इसका कोई पिता नहीं होगा। मैं नहीं रहूंगा तो क्या हुआ। इस कहानी ने भीतर तक तर कर दिया। सहयोगी सुशील बहुगुणा ने कहा कि फुटेज देखकर रोना आ गया। मैं यही सोचता हुआ दफ्तर से निकला कि इसे कहते हैं आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था जब आप पखाने में उतरकर उसकी सेवा कर दें। कार में बैठा ही था कि कई मिस्ड काल नज़र आने लगे तो सुबह आए होंगे। सूचना मिली कि मेरी अपनी बड़की माई गुज़र गईं हैं। दो बुजुर्गों की दुनिया में बंट गया। हमारे बाबूजी को बहुत प्यार करती थी, कहती थीं मेरा देवर होता तो ये कर देता वो कर देता। छठ के समय बड़किया का बनाया रसियाव आज तक याद है। बचपन की स्मृतियों का आधार है। कसार अब नहीं खा सकेंगे। वो चली गई। इस वक्त जब मैं यह लिख रहा हूं मेरे बड़े भैया उन्हें अग्नि दे चुके हैं। बता रहे थे कि हम सब घाट पर हैं। अगर भगत से नहीं मिला होता तो इस खबर से मैं टूट जाता । मगर भगत के माता-पिता की कहानी सुनकर लगता है कि मेरी बड़किया किस्मत वाली है। उसकी बहू ने खूब सेवा की, बेटे ने भी की।  संपन्न बेटी- दामादों ने की या नहीं मालूम नहीं। किया ही होगा। बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिए मगर भगत की बातें सुनकर बिना जाने यकीन भी नहीं होता। अपने रिश्तेदारों से न के बराबर संपर्क रखता हू। भगत का स्केल देखकर ऐसा लग रहा था कि हमने भी अपने बाबूजी की कम सेवा की। मां की कम सेवा करता हूं। मुझे लगता है कि बहुत ख्याल रखता हूं मगर कोई भगत के भाव की बराबरी नहीं कर सकता है।
--रवीश कुमार, क़स्बा ब्लॉग पे ( 'चल गईलू नू बड़की माई' शीर्षक से )


Saturday, September 27, 2014

थोड़ा इंतज़ार कर, बस ज़रा सा....



कुछ और इंतज़ार कर
कुछ और अरब वर्ष बस.
तोड़ लाऊंगा सितारे
ज़रा उन्हें और पकने दे,
सुर्ख लाल होने दे.
शनि की वो बेहद खूबसूरत बलाएँ,
उफ़! चमक चमक जो
ब्रह्माण्ड का दिल जलाती हैं
तेरे कानों की बालियां बनाऊंगा.
और वो जुपिटर के चाँद
सुना है ढेरों हैं,
मोतियों सा तेरे गले में पहनाऊंगा.

तेरे लिए चाँद सितारे तोड़ लाऊंगा
ज़रा उन्हें और पकने दे
थोड़ा इंतज़ार कर
बस ज़रा सा....
बस कुछ अरब वर्ष और....

Thursday, September 25, 2014


उल्लास तुम ही, उद्गार तुम ही 
स्वयं का उद्धार तुम ही.
तीर खड़े क्या सागर खोजोगे
बैठ थके क्या पाओगे 
स्वयं वृक्ष काट यहीं
नौका खुद की गड लो
तूफानों को चेताओ 
खुद लहरों पे चढ़ लो. 

--*--

जिसे हार का डर नहीं 
न मौत का  भय हो 
स्वयं भरोसे जो भिड़े 
जीत उसी की तय हो. 

--*--

डर क्या डरायेगा 
तू डर को डरा भगा दे
मौत को कचहरी ले जा 
मौत की सज़ा सुना दे. 

Tuesday, September 16, 2014

यह रास्ता शहीद होने का है

     सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले को समझ लेना चाहिए कि यह रास्ता शहीद होने का रास्ता है। सत्य और अहिंसा के रास्ते पर जो कोई इफेक्टिव( परिणामात्मक), काम करेगा वह एक न एक दिन मारा जाएगा। सत्य और अहिंसा का रास्ता दुनिया नहीं सह सकती। बापू जी की जीवनी को देखिये, उन्हें जब दूसरा कोई मारने के लिए तैयार नहीं होता था तो वे अपनी आत्माहुति देने पर तुल जाते थे। अपने मारे जाने के मौके पैदा कर देते थे। अभी मानवता की इतनी प्रगति नहीं हुई है कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर मज़बूती से चलने वाला भी न मारा जाए। आपको अपनी आहुति देने के मौके पैदा करने होंगे। आपकी किस्मत अच्छी होगी तो नहीं मारे जाएंगे। लेकिन शायद मारे जाने पर आप की दैवीशक्ति सफल होगी। अगर कांग्रेस ने कुर्बानी कारास्ता छोड़ दिया तो उसका काम न चलेगा। कुर्बानी का रास्ता गांधी जी दिखा गए हैं। उस हुतात्मा के रास्ते पर हम को चलना है। अगर हम में दम है तो गांधीजी के नाम पर नहीं बिकेंगे। उनकी जो चीज़ हम को जंचेगी उसे लेंगे, जो नहीं जंचेगी उसे छोड़ देंगे। लेकिन सत्य और अहिंसा की राह हरगिज़ न छोड़ेंगे। यही बापू का सच्चा रास्ता है।

-आचार्य जे बी कृपलानी (14 मार्च 1948, यह हिस्सा रवीश कुमार ने आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट से प्रकाशित शहादत का रास्ता से लिया है। 011-23234190)

( रवीश कुमार के ब्लॉग 'कस्बा'  से साभार।)


Saturday, September 13, 2014

हक़



मैं तुम्हारे ज़िस्म में
अनाज उगा दूंगा,
धान बो दूंगा
फिर कहूँगा-
तुम ज़मीन हो
और इसपर मेरा हक़ है.

हक़ हमेशा का सबल का होता है
देखो धर्म में भी यही लिखा है.
सात अक्षौहिणी सेनाएं
जिनके तमाम सैनिक मारे गए,
तमाम विधवाएं बिलखती रहीं.
उनके बच्चे आज भी सड़क पर
भीख मांगते हैं,
कचरा बीनते हैं.
लेकिन हक़ पांडवों के हाथ आया.
यश, साम्राज्य, जीत, सबकुछ.
और देखो उनके साथ ईश्वर था,
कृष्ण चक्र और बांसुरी लिए साथ खड़े थे.
बांसुरी से विधवाएं बहला रहे थे
चक्र से आंदोलन-कारियों को डरा रहे थे.
देखो, मैंने कहा था न,
भगवान सबल के साथ होता है.

हाँ, तो तुम जब
मेरे हक़ में आ जाओगे
तो मैं तुम्हारे चारों तरफ
नालियां खोद दूंगा,
जिनमें तुम्हारा खून बहेगा, पानी नहीं.
जो तुम्हें ज्यादा उर्वरक बनाएगा
और मुझे ज्यादा फायदा पहुँचायेगा.

क्यूंकि मुझे बस फायदे से मतलब है
चाहे तुम मरो,
देश बिके
या खण्ड खण्ड हो.
तेलंगाना, झारखण्ड हो,
उन्तीस खण्ड या हज़ार खण्ड हो.
क्यूंकि मैं
सरकार हूँ, निकम्मा हूँ.
मेरे पांव के नीचे
भुखमरी से लाशें बिछ जाती हैं
और मैं दूरबीन ले
अन्न बांटने गरीब तलाशता रहता हूँ,
फायदा इसी दूरदर्शिता से आता है,
सरकारें ऐसे ही बनती हैं,
नेता महान ऐसे ही होते हैं,
और इतिहास के पन्नों में जगह पाते हैं.

हज़ार साल से
कवि चिल्ला रहा है.
पहले चंदबरदाई चिल्लाया,
राजा नहीं बदले
औरतें पाने बलि चढ़ गए,
पृथ्वीराज मारा गया.
फिर कबीर चिल्लाया
न हिन्दू बदले, न मुस्लमान,
तब भी कट रहे थे,
आज भी कट रहे हैं.
बाद मैं रैदास चिल्लाया-
'सब जन इक समाना'
लेकिन अछूत आज भी अछूत ही हैं!

चिल्लाते-चिल्लाते ये कवि भी मर जाएगा,
वो धान बो देंगे,
तुम्हें ज़मीन बना देंगे
तुम न बने तो
धर्म से बहका देंगे,
खरीद लेंगे.
क्यूंकि उनके पास बल है
और हक़ और ईश्वर सबल का है!

Friday, September 12, 2014

ग़दर



ये सरकारें
जिन्हे कहने-सुनने की
ज्यादा आदत नहीं है,
जिन्हें बस तोपों की भाषा आती है.
जिनके सामने
गांधी, नेल्सन और लूथर
चिल्लाते, दहाड़ते, सर पटकते रहे
और एक दिन मर गए.

इन सरकारों से
मैं कहता हूँ,
समाज जाग रहा है
सम्हल जा.
लोगों की आँखों में गुस्सा है,
हाथ में पत्थर
और दिल में मजबूत इरादे हैं.
सरकारो, तुम्हें बदलना होगा,
क्यूंकि मुल्क की गुलाम जनता
अपनी नियति अपने हाथ से
लिखने पे आमदा है,
आज मजबूत इरादा कर के आई है.

सरकार बिलबिलाती है,
थोड़ा शोर, फिर ठहर जाती है.
हा! हा! कर जोर से
अट्ठहास लगाती है
और मुझे विक्षिप्त कहती है.
मैं समझ नहीं पाता हूँ
क्यूंकि कवि सरकारें नहीं होते
सच होते हैं,
और सरकारें कवि नहीं होती
प्रपंच होती हैं.

मैं यानि कवि की कलम
किसी नाली में टूटी मिलती है
और मेरी लाश
किसी चौराहे पे लटकती.

वह समाज जो बदलने पे आमदा था,
उसका नेता फरार है,
शायद कभी लौट के न आ पाये.
समाज, जनता सब चुप हैं,
जैसे दही जमा हो होंटों पे
या सौ-सौ के कई नोटों को
मुंह में चिपका
उनकी बोलती बंद कर दी गयी हो.

हे! क्रान्तिकारियो,
ग़दर का चिराग जलाने से पहले
ज़रा बचना, सोचना
क्यूंकि ये सरकारें
तुम्हें भी खरीदना जानती हैं.

हे! युवको, युवतियों
कोई भी आंदोलन
समाज के उत्थान के लिए करना
अपने स्वार्थ के लिए नहीं,
अपने नैतिक पतन के लिए नहीं.

कवि तो जन्म से वैधव्य ओढ़ के आया है
उसके कहे का असर नहीं होता,
उसका मरना खबर नहीं होती.
पर तुम बचा लो,
अपनी नैतिकता, अपना कल,
अपनी क्रांति, अपना मुल्क.


Thursday, September 11, 2014

"Be Yourself" : Enrique Iglesias





Well I am, what I am, what I am, could be who you are?
Is your pain, when you smile 'cos you built a wall around your heart?
Do the thoughts in your head keep you up 'cos you feel alone?
(Thoughts in your head, thoughts in your head, thoughts in your head)
And are you strong enough to be yourself?
(Be yourself)


My papa used to say
You're just a loser
And you're never gonna have what it takes
Mama used to say
All that loud music you play ain't gonna get you nowhere


Na naa, you gotta be yourself
Na naa, you gotta be yourself


If you cried, would you hide?
Would you want all the world to know?
And if you believe in love, would you let it show?
Are you in, are you hip, are you cool?
Do you try too hard
Or are you strong enough to be yourself?
(Be yourself)
Wait


My papa used to say
You're just a loser
And you're never gonna have what it takes
Mama used to say
All that loud music you play ain't gonna get you nowhere


My papa used to say
You're just a loser
And you're never gonna have what it takes
Mama used to say
All that loud music you play ain't gonna get you nowhere


Na naa, you gotta be yourself
Na naa, you gotta be yourself
(Be yourself, be yourself)


If you can't, can't oh, be yourself what are you living for?
If you can't, can't oh, be yourself you're gonna lose it all
If you can't, can't oh, be yourself what are you living for?
You're gonna find someday, you gotta run away
You gotta run, run, run, run away


My papa used to say
You're just a loser
And you're never gonna have what it takes
Mama used to say
All that loud music you play ain't gonna get you nowhere


Na naa, you gotta be yourself
Na naa, you gotta be yourself
Na naa, you gotta be yourself
Na naa, you gotta be yourself