Friday, September 5, 2014

हरिजन गाथा - नागार्जुन


(1977 में बिहार में हुए हरिजन-नरसंहार के बाद, जिसमें 13 लोग ज़िंदा जलाये गए थे.)

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(एक)

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था !
महसूस करने लगीं वे
एक अनोखी बेचैनी
एक अपूर्व आकुलता
उनकी गर्भकुक्षियों के अन्दर
बार-बार उठने लगी टीसें
लगाने लगे दौड़ उनके भ्रूण
अंदर ही अंदर
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
हरिजन-माताएँ अपने भ्रूणों के जनकों को
खो चुकी हों एक पैशाचिक दुष्कांड में
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं--
तेरह के तेरह अभागे--
अकिंचन मनुपुत्र
ज़िन्दा झोंक दिये गए हों
प्रचण्ड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन सम्पन्न ऊँची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा !
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
महज दस मील दूर पड़ता हो थाना
और दारोगा जी तक बार-बार
ख़बरें पहुँचा दी गई हों संभावित दुर्घटनाओं की

और, निरन्तर कई दिनों तक
चलती रही हों तैयारियाँ सरेआम
(किरासिन के कनस्तर, मोटे-मोटे लक्क्ड़,
उपलों के ढेर, सूखी घास-फूस के पूले
जुटाए गए हों उल्लासपूर्वक)
और एक विराट चिताकुंड के लिए
खोदा गया हो गड्ढा हँस-हँस कर
और ऊँची जातियों वाली वो समूची आबादी
आ गई हो होली वाले 'सुपर मौज' मूड में
और, इस तरह ज़िन्दा झोंक दिए गए हों

तेरह के तेरह अभागे मनुपुत्र
सौ-सौ भाग्यवान मनुपुत्रों द्वारा
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...

(दो)

चकित हुए दोनों वयस्क बुजुर्ग
ऐसा नवजातक
न तो देखा था, न सुना ही था आज तक !
पैदा हुआ है दस रोज़ पहले अपनी बिरादरी में
क्या करेगा भला आगे चलकर ?
रामजी के आसरे जी गया अगर
कौन सी माटी गोड़ेगा ?
कौन सा ढेला फोड़ेगा ?
मग्गह का यह बदनाम इलाका
जाने कैसा सलूक करेगा इस बालक से
पैदा हुआ बेचारा--
भूमिहीन बंधुआ मज़दूरों के घर में
जीवन गुजारेगा हैवान की तरह
भटकेगा जहाँ-तहाँ बनमानुस-जैसा
अधपेटा रहेगा अधनंगा डोलेगा
तोतला होगा कि साफ़-साफ़ बोलेगा
जाने क्या करेगा
बहादुर होगा कि बेमौत मरेगा...
फ़िक्र की तलैया में खाने लगे गोते
वयस्क बुजुर्ग दोनों, एक ही बिरादरी के हरिजन
सोचने लगे बार-बार...
कैसे तो अनोखे हैं अभागे के हाथ-पैर
राम जी ही करेंगे इसकी खैर
हम कैसे जानेंगे, हम ठहरे हैवान
देखो तो कैसा मुलुर-मुलुर देख रहा शैतान !
सोचते रहे दोनों बार-बार...

हाल ही में घटित हुआ था वो विराट दुष्कांड...
झोंक दिए गए थे तेरह निरपराध हरिजन
सुसज्जित चिता में...

यह पैशाचिक नरमेध
पैदा कर गया है दहशत जन-जन के मन में
इन बूढ़ों की तो नींद ही उड़ गई है तब से !
बाक़ी नहीं बचे हैं पलकों के निशान
दिखते हैं दृगों के कोर ही कोर
देती है जब-तब पहरा पपोटों पर
सील-मुहर सूखी कीचड़ की

उनमें से एक बोला दूसरे से
बच्चे की हथेलियों के निशान
दिखलायेंगे गुरुजी से
वो ज़रूर कुछ न कु़छ बतलायेंगे
इसकी किस्मत के बारे में

देखो तो ससुरे के कान हैं कैसे लम्बे
आँखें हैं छोटी पर कितनी तेज़ हैं
कैसी तेज़ रोशनी फूट रही है इन से !
सिर हिलाकर और स्वर खींच कर
बुद्धू ने कहा--
हां जी खदेरन, गुरु जी ही देखेंगे इसको
बताएँगे वही इस कलुए की किस्मत के बारे में
चलो, चलें, बुला लावें गुरु महाराज को...

पास खड़ी थी दस साला छोकरी
दद्दू के हाथों से ले लिया शिशु को
संभल कर चली गई झोंपड़ी के अन्दर

अगले नहीं, उससे अगले रोज़
पधारे गुरु महाराज
रैदासी कुटिया के अधेड़ संत गरीबदास
बकरी वाली गंगा-जमनी दाढ़ी थी
लटक रहा था गले से
अँगूठानुमा ज़रा-सा टुकड़ा तुलसी काठ का
कद था नाटा, सूरत थी साँवली
कपार पर, बाईं तरफ घोड़े के खुर का
निशान था
चेहरा था गोल-मटोल, आँखें थीं घुच्ची
बदन कठमस्त था...
ऐसे आप अधेड़ संत गरीबदास पधारे
चमर टोली में...

'अरे भगाओ इस बालक को
होगा यह भारी उत्पाती
जुलुम मिटाएँगे धरती से
इसके साथी और संघाती 

'यह उन सबका लीडर होगा
नाम छ्पेगा अख़बारों में
बड़े-बड़े मिलने आएँगे
लद-लद कर मोटर-कारों में

'खान खोदने वाले सौ-सौ
मज़दूरों के बीच पलेगा
युग की आँचों में फ़ौलादी
साँचे-सा यह वहीं ढलेगा

'इसे भेज दो झरिया-फरिया
माँ भी शिशु के साथ रहेगी
बतला देना, अपना असली
नाम-पता कुछ नहीं कहेगी

'आज भगाओ, अभी भगाओ
तुम लोगों को मोह न घेरे
होशियार, इस शिशु के पीछे
लगा रहे हैं गीदड़ फेरे

'बड़े-बड़े इन भूमिधरों को
यदि इसका कुछ पता चल गया
दीन-हीन छोटे लोगों को
समझो फिर दुर्भाग्य छ्ल गया

'जनबल-धनबल सभी जुटेगा
हथियारों की कमी न होगी
लेकिन अपने लेखे इसको
हर्ष न होगा, गमी न होगी

' सब के दुख में दुखी रहेगा
सबके सुख में सुख मानेगा
समझ-बूझ कर ही समता का 
असली मुद्दा पहचानेगा

' अरे देखना इसके डर से
थर-थर कांपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के- गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे

'इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा
अजी देखना, इसके लेखे
जंगल में ही मंगल होगा

'श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सब का उद्धार करेगा
आज यह सम्पूर्ण क्रान्ति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा

'हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तकरार करेंगी...'

इतना कहकर उस बाबा ने
दस-दस के छह नोट निकाले
बस, फिर उसके होंठों पर थे
अपनी उँगलियों के ताले

फिर तो उस बाबा की आँखें
बार-बार गीली हो आईं
साफ़ सिलेटी हृदय-गगन में
जाने कैसी सुधियाँ छाईं

नव शिशु का सिर सूंघ रहा था
विह्वल होकर बार-बार वो
सांस खींचता था रह-रह कर 
गुमसुम-सा था लगातार वो

पाँच महीने होने आए
हत्याकांड मचा था कैसा !
प्रबल वर्ग ने निम्न वर्ग पर
पहले नहीं किया था ऐसा !

देख रहा था नवजातक के
दाएँ कर की नरम हथेली
सोच रहा था-- इस गरीब ने
सूक्ष्म रूप में विपदा झेली

आड़ी-तिरछी रेखाओं में
हथियारों के ही निशान हैं
खुखरी है, बम है, असि भी है
गंडासा-भाला प्रधान हैं

दिल ने कहा-- दलित माँओं के
सब बच्चे अब बागी होंगे
अग्निपुत्र होंगे वे अन्तिम
विप्लव में सहभागी होंगे

दिल ने कहा--अरे यह बच्चा
सचमुच अवतारी वराह है
इसकी भावी लीलाओं की
सारी धरती चरागाह है

दिल ने कहा-- अरे हम तो बस
पिटते आए, रोते आए !
बकरी के खुर जितना पानी
उसमें सौ-सौ गोते खाए !

दिल ने कहा-- अरे यह बालक
निम्न वर्ग का नायक होगा
नई ऋचाओं का निर्माता
नए वेद का गायक होगा

होंगे इसके सौ सहयोद्धा
लाख-लाख जन अनुचर होंगे
होगा कर्म-वचन का पक्का
फ़ोटो इसके घर-घर होंगे

दिल ने कहा-- अरे इस शिशु को
दुनिया भर में कीर्ति मिलेगी
इस कलुए की तदबीरों से
शोषण की बुनियाद हिलेगी

दिल ने कहा-- अभी जो भी शिशु
इस बस्ती में पैदा होंगे
सब के सब सूरमा बनेंगे
सब के सब ही शैदा होंगे

दस दिन वाले श्याम सलोने
शिशु मुख की यह छ्टा निराली
दिल ने कहा--भला क्या देखें
नज़रें गीली पलकों वाली
थाम लिए विह्वल बाबा ने
अभिनव लघु मानव के मृदु पग
पाकर इनके परस जादुई
भूमि अकंटक होगी लगभग
बिजली की फुर्ती से बाबा
उठा वहां से, बाहर आया
वह था मानो पीछे-पीछे
आगे थी भास्वर शिशु-छाया

लौटा नहीं कुटी में बाबा
नदी किनारे निकल गया था
लेकिन इन दोनों को तो अब
लगता सब कुछ नया-नया था

(तीन)

'सुनते हो' बोला खदेरन
बुद्धू भाई देर नहीं करनी है इसमें
चलो, कहीं बच्चे को रख आवें...
बतला गए हैं अभी-अभी
गुरु महाराज,
बच्चे को माँ-सहित हटा देना है कहीं
फौरन बुद्धू भाई !'...
बुद्धू ने अपना माथा हिलाया
खदेरन की बात पर
एक नहीं, तीन बार !
बोला मगर एक शब्द नहीं
व्याप रही थी गम्भीरता चेहरे पर
था भी तो वही उम्र में बड़ा
(सत्तर से कम का तो भला क्या रहा होगा !)
'तो चलो !
उठो फौरन उठो !
शाम की गाड़ी से निकल चलेंगे
मालूम नहीं होगा किसी को...
लौटने में तीन-चार रोज़ तो लग ही जाएँगे...
'बुद्धू भाई तुम तो अपने घर जाओ
खाओ,पियो, आराम कर लो
रात में गाड़ी के अन्दर जागना ही तो पड़ेगा...
रास्ते के लिए थोड़ा चना-चबेना जुटा लेना
मैं इत्ते में करता हूं तैयार
समझा-बुझा कर
सुखिया और उसकी सास को...'

बुद्धू ने पूछा, धरती टेक कर
उठते-उठते--
'झरिया,गिरिडिह, बोकारो
कहाँ रखोगे छोकरे को ?
वहीं न ? जहाँ अपनी बिरादरी के
कुली-मज़ूर होंगे सौ-पचास ?
चार-छै महीने बाद ही
कोई काम पकड़ लेगी सुखिया भी...'
और, फिर अपने आप से
धीमी आवाज़ में कहने लगा बुद्धू
छोकरे की बदनसीबी तो देखो
माँ के पेट में था तभी इसका बाप भी
झोंक दिया गया उसी आग में...
बेचारी सुखिया जैसे-तैसे पाल ही लेगी इसको
मैं तो इसे साल-साल देख आया करूँगा
जब तक है चलने-फिरने की ताकत चोले में...
तो क्या आगे भी इस कलु॒ए के लिए
भेजते रहेंगे खर्ची गुरु महाराज ?...

बढ़ आया बुद्धू अपने छ्प्पर की तरफ़
नाचते रहे लेकिन माथे के अन्दर
गुरु महाराज के मुंह से निकले हुए
हथियारों के नाम और आकार-प्रकार
खुखरी, भाला, गंडासा, बम तलवार...
तलवार, बम, गंडासा, भाला, खुखरी...


-नागार्जुन बाबा (१९७७)

Monday, August 25, 2014

रतजगा और प्रेम

तुम्हारा रूप,
जैसे चांदनी में माता का रतजगा कर-कर निखारा हो.
रतजगे की दिव्य-ध्वनि जैसे
समा गयी हो तुममें.
अंग-रंग मंत्रित सा लगता है!
बचपन से लाल चुनरी में माता
सबसे सौम्य लगती थी,
अब तुम्हारा चेहरा भी.

उफ़! हटो नज़रों से,
ज़रा दुनिया भी दिखने दो-
फायदे-नुकसान, सौदे-रेजगारी.

दुनिया बनियों की है,
प्रेमियों की नहीं! 

Friday, August 15, 2014

मेरे हिस्से की आज़ादी


1.
जिन्होंने कभी हमसे पानी माँगा,
संग बैठ रोटी खाई
प्यार से पुचकार देशहित में मुफ्त ज़मीनें मांगी,
अपने बड़े-बड़े मॉल बनाये.
मैं जब लौट के थका-मांदा वहां गया,
उन्होंने कहा-
'पानी बीस रूपये, एक लीटर'.

(Inspired from  'Shanghai' Film)
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2.
पहले मेरे हिस्से आज़ादी आई, फिर मशीनें
उन्होंने अपने घर बनाये मेरी ज़मीनों पे
अपनी फसल बोई मेरी फसलों पे
उससे जो उगा वो बारूद था
जो मुझपे ही दागा गया.

पहले मेरे हिस्से आज़ादी आई, फिर मशीनें.
फिर मेरे हिस्से की आज़ादी उनकेे हिस्से आई.




Tuesday, August 12, 2014

Robin Williams




रौशनी रोती है
अँधेरा न मिला उसे मिटाने.
कलम चुभती रही
मुझे ख़याल न मिले.
दम्भ बैचेन है
कहीं किसी पे अकड़ निकालने,
इंसान खुरापात करने सड़क पे
आधा-तिरछा चल रहा है.

उफनती नदी में गिर जाएगी दुनिया एक दिन
किताबों के होंगे क़त्ल
संभावनाएं सारी रो पड़ेगी
आख़िरी कवि कर लेगा आत्महत्या.
विदूषक तुम बताओ क्या करोगे?
कॉफ़ी में मिला ज़हर पी लेना
मुखौटा हटा दुनिया को दिखाना
असली चेहरा-
तुड़ा-मुड़ा चेहरा, जिसपे आंसुओं के मोटे धब्बे हैं.

मैं आदम के आखिरी वंशज के मरने का इंतज़ार कर रहा हूँ,
तब तक मोड़ के भिखारी को
एक रुपया देता रहूंगा.

घास का स्केच


तुम हरी घास हो
जिसपे बैठ दो सुकून के पल बिताना चाहता हूँ.
शबनम की महक महसूस करता हूँ.
एक दौर से मैंने कोई पेंटिंग नहीं की
तुम्हें ही रंगता रहा मैं.
मैं भिखारी नहीं जो रिश्ते मांगता,
आज नया स्केच बनाया है
जला के तुम्हें.
'भारत भवन' में लोगो ने कहा
'अब तक का सबसे खूबसूरत काम.'
तुम्हारे खून के धब्बे किसी को नहीं दिखे
न मेरा ताप!

खीझ जाता हूँ कि
इस दौर के लोगों को कविता समझ नहीं आती.
मेरी तो बिलकुल न आएगी.

पोपले मुंह मैं बैठना चाहता हूँ,
शबनम कि महक लेना चाहता हूँ.
ये घास तू भी तो पीली पड़ गई है.


Tuesday, July 15, 2014

लप्रेक (लघु प्रेमकथायें)



         कभी कभी ख़ुदा के कान में बड़ी जोर से चिल्लाने का मन करता है.... लगता है उठा दूँ सोते से. ज़िंदगियाँ लेने से पहले के हिसाब ठीक करे.

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       'उस रात तुम चाँद लग रहे थे...सच कह रहा हूँ... बस मेरे आसमान पे नहीं छाये थे.'  किसी ज़माने में किसी ने लिखा था, महबूब के निकाह को लेकर....सोचता हूँ, उस वक़्त उसके दिल में क्या चल रहा होगा?

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      'तुम नहीं समझोगे, तुमने मोहब्बत नहीं की कभी.' जॉब छोड़ के जाते-जाते वो मुझसे बोलती है..... दो साल बाद- 'इश्क़ करोगे हमसे?' वही है. 'तुम्हें बड़े दिन बाद पता चला कि मैंने भी इश्क़ किया था.' मैं धीरे से उसके कान में फुसफुसाता हूँ.

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    'लड़कियों का संघर्ष तो जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है.' वो टूटी-फूटी हिंदी में बोलती है. बड़ा दीर्घ बोल के भी खिलखिला रही है. शायद अबतक कुर्बानियों की आदत हो गयी है.

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    'पता है,अगर मेरी कुछ प्रायोरिटी नहीं होती तो तुमसे मैं शादी कर लेती....यू आर जैम'  वो कहती है.
'मेरी वाली ने भी यही कहा था.' मैं कहता हूँ.
    एक सन्नाटा सा पसर गया है, जिसे कोई तोड़ने की कोशिश नहीं करता.

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    'तुम अपने पहले प्यार से शादी नहीं कर पाते..... गर कर भी लेते हो तो फिर उतना खूबसूरत नहीं बचता.' वो धीरे से कान में कहता है.
   उसकी पत्नी मुस्कुरा रही है. धीरे-धीरे वो मुस्कान मुझे फेक लगने लगती है.
   उसने अपने स्कूल टाइम प्यार से शादी की थी.

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   'सबके अपने-अपने ग़म हैं, तुम भी अपने के साथ जी लो.' आज के दिन की एक और फ़क़त फिलॉसोफी मिलती है.


Tuesday, July 8, 2014

डेमोक्रेसी




मैं कहता हूँ
डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.

चुपचाप से चले जाओ बारिश में
भीगकर कौन सा पिघलने वाले हो,
कौन सा पत्थरों पे चल एड़ियां घिस जाएँगी.
अस्तित्व के इशारे पे बकलोली मत करो अब,
कौन सा तुम मरे तो धरती कांपने लगेगी.

चार किताबों के पांच सिद्धांत और
नर्मदा बचाओ चिल्लाने से भी कहीं कुछ बचता है?
तुम्हारे शरीर से बस
आग जला रोटियां सेंकी जा सकती हैं.
तुम्हारी जमीन पे फैक्ट्रियां धुआं उगल सकती हैं,
उस धुएं में तुम्हारी लाशें भी न दिखेंगी किसी को.
तुम्हारी बेटियां बस मरने के लिए बनी हैं,
जिस्म लूट लेंगे, दहेज़ को जला देंगे,
बचीं तो गांव में नंगा घुमा देंगे.

पूजते रहो अनाप-शनाप 'ब्लडी गॉड्स',
इन्ही के नामों पे चढ़ तुम्हारे जिस्म नौंचे जायेंगे.
तुम नहीं समझोगे कि तुम्हारे आराध्य तुम्हें ही मारेंगे.
तुम्हारी शिक्षा को नशे में दे देंगे-
राष्ट्रहित, वक़्त और बदलाव, या थोड़ी अक्ल बची रही तो
अबकी बार, तबकी बार के चार नारे.
डेढ़-लाख करोड़ के ज़ीरो गिने हैं?
इतने में हमारे कुत्ते का पेट भी नही भरता!

'उन्हें डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.'
लपक के मेरे सीने से बारूद पार हो जाता है.
अगली आवाजें 'डेमोक्रेसी...', 'डेमोक्रेसी...' चिल्लाती हैं,
खद्दर को साफ़ कर वो कहते हैं...' ब्लडी फूल्स'.

Sunday, July 6, 2014

‘मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को सिसकते हुए बरतन मांजते देखा’ : संदीप कुमार


           वह अन्ना आंदोलन का दौर था. ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना’ का बोलबाला था. दिल्ली पूरी तरह अन्नामय हो चुकी थी. जंतर मंतर देश का सबसे नया पिकनिक स्पॉट था जहां वीकेंड पर मध्यवर्गी युवा सपरिवार क्रांति करने जाते थे और पिकनिक के साथ अपने व्यक्तिवादी जीवन के तमाम अपराधबोध भी कम कर आते थे. यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे हमारे गांव का साहूकार हर साल बिना नागा गंगा नहाने जाता है और इस तरह साल-भर डंडी मारने के पाप का भी प्रायश्चित कर आता है.
मैं भी उन दिनों क्रांति मोड में था और तमाम दोस्तों को अन्ना आंदोलन के संचालकों की ओर से मिलने वाले एसएमएस फॉरवर्ड करता रहता था जिनमें लिखा होता था कि एक बूढ़ा आदमी चिलचिलाती धूप में देश के लिए लड़ रहा है और आप अपने घर में आराम से बैठे हैं, आप अब नहीं तो कब निकलेंगे, आदि-आदि. उस दिन मैं आंदोलन स्थल पर पहुंचा तो धूप बहुत तेज थी और मुझे थोड़ी भूख भी लगी थी. मैं थोड़ा टहलता हुआ आगे डोसे की एक दुकान तक पहुंचा. वहां 15 साल का चे ग्वेरा (एक बच्चा जिसने चे ग्वेरा की तस्वीर छपी टी-शर्ट पहन रखी थी) अपने मालिक की मार खा रहा था. पता चला कि मेज साफ करते समय उसका पोंछा झक्क सफेद कपड़े वाले कुछ क्रांतिकारियों से जा टकराया था.
फिर भी, मैंने उसके मालिक से पूछा, ‘क्यों मार रहे हो इसे’
‘**मी है जी साला! एक नंबर का कामचोर.’ वह बोला.
‘पता है न बाल श्रम कानूनन अपराध है. नाप दिए जाओगे.’ मुझे थोड़ा गुस्सा आया.
‘नहीं जी लेबर कहां है. ये तो घर का लड़का है. भतीजा है मेरा.’ दुकान वाला सकपकाया.
‘कहां घर है बेटा?’ मैंने उस लड़के को पुचकार पूछा
‘कठपुतली कॉलोनी.’ वह बोला.
दुकानवाला अब नजरें चुराने लगा था.
लेकिन इस बीच वहां डोसा खाने आए युवा क्रांतिकारियों की सहनशक्ति समाप्त हो चली थी. वे दुकानवाले पर चिल्ला रहे थे. दुकानवाला लड़के का हाथ पकड़कर दुकान के अंदर चला गया था.
अब मैं युवाओं के उस समूह की ओर मुखातिब हुआ. शायद मेरे हावभाव देखकर उनको लगा होगा कि अब मैं कुछ ज्ञान बांटने की कोशिश करूंगा. मुझे दिखाते हुए उनमें से एक-दो जानबूझकर उबासियां लेने लगे. तीसरे ने अपना मोबाइल निकालकर इयर फोन कान में लगा लिया. चौथी जो एक लड़की थी वह अपने बाजू वाले को बताने लगी कि स्नैपडील पर जींस और कुरतों में भारी डिस्काउंट है.
उनके लिए मैं वहां अनुपस्थित था. मेरी भूख मर चुकी थी और मैं तेजी से अप्रासांगिक महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था. मुझे लगा कि मुझे पुलिस को फोन करके बता देना चाहिए कि जंतर मंतर पर यानी देश के प्रमुख आंदोलन स्थल पर प्रशासन की नाक के नीचे बाल श्रम और मारपीट के रूप में दो-दो अपराध हो रहे हैं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका.
मुझे अचानक याद आया कि मुझे तो अभी आधे घंटे में ऑफिस के लिए निकलना है वरना लेट हो जाऊंगा. मुझे यह भी लगा कि पुलिस कंप्लेंट के बाद अगर किसी तरह का मुकदमा दर्ज हो गया तो मुझे शायद मुफ्त में अदालती चक्कर भी लगाने होंगे. मैं आंदोलन स्थल की ओर जा रहा था और लगातार यह सोच रहा था कि यह एक फोन कॉल मेरी व्यवस्थित
‘मेरी भूख मर चुकी थी और मैं तेजी से अप्रासांगिक महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था’
जिंदगी में कितनी अव्यवस्था पैदा कर सकती थी? मैंने राहत की सांस ली और वहां से चल दिया.
उस दिन वहां से निकलते-निकलते मैंने यह भी सोचा कि अब ऐसी जगहों पर बगैर ऑफिशियल असाइनमेंट के नहीं जाऊंगा. रही बात ‘क्रांति’ में योगदान की तो मैं अपने एसएमएस पैक का पूरा लाभ उठाऊंगा. मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को उस दुकान के पीछे सिसकते हुए बरतन मांजते देखा था. बैकग्राउंड में पुरानी वाली शहीद फिल्म का गाना बज रहा था, ‘वतन की राह पर वतन के नौजवां शहीद हों’.
(  An Article by संदीप कुमार  in Tehalka Hindi Magazine http://tehelkahindi.com )

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 12, Dated 30 June 2014)

Wednesday, June 25, 2014

इश्क़ किनारे ताकें चाँद




यूँ रातभर क्यों जलता चाँद?
किस बेवफा को तड़पता चाँद?

फलक किनारे झुका हुआ
कितना बेनूर बेवस चाँद.
दिनभर ज्वर में तपता रहा
रातभर छत पे जलता चाँद.

महबूब निकाही धरती पे,
रात फलक पे ताके चाँद.
टुकुर -टुकुर टूटे दिल
रात फलक से ताके चाँद.

अजनबी  से कुछ हम,
अजनबी से कुछ तुम,
बीती यादें कुतरें बैठे
इश्क़ किनारे ताकें चाँद.

Tuesday, June 10, 2014

हम मुसाफिर ऐसे...




थका हूँ, गिरा हूँ
लेकिन आशान्वित तो पड़ा हूँ.
उठूंगा, लड़ूंगा, चलूँगा,
उम्मीद है,
उम्मीद से अधिक दौडूंगा.

ठहरा नहीं, रुक नहीं,
धीमा, मगर चल रहा हूँ.
जो सोचा,
कर रहा हूँ.

मैं बस चलना चाहता हूँ
नए-नए रास्तों से,
जिसका पता सफर में निकलने से पहले
मालूम ना हो.

'हमको तो बस तलाश नए रास्तों की है,
हम हैं मुसाफिर ऐसे जो मंज़िल से आये हैं.'*



*जावेद अख्तर साहब से उधार ली गईं दो लाइनें, जिनके बिना शायद ये कविता अधूरी लगती.

Pic : लोनावला का कहीं, कोई रास्ता.