Wednesday, November 13, 2013

रूह का क़त्ल

तुम्हारे घर में रखे है
मेरे दिन के क़त्ल के सामान
तुम खुद हो
रात के क़त्ल की वजह.

यादों की मरहम
अतीत के घाव उघाड़ती है
दिन पसीने में तर
जिस्म में बुनता हूँ
रूह की तृप्ति का सामान.
उखड़-उखड़ पत्थर होते दिनों में
पथराती आँखें,
तुम्हारी हक़ीक़त झुठलाते-झुठलाते
खुद ही झूठा हो गया.

एक दिन तुम मिलो तो
घर का सारा सामान ले
मेरा क़त्ल कर देना,
फिर रात भर रोना
मेरे ख्वाब बुनकर.

कहते हैं रूह अमर है.
लेकिन तुम क़त्ल करना मेरी रूह भी,
अगले जन्मों के
बेनाम रिश्ते भी
यहीं दफ़न हों, जायज़ है.

एक दिन

घडी वक़्त बताती है,
तुम्हारे लौट आने का वक़्त नहीं.
डार्क कॉफी
नींद मारती है
तुम्हारे ख्वाब नहीं!

तुमको तो पता होगा
जाते-जाते तुम
मुझे भी उठा ले गये थे.
मुझे लौटाने ही सही
आ जाओ एक दिन!

Wednesday, November 6, 2013

पत्थरों पे छैनी से लिखे कुछ दिन.…




1. तुम्हें देखता हूँ तो लगता है गर इंसान कि ज़िन्दगी में सिर्फ बचपन ही होता तो दुनिया ज्यादा खूबसूरत होती. कहते हैं, बचपना जितना बच रहता है, आदमी में उतनी ही आदमियत बचती है. तुममें बहुत इंसानियत है 'बेटू'.


2. तुम एक दिन मुझसे मिलना और कहना 'गलती मेरी नहीं थी' और मैं झुठलाउंगा तर्कों से. लेकिन सच तो ये है तमाम तर्कों के बाद भी मैं तुम्हें नहीं झुठला सकता. कुछ सच झूठ के परदे में ज्यादा खूबसूरत लगते हैं.


3. सबसे बड़ा सुकून अपनी जड़ों तक लौटना है और मिट्टी की गंध महसूस कर पाना है. मैं कभी कभी महसूस कर पाता हूँ कि पापा को अपने गांव में ही सबसे ज्यादा सुकूं क्यूँ मिलता है.


4. 'अब मेरा उद्देश्य सिर्फ शादी करना है...क्यूंकि माँ-बाप ऐसा चाहते हैं.' मैं पूछना चाहता था कि फिर माँ-बाप ने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया किसलिए था. लेकिन रुक जाता हूँ. शायद हमेशा खून के रिश्तों का ज़िन्दगी पे ज्यादा हक़ होता है.


5. 'मुझे उससे इश्क़ था... हम 'लेक' साथ गये थे.... जाने से पहले पूरे छह: घंटे तो मेरे साथ थी.' वो पीते-पीते कहता है,  फिर कुछ देर बाद बीच सड़क पे रात बारह बजे हंगामा खड़ा करता है.  मैं उसे थप्पड़ मारते घर ले आता हूँ.
  ये हंगामा किसलिए? जिसने कभी तुम्हें नहीं चाहा उसके लिए?
 मेरी तमाम सोच शून्य है. क्या तुम बताओगी मुझे, ये जाने वाली लड़की?


6. वो शाम गुस्से में घर आता है...बीवी पे दो हुक्म चला तीन थप्पड़ जमाता है. शायद बाहर से खंडित व्यक्तित्व ले के आये इंसान का व्यक्तित्व घर  में औरतें हुक्म मान सदियों से बनाती आ रही हैं.


7. 'यू आर अ गुड टीम प्लेयर, तुम सबसे मिक्स हो जाते हो....लेकिन मुझे लगता है तुम्हें अब भी टेक्निकली हार्डवर्क की ज़रूरत है. टूल समझने की ज़रूरत है.' उसका बॉस उससे कहता है.
'मुझे इंसान दिखते हैं, सिर्फ मशीनें या टूल्स नहीं.' वो केबिन से बाहर रेसिग्नेशन लैटर फेंक निकल आता है.
मैंने उससे ज्यादा हौसले वाला इंसान तब तक नहीं देखा....सुना है वर्धा के एक स्कूल में इंसान बना रहा है.


8.  सुना है एक रात इंसान जब हद से गुजर जायेंगे, वानर राज करेंगे धरती पर.


Saturday, November 2, 2013

चार कवितायेँ


आंकड़े 


सन पंचानवे के बाद से अब तक
तीन लाख किसानों ने कर ली
आत्महत्या.
कॉलगेट और 3G मिला के
तीन लाख करोड़ से भी
अधिक का हुआ घपला.

कितने समान्तर से आंकड़े हैं ये
और आप कहते हैं इंसान अपनी मौत मरता है.

---***---


संवेदना



मैं एसी बस में ऑफिस जाते
निहारता हूँ भूखे नंगे
फिर उनपे लिखता हूँ एक कविता.

आप पढ़ के कहते हैं
'बहुत भावुक हूँ मैं.'
एसी मैं बैठ 
कवितायेँ लिखना
प्रमाण नहीं संवेदना का.

मैं हूँ संवेदनहीन,
और आपकी भी संवेदनाएं मरी हैं
मुझसे भी कहीं ज्यादा.

---***---


एक्स-गर्लफ्रेंड


ऐसी औरत
जिसने कभी इश्क़ नहीं किया कभी
'जितना दोगे, उतना पाओगे' को
झुठला दिया
...और ज़रूरतों में मेरी
चुचाप मुंह छिपा चली गयी.

अब मत पूछना 
कैसे याद करूँगा मैं तुम्हें
मेरी एक्स-गर्लफ्रेंड.

ये इश्क़ एकतरफ़ा तो नहीं था.

---***---


मौसम 


गली के कोरों से, मुसलसल टपकता
नुक्कड़ पे भिगोता है पुराने ख़त.
यार! कहने को मौसम बहुत हैं मगर,
यहाँ बस बरसता है तसव्वुर तेरा!

Sunday, October 27, 2013

जिस्म, इश्क और नज़्म


रूह से निकल नज्में
हलक में अटक जाती हैं.
तुम्हारा इश्क सबा है,
सहर-दर-सहर हौसला देता है
आप ही अल्फ कागज़ पे उतर जाते हैं.

दवाख़ाने का बूढ़ा कहता है
उसकी दवा से मोहब्बत फिर जवां होती है.
गलत है वो...
मोहब्बत जिस्म का खेल होता
तो मेरी नज्मों को तुझसे इश्क न होता!    ~V!Vs


Pic: K. Madison Moore

Monday, October 21, 2013

मीना कुमारी




....और तुम्हारे नाटक से
हम सच के सपने लिख लेते
ग़र तुम्हारा अभिनय भी
मीना कुमारी की तरह जानदार होता.

पटक के रख दो ख्वाब अपने
फिर शराब हाथों में ले
लिख दो चार नगमे.
...और मर जाओ खामोश मौत,
गर तुम मीना कुमारी हो तो.

कौन कहता है
आदमी की ज़रूरत में शामिल
बस एक भूख ही है.
रूह तमाम रिश्तों को ढूंढती है जब
तो ऊँचाई पे चढ़े लोग भी
खा नहीं पाते पेट भर.
मीना कुमारी की तरह.

मेरे हम-शाख़
न गलत तुम, न गलत हम
माना मीना कुमारी न तुम, न ही हम
फिर कभी क्या, छूटते-छोड़ते
'जवानी हमारी लौटाओगे मेहर के साथ?'

Tuesday, October 15, 2013

अन्नदाताओ, कर लो सामूहिक आत्महत्या




देखो, वो लोग जो
महलों में रहते हैं,
एक दिन जब तुम न उगाओगे अन्न
तो खा लेंगे
महलों की दीवारें.
तुम  न सहोगे तो
हुक्म चला लेंगे अपनी औरतों पे.
उनके हुक्म से औरतें बन जाएगी पैसे
और खरीद लेंगे
ऎशो-आराम.

देखो तुम्हारे भूखे मरने से
न यहाँ की संसद हिलेगी, न यहाँ के महल.

मैं तो कहता हूँ,
तुम सब एक बार में, एक साथ ही मर जाओ.
एक-एक कर मर
क्यूँ इन्हें अन्न  उगा-उगा एहसान जताते हो.

विदर्भ, छत्तीसगढ़, मध्य भारत के अन्नदाताओ
मर जाओ सब,
कर लो सामूहिक आत्महत्या.

मैं देखना चाहता हूँ,
तुम्हारी मौत का तमाशा देखने वाला
यह समाज
क्या खाकर जिंदा रहता है.

Wednesday, October 2, 2013

Wednesday, September 18, 2013

'विद्रोही' कवितायेँ


[ उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में जन्मा प्रगतिशील चेतना का यह प्रखर कवि विद्रोही’ नाम से विख्यात है. दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों के बीच उनकी कविताएँ ख़ासी लोकप्रिय रही हैं. वाम आंदोलन से जुड़ने की ख़्वाहिश और जेएनयू के अंदर के लोकतांत्रिक माहौल ने उन्हें इतना आकृष्ट किया कि वे इसी परिसर के होकर रह गए. उन्होंने इस परिसर में जीवन के 30 से भी अधिक वसंत गुज़ारे हैं. शरीर से कमज़ोर लेकिन मन से सचेत और मज़बूत इस कवि ने अपनी कविताओं को कभी कागज़ पर नहीं उतारा। उनकी कविताओं में कई तो अंधेरे में और राम की शक्ति पूजा की तरह की लंबी कविताएँ हैं. उन्हें अपनी सारी कविताएँ याद है और वे बराबर मौखिक रूप से अपनी कविताओं को छात्रों के बीच सुनाते रहे हैं. ख़ुद को नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, और कबीर की परंपरा से जोड़ने वाला यह कवि जेएनयू से बाहर की दुनिया के लिए अलक्षित सा रहा है. ]


हमारे खुरदरे पांवो की ठोकर से धसक सकती है ये तुम्हारी ज़मीन, 
हमारे थर्राए हुए हाथों की रगड़ से लहुलुहान हो सकता है ये तुम्हारा कोमल आसमान.
हम अपने खून चुते नाखूनों से चीर देंगे तुम्हारे मखमली गलीचों को ,
और हम जब एक दिन ज़मीन से आसमान तक खड़े कर फाड़ देंगे तुम्हारी मेहराबे,
तब उसमे से ना कोई कश्यप निकलेगा और ना कोई नरसिंह.


---**---


औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं,
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं.
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं.
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता.
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा.


---**---


मैं किसान हूँ,
आसमान में धान बो रहा हूँ.
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता.
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है.
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा,
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा.


Monday, September 9, 2013

UNICEF's award winning advertisements..!! (Awesome must read)







Change the way of thinking.... UNICEF

 1.



 

FIRST 
Fashion Claims more Victims than you think 

Save the Animals



 2.

 

CCA-Unicef Special Mention 
Gender in Education




3. 

 

Special Mention 
Against Corruption




4. 

 

Special Mention 
Road Safety




5. 

 

Special Mention 

Nature is incomplete without Female Gender. Save girl child









6. 

 

Special Mention 
Save Trees




7. 

 

Special Mention 
Road Safety