Thursday, October 14, 2010

तो जानते मैं क्या सोचता हूँ

मेरी आँखों से कुछ रंग जो चुराते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


किनारे से आगे कभी सोचा ही नहीं,
लहरों संग बह,
आसमां छूने का एहसास जगाते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


क्या पता क्यूँ,
दरख्तों से झाँका
और लौट गये तुम.
जरा दो पल बिताते
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


किसी ने कुछ कहा,
तुमने बिन जाने ही सच मान लिया.
ये आवरण हटाते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


कह दिया दोस्त,
मुश्किलों में मैं हूँ तुम्हारा.
जरा दोस्ती निभाते,
तो जानते मैं क्या सोचता हूँ.


                  ~V!Vs***      

Thursday, September 16, 2010

आज !

वक़्त से निकल कुछ लम्हे
यादों में खोये हुए 
कहते कुछ बातें प्यारी-
जैसे सपने जागे-जागे,
जैसे अरमान गूंजे-गूंजे 
जैसी खुशियाँ बिखरी-बिखरी 
जैसे जीवन संवरा-संवरा.
जैसे डाली डोली डोली,
फूलों पे मंडरे भँवरा.

उन्नीदी सी रात ये
जैसे गाती गीत मल्हार,
जैसे चाँद प्रेयसी बन,
छू जाता, करता प्यार.
आँखों में, हंसी में आज
एक अजीब नयापन है.
बूंदे हैं बिखरी-बिखरी,
मौसम में अपनापन है.

इतारये इस दिल ने,
एक घरोंदा पाया है.
छोटे से घरोंदे का,
हर तिनका अपना पाया है.

आज कुछ सजीव लम्हे,
बरसों बाद जिए हैं फिर.
खुशियाँ बटोरकर सारी,
लम्बी प्यास कर लूँ तर!

                           ~V!Vs ***

Wednesday, August 25, 2010

उन्मुक्त क्षणिकाएं : palaayan

नींद 
नींद में सिर्फ ख्वाव नहीं,
उदासी भी है,
कुछ अधूरे सपने और तन्हाई भी है.
तो कुछ पाने की उन्मुक्तता,
कुछ सुकून और चैन भी है.


तन्हाई 
तन्हाई
बस टैरेस पर अकेला होना नहीं,
भीड़ में खोना भी है.
भरी सड़क अकेला होना भी है.
सफ़ेद लबादे में लिपटी लाश तन्हा नहीं,
तन्हा तुम हो,
क्यूंकि तमाशे में भी अकेले हो.


सड़क/शहर 
सड़क का रास्ता,
सिर्फ शहर को नहीं जाता है.
उम्मीद को भी जाता है,
नए अवसर की ओर भी जाता है.
रेल की पटरी किनारे
झुग्गियां बनेगी ज़रूर,
चंद रोटियां तो नसीब होगीं.
भले सुकून मिले ना मिले,
गाँव से शहर थोड़ा अच्छा है......!!!


गाँव का रास्ता तो लम्बा है....
गाँव में,
सुकून है तो क्या,
माँ है तो क्या,
गाँव का रास्ता तो लम्बा है.....
फिर गाँव से शहर लौटना भी है मुश्किल!


तुम्हारी आस में...
कहते हैं,
लौट आते हैं लोग
शाम ढले,
सुबह के भूले भी.
तुम्हारी आस में तो रात गुजर गई.


....
* टैरेस-terrace
लबादा- चादर, कफ़न(here)
                                                    ~V!Vs***

Wednesday, August 18, 2010

मेरे तो कई ख्वाव अधूरे हैं...... जैसे तुम!!

सावन
सावन क्या है?
बूँदें बरसें तो
लहराते पेड़, उमड़ती खुशियाँ.
ना बरसें तो
ठूंठ और शोक की कविता.

कविता
कविता क्या है?
बस वो शब्द नहीं,
जो कह दिए गये.
कविता है,
शब्दों से निकले कुछ मौन अर्थ भी.
...और कुछ अनकहे शब्द भी.

अनकहे शब्द
अनकहे शब्द,
अभिव्यक्त से अधिक कठोर हैं.
एक मौन में कथनों से ज्यादा शोर है!

शोर 
शोर क्या है?
किसी सत्य पर हा-हाकार
या मौन सत्य की चीत्कार?
सड़कों पर चक्केजाम, नारेबाजी शोर है
तो अस्मिता लुटने के बाद की चुप्पी क्या है?

सत्य/ख्वाव 
सत्य क्या है?
सपनों का धरातल पर उतरना
या कुछ ख्वावों का कभी पूरा ना होना?
ख्वाब सभी को प्यारे हैं,
पूरे कितने ख्वाब तुम्हारे हैं....?
मेरे तो कई अधूरे हैं......
जैसे तुम!!

                                                  
                                                          ~V!Vs ***

Saturday, August 14, 2010




बुढ़ापा

ऐसा भी कोई घर आपने देखा है?

जहाँ 
अतीत के ख्वावों में डूबा 
बाप हो,
सदा से ममतामयी
माँ हो,
बहू का प्यार हो,
बेटे द्वारा सत्कार हो.

आज सब बूढ़े क्यों वृद्धाश्रम में ठूँसे गये हैं?
यों जाने कितने पेड़ यूँ ही सूख गये हैं.

                  
                                               ~V!Vs ***

Monday, August 2, 2010

Ishq

(Few words are enough to describe feelings, LOVE or ink from whole world is unable to describe; both things are true.
I hope these few three liners are capable to show feelings, thats why im writing. I hope you will like these 'TRIVENIs')

.......

जबसे तनहा तड़पा हूँ याद में,
लड़की, लड़की कह चिड़ाने लगे हैं लोग.

लगता है मेरे जिस्म से भी अब तेरी खुशबू आती है.

.......

तूने साथ छोड़ा मेरा, कोई गिला नहीं,
मैं खुश हूँ कलम तो साथ है मेरे.

शुक्र है नज्में ख़ूनी नहीं होती.

.......


तेरे दिए ज़ख्म इतने बुरे भी नहीं,
चलो अच्छा है दूर से पहचान लेंगे लोग.

सुना है लाल रंग बड़ी दूर से दिखता है.

........

टपकती छट ने सारा बिस्तर भिगो दिया,
फिर भी ये मौसम सुहाना लगता है.

मेरे आँसू कोई नहीं पहचान पाता बारिश में!

........

पहाड़ दूर से देखा, बहुत सुन्दर था,
पास गये, पैरों में फफोले पड़ गये.

तू दूर है तो अच्छा है!!

.......

यूँ ना गम के आँसू बहाव आशिक,
कलम में डुबा कुछ  उकेर दो इनसे.

सुना है दर्द में नज्में खूबसूरत बनती हैं.

                                               ~V!Vs **

Friday, July 30, 2010


जीत! 
हज़ारों मरे 
लाखों घायल,
कई लापता
क्या किया हासिल?

जीत!!

अगर यह जीत है
तो हार क्या थी?
झुके-झके कन्धों से चलते
मानव की
असली हार यही है.
बस फ़र्क इतना है,
हम शर्मसार नहीं हैं.

Saturday, July 17, 2010

घर 



बड़ी टीस से चुभते हैं ये नींव के पत्थर,
न मोटी दीवारें फांद सका है कोई और.


तुमने दिल में पक्का घर क्यों बनाया था?

Monday, July 12, 2010

my first 'Triveni'

ये शहर


दिल नहीं, जज्बात भी खोए से लगते हैं,
 आंसू भी पत्थर और बुत बने हैं लोग.

कंक्रीट का जंगल सा लगता है ये शहर.

Tuesday, July 6, 2010

सावन

चलो इस सावन में सभी भीग लो.
अच्छा है वह अल्लाह-राम का नाम ले
नहीं बरसता.
गिरने से पहले बूँदें
हमारी जात नहीं पूंछती.
होली के रंग जैसे
उसके छींटे सिर्फ चंद लोगों पे नहीं पड़ते.
ना ही वह रंग-भेद करता है.


चलो अच्छा है,
पानी तो हमें एक कर देता है.


तुम्हारे शरीर से बह बूंदें,
दुसरे को छूती हैं
तो जात नहीं पूंछती.


चलो अच्छा है,
हम सावन में तो साथ भीग सकते हैं.
बिना जात-पात के,
बिना रंग-भेद के,
बिना अमीरी के,
गरीबी के.


चलो इस सावन में सभी भीग लो,
क्या पता अगला जात पूंछ कर आये.
क्या पता,
सरकारें उसे भी सरहद की तरह बाँट दें.


जात-पात समझने लगे सावन,
उससे पहले ही
इस बार भीग लो.
अगली बारिश शायद तुम्हारी जात बालों को ना हुई तो!!!