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Friday, November 10, 2017

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की कबीर साधना - डॉ. शशि पाण्डे

(हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'कबीर' मैंने पड़ी थी और उसको आधार बना मैं एक लेख लिख रहा था किन्तु बाद में अहसास हुआ कि शायद 'अनुनाद' पर छपे इस निबंध में वो सबकुछ है जो मैं कहना चाहता था.)

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को कबीरदास के जटिल व्यक्ति के सच को खोज निकालने का दुरूह और दुष्कर कार्य करने का श्रेय प्राप्त है।
द्विवेदी जी द्वारा सच्चे अर्थों में कबीर की आत्म खोज निकालना किसी आविष्कार से कम नहीं। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ कबीर’ (1971) के रूप में उनके पुनर्जन्म की बात कही है। इस ग्रन्थ के माध्यम से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कबीर के बारे में जितना कुछ लिखा है वह कबीर प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण है। कबीर को खोजने व समझने के लिए कबीर बनने की आवश्यकता थीजो मानव-मानव के बीच के कृतिम भेद को मिटा कर जात-पात की दीवारों को तोड़ता तथा बाह्माडम्बर के जाल को तोड़कर इस नश्वर शरीर से ईश्वर के अमृत-रस का पान कर सकताजो आत्म को परमात्मा का दर्शन करानरक को मोक्ष में बदल सकता था।
कबीर के मान के समाने बड़े से बड़ा ज्ञानी भी नतमस्तक है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर कबीर समाज में भी लोकप्रिय बने रहंे,वहीं दूसरी ओर सहज बौध्य और सर्वग्राह्म भी बने रहे। कबीर के इस बहुआयामी व्यक्तित्व और उनकी आत्मिक शक्ति के रहस्यों को आचार्य द्विवेदी ने खोज निकाला है।
कबीर की वाणी वह लता है जिससे योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज अंकुरित हुआ। कबीर ने कभी अपने ज्ञान को अपने गुरू को और अपनी साधना को कभी सन्देह की नजरों ने नहीं देखा अपने प्रति उनका विश्वास कभी भी डिगा नहीं। वे वीर साधक थेऔर वीरता अखण्ड आत्म विश्वास को अजेय करके ही पनपती है कबीर के लिए साधना एक विकट संग्राम स्थल थी। जहाँ कोई बिरला शूर ही टिक सकता है।1
कबीर निगुर्ण निराकार ब्रह्म को मानते थे इसलिए वे पण्डित या शेख पर आक्रमण करने पर कभी पीछे नहीं रहे। कबीर उस समाज मंे पाले गये जो न तो हिन्दुओं द्वारा समादृर्त था न मुसलमानों द्वारा पूर्णरूप से स्वीकृत कबीर सभी धर्मों को एक समान मानते थे। कबीर की व्यक्तित्व की एक विशेषता यह भी थी वह मस्त मौला स्वभाव के फक्कड़आदत से अवफड भक्त के सामनेभेदधारी के आगे प्रचण्ड,दिल के साफदिमाग के दुरूस्त भीतर से कोमलबाहर से कठोर जन्म से अस्पृश्यकर्म से बन्दनीय थे जो कुछ कहते अनुभव के आधार पर कहते थे।2
द्विवेदी जी ने कबीर में शायक सर्जक का रूप भी देखा होगा अन्यथा उनकी उलटवासियों में वे जीवन दर्शन क्यों ढूॅढतें। वस्तुतः हिन्दी साहित्य के इतिहास में सूर और तुलसी के बाद कबीर साहित्य को उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय द्विवेदी जी को जाता है। वे अपने बहुचर्चित ग्रन्थ कबीर’ में लिखते हैं- ‘‘कबीरदास का रास्ता उल्टा था। उन्हें सौभाग्य वश सुयोग भी अच्छा मिला थाजितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैंवे प्रायः सभी उनके लिए बंद थे। वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थेहिन्दू होकर भी हिन्दू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु नहीं थे। वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे भगवान की आरे से सबसे न्यारे बनाकर भेजे गये थे।’’ कबीर पर ईश्वर की अति अनुकम्पा रही जिसका उपयोग उन्होंने बखूबी निभाया।3
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानना था ‘‘कबीरदास मुसलमान वंश में पैदा होकर भी सत्संग के बल पर हिन्दू शास्त्रीय मातों को इतना जान सके थे। यह सिद्धान्त वस्तुतः किसी दृढ़-प्रमाण पर आधारित नहीं है’’ यह कहना अनुचित है कि कबीरदास सत्संगी नहीं थे,किन्तु हिन्दू धर्म- सम्बन्धी उनका ज्ञान केवल सत्संग के बल पर प्राप्त नहीं किया गया था। परमात्मा-विश्वास-निर्गुण-निराकार की भावनासमाधि-सहजावस्था आदि का सम्पूर्ण ज्ञान उन्हें अपने कुल-परम्परागुरू-परम्परा से प्राप्त थे। कबीर की साखियों का सीधा अर्थ कबीर के आत्म विचार को पहचान दिया है। जब कबीरदास निर्गुण भगवान का स्मरण करते हैं तो उनका उद्देश्य यह होता है कि भगवान के गुणमय शरीर की जो कल्पना की गयी है वह कबीर का मात्र नहीं है।4
कुल-परम्परा से द्विवेदी जी का आशय है कि नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति ने कबीर का पालन-पोषण कियावे नाथपंथी योगियों के शिष्य थे। द्विवेदी जी का मानना था कि कबीर मुसलमान होने के बाद न तो जुलाहा जाति अपने पूर्व संस्कार से एक दम मुक्त हो सकी थी और न उसकी सामाजिक मर्यादा बहुत ऊँची हो सकी थी।
द्विवेदी जी के शब्दों में ‘‘कबीर मुसलमान नाम मात्र के ही थे। इस नाथ-भावापन्न साद्योधर्मान्तरित जुलाहा जाति में पालित होने के कारण कबीरदास में नाथपंथी विश्वास सहज रूप में विद्यमान था। उनका मन योगियों के संस्कार से सुसंस्कृत था। उन्हें यौगिक सिद्धान्तों का ज्ञान अपनी धाय-माता से प्राप्त हुआ। कुल-गुरू-परम्परा के सम्बन्ध में द्विवेदी जी का मानना है कि कुल गुरू-परम्परा ईसवी सन् की पहली शताब्दी के अंतिम वर्षों में शुरू होती हैजब सहजमत में बौद्धगान व दोहे लिखे जाते थे। कबीरदास ने बाह्माचारमूलक धर्म की जो आलोचना की है उसकी भी एक सुदीर्ध परम्परा थी। इसी परम्परा को उन्होंने अपने विचार में स्थिर किया।’’5
द्विवेदी जी की दृष्टि में भक्ति ने कबीर को इतना महिमाशाली बना दिया कि वे जन-जन के कण्ठहार बन गए। ऐसी भक्ति-जो न योगियों के पास थी और न सहजयानी सिद्धों के पासन कर्मकाण्डी पण्डितों के पास थी और काजियों के पास। राम और उनकी भक्ति ये कबीर के गुरू रामानन्द की देन है। इन्हीं दो वस्तुओं ने कबीर को योगियों से अलग कर दिया। इन्हीं को पाकर कबीर सबसे अलग सबसे ऊपर हैंऔर सबसे आगे भी।
द्विवेदी जी की दृष्टि में ज्ञान और भक्ति दोनों साथ-साथ चल सकते है और ईश्वरी ज्ञान अर्थात् ईश्वर के बारे में जानने की इच्छा मानव की भक्ति है। कबीर की ज्ञान-भक्ति-भावना पर लोगों ने तरह-तरह के सवाल खड़े किए हैं। लोगों को उत्तर देते हुए कबीर स्वंय लिखते हैं- सतगुरू भक्ति ले आए है।’6
कबीरदास ने आजीवन सम्प्रदायवादब्राहमाचार और बाहरी भेदभाव पर कठोरतम आघात किया था।
माला तिलक निन्दा करे ते परगट जमइत
कहे कबीर विचारिक तेउ राक्षस भूत
द्वादश तिलक बनार्वइअंग-अंग अस्थान
कहे कबीर विराजही उज्जवल हंस समान
कबीर मसूर में गुरू महिमा सउडात।7
          उत्तर भारत में भक्ति मार्ग को रामनन्द ले आये थे और सौभाग्य से उन्हें कबीर जैसा शिष्य मिल गया था। कबीर के अनुयायियों में ये दोहा प्रचालित है-
‘‘भक्ति द्रविड़ ऊपजी लाये रामानन्द
प्रगट किया कबीर सत्प दीप नवखण्ड’’
          द्विवेदी जी का मानना है कि कबीरदास की वाणी वह लता है जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पड़ने से अंकुरित हुई थी। द्विवेदी जी ने उनके स्वभाव का बड़ा ही सटीक विवेचन इस प्रकार किया है। ‘‘वे स्वभाव से फक्कड़ थेअच्छा हो या बुराखरा हो या खोटा जिससे एक बार चिपट गयेउससे जिन्दगी पर चिपटे रहे। वे सत्य के जिज्ञासु थे और कोई मोह ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती थी। वे सिर से पेर तक मस्तमौला थे। मस्तजो पुराने कृत्यों का हिसाब नहीं रखतावर्तमान कर्मों को सर्वस्त नहीं समझता और भविष्य में सब कुछ झाड़-फटकार कर निकल जाता है।8
हम घर जारा आपनालिया मुराडा हाथ
अब घर जारो तातु का जाचले हमारा साक
          कबीर की यह घर-फूॅक मस्तीफक्कड़ाना लापरवाही और निर्मम अक्खड़ता उनके अखण्ड आत्म-विश्वास का परिणाम थी। उन्होंने कभी अपने ज्ञान कोअपने गुरू को और अपनी साधना को संदेह की नजरों से नहीं देखा। अपने प्रति उना विश्वास कहीं भी डिगा नहीं वे वीर साधक थे और वीरता अखण्ड आत्मविश्वास का आश्रय करके ही पनपती है।9
          द्विवेदी जी कबीर को अपने युग का सबसे बड़ा क्रान्तिकारी मानते है। वे लिखते हैं- ‘‘सहज सत्य का सहज ढंग से वर्णन करने में कबीरदास अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं जानते। वे मनुष्य बुद्धि को व्याहत करने वाली सभी वस्तुओं को अस्वीकार करने का अपास साहस लेकर उत्पन्न हुए। पण्डितशेखमुनिपीरऔलियाकुरानरोजा-नमाजएकादशीमन्दिर और मस्जिद उन दिनों मनुष्य चित्त को अभिभूत कर बैठे थे। परन्तु वे कबीरदास का मार्ग न रोक सकेंइसलिए कबीर अपने युग के सबसे क्रान्तिदर्शी थे।’’
          आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की भाषा का सही मूल्यांकन किया है। ‘‘भाषा कबीर का अच्छा अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार-सी नजर आती है उसमें मानें हिम्मत ही नहीं थी कि इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फरमाइश को नहीं कर सकें। जैसी ताकत कबीर की भाषा में थीवैसी बहुत कम लेखकों में है। ‘‘कबीर की छनद योजनाउक्ति वैचित्र्य और अलंकार निधान पूर्ण रूप से स्वाभाविक अल्पसाधिक है।10
          द्विवेदी जी ने कबीर में शायद अपने सजृन का रूप देखा होगा अन्यथा उनकी उलटवासियों में वे जीवन दर्शन को क्यों ढूंढते द्विवेदी जी अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ कबीर’ में लिखते है। कबीर का रास्ता उल्टा था उन्हें सौभाग्यवश सयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैवे प्रायः उनके लिए बंद थे। वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। हिन्दू होकर भी हिन्दू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु अग्रहस्थ नहीं थेवे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे भगवान की ओर से सबसे न्यारे बनाकर भेजे गये थे। सच्चे अर्थों में कबीर एक मानव थे।11
          द्विवेदी जी ने निर्गुण भक्तिधारा में कबीर की वाणी समाज को नई दिशा देती हैजाति व्यवस्था पर प्रहार करते हुए संत कबीर ने कहा-
जात पात पूछे नहीं कोई
हारे को भजे सो हारे का होई
कर्मकाडों के विरूद्ध संतों के निर्भीक स्वर उपजे कबीर की दृष्टि यहाँ समविष्टनिष्ठ की अपेक्षा व्यक्तिनिष्ठ अधिक दिखाई पड़ती हैं वह संसार को खाता-पीता तथा सुखी देखकर ईष्र्या नहीं करता वह सत्य दुःख में रात-रात भर जागता हैरोता है। वह कार्ल माक्र्स की तरह किसी रक्त रंजित क्रान्ति की बात नहीं करता और न श्रम को मृत पूॅजी मानता है वह भारतीय समतवादी दर्शन के परिप्रेक्ष्य में संतोष धन को गले लगाकर बोल उठता हैं।
गोधन गण धन वाणि धन और रतन धन खान
जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान
          कबीर प्रगतिशील वाणी न किसी पूँजीपति को ललकारती है और न किसी के आगे गिड़गिडाती है व जन सामान्य को लालच से बचने के लिए प्रेरित करती है।
          द्विवेदी जी का आलोचना ग्रन्थ ‘‘कबीर’’ स्पष्ट करता है कि कबीर मानव के द्वारा बनाये गये भेदों के बीच भी मानवीय रूप ही स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने अपने संवादों में मानवीय एकता का बीज बोया हैजो पल्लवित पुष्पित होकर विश्व को मानवता की भावना से ओत-प्रोत करने में समर्थ है।
          द्विवेदी जी ने जिस तन्मयताऔर अध्यवसाय के स्वरूप कबीर के सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रस्तुतीकरण किया हैवह एक प्रकार की कबीर साधना है।


(डॉ. शशि पाण्डे)
हिन्दी विभाग
डी0एस0बी0 परिसर
नैनीताल
सन्दर्भ सूची
1.       हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली- 04, संपादक- मुकन्द द्विवेदीराजकमल प्रकाशनपृ0- 391
2.       वहीपृ0- 325-328
3.       वहीपृ0- 287
4.       वहीपृ0- 202
5.       वहीपृ0- 206
6.       वहीपृ0- 210-211
7.       वहीपृ0- 319
8.       कबीर मंसूर में गुरू महिमा से उद्धत (पृ0- 1363), द्विवेदी ग्रन्थावलीपृ0- 211
9.       वहीपृ0- 321
10.     वहीपृ0- 366
11.     हजारी प्रसाद द्विवेदी और उनका रचना संसारडॉ. श्याम सिंह शशि के आलेख पृ0- 1
12.     वहीपृ0- 3

Saturday, April 4, 2015

कबीर का प्रभाव

कबीर ने अपने जीवन के निजी अनुभवों से जो कुछ सीखा था, उसके आलोक में तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, सांप्रदायिक तथा राष्ट्रीय व्यवस्था को देखकर हतप्रभ थे। वे इन स्थितियों में अमूल परिवर्तन लाना चाहते थे, लेकिन उनकी बातों को सुनने और मानने को कोई उत्सुक नहीं था। उनको सारा संसार बौराया हुआ लग रहा था।जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्याना।
वे फरमाते हैं कि साधू जाति से नहीं, ज्ञान से पुज्यनीय बनता है।
कबीर बराबर प्रयत्नशील रहे कि दुखी, असहाय और पीड़ित जनता के बीच सुख- शांति का प्रसार हो एवं उनका जीवन सुरक्षित और आनंदमय हो। तत्कालीन परिस्थितियों को देखकर उन्होंने अनुभव किया कि भक्ति के मार्ग पर मोड़कर ही जनता को खुशी प्रदान की जा सकती है। उन्होंने इस अस्र का ही सहारा लिया :-
कहे कबीर सुनो हो साधो, अमृत वचन हमार,
जो भल चाहो आपनी, परखो करो विचार,
आप अपन पो चीन्हहू, नख सिखा सहित कबीर,
आनंद मंगल गाव हु, होहिं अपनपो थीर।
कबीर संतप्त जनजीवन के बीच शांत बना देते थे। वे सुखी जीवन की कला भक्ति को बताते थे। कबीर के पास यही ज्ञान था, इसी ज्ञान के सहारे वे जनजीवन में हरियाली लाने का प्रयास करते रहे। वे कहते हैं कि अगर तुम अपनी भलाई चाहते हो, तो मेरी बातों को ध्यान से सुनो और उन पर अमल भी करो। वे हम मानव को सर्वप्रथम स्वयं को स्थिर करने, शांत होने, अपने को पहचानने एवं आनंद में रहने को कहते हैं। उनके अनुसार जब मानव मन के सारे विकारों को दूर करके शांत स्थिर चित्त से बैठेगा, तो वह हर प्रकार की विषम परिस्थिति से बचा रहेगा। इस प्रकार कबीर मानवतावादी है। मानव के सच्चे शुभचिंतक हैं :-
ओ मन धीरज काहे न धरै,
पशु- पक्षी जीव कीट पतंगा, सबकी सुध करे,
गर्भवास में खबर सेतु है, बाहा ओं विसरै।
रे मन, धैर्य रखो। भगवान सब जीव की सुध लेते हैं, तुम्हारी भी लेंगे। जब तुम नौ मास गर्भ में थे, तब भगवान ही रक्षा कर रहे थे। फिर अब वह तुम्हें कैसे भूल सकते हैं ? कबीर इस बात को महसूस का चुके थे कि जनता को सद्भावना, सहानुभूति और प्यार की जरुरत है। किसी भी मूल्य पर वह गरीब जनता के जीवन से रस घोलना चाहते हैं।
पानी बिच मीन प्यासी, मोहि सुन- सुन आवें हांसी।
घर में वस्तु न नहीं आवत, वन- वन फिरत उदसी।
कबीर साहब कहते हैं, भला जल में मछली रहकर प्यासी रह सकती है ? प्रत्येक मानव के भीतर ईश का वास है, जहाँ निरंतर आनंद- ही- आनंद है। इसी की खोज करना चाहिए। अन्यंत्र बारह घूमने या परेशान होने की कतई जरुरत नहीं है।
कस्तुरी कुंडल वसै, मृग ढ़ूढे वन माहिं,
ऐसे घर- घर राम हैं, दुनियां देखे नाहिं।
कस्तूरी मृग की नाभि में रहता है, लेकिन मृग अज्ञान- वश इसे जंगल में खोजता- फिरता है। इसी तरह सर्वशक्तिमान भगवान और आनंद मनुष्य के अपने अंतर हृदय में ही अवस्थित है, लेकिन अज्ञानी मानव सुख शांति की तलाश में बाहर अंदर घूमता रहता है, जो कि व्यर्थ है। कबीर भक्ति को आकर्षण दिखाकर लोगों के हृदय में शांति का संचार करना चाहते हैं।
दुरलभ दरसन दूर है, नियरे सदा सुख वास,
कहे कबीर मोहि समापिया, मत दुख पावै दास।
कबीर साहब व्यावहारिकता पर बल देते हैं। उनका सब सुझाव सीधा और अनुकरणीय है। वे मानव को सांसारिक प्रपंच से हटाकर अंतर्मुखी होने का सुझाव देते हैं। वे कहते हैं कि दूर का सोचना व्यर्थ है। समीपता में ही सुख का वास है।
परमातम गुरु निकट विराजै,
जाग- जाग मन मेरे,
धाय के पीतम चरनन् लागे,
साई खड़ा सिर तेरे।
उनकी उक्तिनुसार परमात्मा का वास अपने निकट ही है, अतः घबराने की कोई जरुरत नहीं है। आवश्यकता सिर्फ मन को जगाकर परमात्मा में लगाने की है। मानव को दौड़कर भगवान का चरण पकड़ लेना चाहिए, क्योंकि वे सिर के पास ही खड़े हैं। कबीर कहते हैं, आस्था और विश्वास में बहुत बल है। निर्बल जनता के बीच इसी भक्ति का बीजारोपण करने का प्रयास महात्मा कबीर ने किया है।
देह धरे का दण्ड है, सब काहु को होय,
ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मुरख भुगते रोय।
सब काहू को होय।
महात्मा कबीर साहब कहते हैं कि सभी शरीर धारियों को इस संसार में अपने कर्मानुसार दुख उठाना ही पड़ता है। दुख की इस घड़ी में कतई घबड़ाना नहीं चाहिए, बल्कि शांतिपूर्वक दुख का सहन करना चाहिए। ज्ञानी जन अपने ज्ञान के बल पर इस दुख की मार को स्थिर चित्त से शांति पूर्वक भोग लेते हैं, लेकिन अज्ञानीजन दुख की मार से तिलमिला जाते हैं और रुदन करने लगते हैं। तत्कालीन परिस्थितियों के परिवेश में जनता को वे समझाते हैं कि तुम जिस भी स्थिति में हो, उसी में रहकर शांतिपूर्वक भगवान का ध्यान लगाओ। तुम्हारा दुख- दर्द सब दूर हो जाएगा। अपने मन को शुद्ध करने की आवश्यकता पर बल दो। 
जब लग मनहि विकारा, तब लागि नहीं छूटे संसारा,
जब मन निर्मल भरि जाना, तब निर्मल माहि समाना।
जब तक मन में विकार है, तब तक सांसारिक प्रपंच से छुटकारा पाना संभव नहीं है। शुद्धि के पश्चात ही भक्ति रस में मन रमता है और सांसारिक प्रपंच से मन शनै: शनै: हटने लगता है। वे कहते हैं, मन निर्मल होने पर आचरण निर्मल होगा और आचरण निर्मल होने से ही आदर्श मनुष्य का निर्माण हो सकेगा।
सबसे हिलिया, सबसे मिलिया, सबसे लिजिए
नोहा जी सबसे कहिऐ, वसिये अपने भावा जी।
वे कहते हैं सबसे मिलो जुलो, वर्तालाप करो, सबसे प्रेम करो, लेकिन अपना वास स्थान प्रभु में रखो।
कर से कर्म करो विधि नाना,
मकन राखो जहाँ कृपा निधाना।
संत तुलसी दास भी कहते हैं, “”हाथ से कर्तव्य करो, अपना कर्तव्य पूरा करो, लेकिन मन सर्वदा भगवान में लगाए रखो। आदर्श जीवन जीने की यहीं कला है, जिसकी ओर प्रायः सभी संतों ने आगाह किया है।
सुख सागर में आये के , मत जा रे प्यारा,
अजहुं समझ नर बावरे, जम करत निरासा।
महात्मा कबीर चेतावनी देते हैं कि इस संसार में आकर अपना जीवन व्यर्थ मत करो, रामरस पीकर अपने को तृप्त कर लो। कबीर साहब थोड़ा आक्रोश में आकर कहते हैं, अब भी संभल जाओ, होश में आओ और भक्ति में लग जाओ। भक्ति ही कल्याण का मार्ग मात्र है।
दास कबीर यो कहै, जग नाहि न रहना,
संगति हमरे चले गये, हमहूँ को चलाना।
महात्मा कबीर अपनापन के साथ हमें बतलाते हैं :-
यह संसार हम सबों के लिए चिरस्थायी निवास स्थान नहीं है। यहाँ से प्रत्येक मानव को एक न एक दिन जाना ही पड़ता है। हमारे बहुत संगी चले गए। कबीर के अनुसार मनुष्य कितना भी यशस्वी हो, कितना ही विद्वान हो, कितना ही व्यक्तित्व मुक्त हो, कितना ही समुद्धशाली हो, कितना ही विद्वान हो, मगर जब तक वह अपने अंदर छिपे हुए उस सुक्ष्मातिसुक्ष्म तत्व का अन्वेषण नहीं करता, उसकी प्राप्ति का प्रयत्न नहीं करता, जब तक उसका जीवन व्यर्थ है :-
हरि बिन झूठे सब त्योहार, केते कोई करी गंगवार।
झूठा जप- तप झूठा गमान, राम नाम बिन झूठा ध्यान।
वे फरमाने हैं कि विवेक के निर्देशों का पालन करने वाले जीवन में असीम आनंद का प्रवाह होता है। विवेकी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, क्योंकि उसे अच्छी तरह ज्ञात है कि संसार की समस्त स्थितियाँ नश्वर एवं क्षणिक हैं। विवेक के संबंध में कबीर को स्पष्ट निर्देश है :-
मन सागर मनसा लहरि बूड़े बहे अनेक,
कह “”कबीर” तो बाचहि, जिनके हृदय विवेक।
वे कहते हैं कि आनंद दूसरों को दुख देकर नहीं, बल्कि इच्छापूर्वक स्वंय दुख झेलने से ही प्राप्त होता है :-
आप ठग्या सुख उपजै,
और ठगया दुख होय।
उनके अनुसार “”धर्म में अभी भी इतनी क्षमता है कि मानव जाति को ऐसी बहुमुखी संपूर्णता की ओर ले जा सकते हैं, जिसमें हिंदू धर्म की आध्यात्मिक ज्योति, यहुदी धर्म की आस्था और आज्ञाकारिता, युनानी देवार्चन की सुंदरता, बौद्ध धर्म की काव्य करुणा, इसाई धर्म की दिव्य प्रीति और इस्लाम धर्म की त्याग भावना सम्मिलित हो।”
आज हमारा देश जिस संकट में घिरा है, उसका मूल कारण धर्म से विमुखता हो, जिसकी वजह से लोगों का सदाचार भी समाप्त हो गया है।

Source: 
https://vimisahitya.wordpress.com/2007/11/02/kabir_prabhav/